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'डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक के लिए बनाएं नए कानून': साइबर ठगी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र को दिया सुझाव

Tue, 28 Jul 2026 07:55 PM IST
Devesh Tripathi पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Tue, 28 Jul 2026 07:55 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ते साइबर अपराधों पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार को डिजिटल अरेस्ट को अलग आपराधिक श्रेणी के रूप में कानूनी मान्यता देने पर विचार करने का सुझाव दिया है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में आरोपियों की संपत्ति फ्रीज करने जैसे प्रभावी प्रावधान भी कानून का हिस्सा हो सकते हैं। सुनवाई के दौरान डीपफेक और अन्य आधुनिक ऑनलाइन अपराधों से निपटने के लिए नए कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि केंद्र सरकार को आपराधिक कानून में डिजिटल अरेस्ट को औपचारिक रूप से परिभाषित करने और इसे कड़ी सजा वाले अलग अपराध के रूप में शामिल करने पर विचार करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अगर ठोस और तर्कसंगत साक्ष्यों के आधार पर किसी आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो उसकी संपत्ति फ्रीज की जा सकती है।
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डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का तेजी से बढ़ता तरीका है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, अदालत या सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए लोगों को डराते हैं। इसके बाद वे उन्हें मानसिक रूप से बंधक बनाकर पैसे देने का दबाव बनाते हैं।
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भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एक सुनवाई के दौरान ये कहा। वहीं, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों का प्रावधान पहले से कानून में मौजूद है। उन्होंने कहा कि विभिन्न विभागों की एक अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी) व्यवस्था में मौजूद कमियों की पहचान के लिए एक व्यापक रिपोर्ट तैयार कर रही है।
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इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, "आपको दंड कानूनों में 'डिजिटल अरेस्ट' को औपचारिक रूप से परिभाषित करने की जरूरत पड़ सकती है। इसमें जबरन वसूली और लूट जैसे अपराधों के तत्व भी शामिल हैं। संभव है कि इसे गंभीर परिणामों वाले एक अलग अपराध के रूप में परिभाषित किया जाए। साथ ही यह प्रावधान भी हो कि अगर किसी आरोपी के खिलाफ कुछ पाया जाता है तो उसकी संपत्ति फ्रीज की जा सके।"

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने डीपफेक के बढ़ते खतरे का भी जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे नए ऑनलाइन अपराधों को परिभाषित करने के लिए कानून बनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा, "अब हमारे सामने डीपफेक भी है। इसका इस्तेमाल धोखाधड़ी और किसी की पहचान बनकर अपराध करने में किया जा सकता है। आप मौजूदा साधनों से लड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें और मजबूत करने की भी जरूरत है। अनुच्छेद 142 के तहत हम किसी नए अपराध को परिभाषित नहीं कर सकते।"

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार डीपफेक और डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों से निपटने के लिए नया कानून तैयार कर रही है। उन्होंने कहा, "एक मसौदा विधेयक तैयार किया जा रहा है। संभव है कि उसमें डिजिटल अरेस्ट, डीपफेक और अन्य ऑनलाइन अपराधों से जुड़े प्रावधान शामिल हों।"

अटॉर्नी जनरल ने यह भी बताया कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) इस समय 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक की धोखाधड़ी वाले लगभग 20 बड़े डिजिटल फ्रॉड मामलों की जांच कर रहा है, जबकि अन्य मामलों की जांच राज्य पुलिस कर रही है।

उन्होंने अदालत से कई सुरक्षा उपायों पर निर्देश जारी करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को ऐसा मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) औपचारिक रूप से अपनाने और लागू करने का निर्देश दिया जाना चाहिए, जिसके तहत साइबर धोखाधड़ी में इस्तेमाल होने वाले संदिग्ध म्यूल खातों पर अस्थायी रूप से डेबिट रोक लगाई जा सके।

उन्होंने सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को शिकायत निवारण मॉड्यूल और धन वापसी मॉड्यूल को जल्द लागू करने तथा साइबर वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े बैंक खातों को फ्रीज करने के मामलों का शीघ्र निपटारा करने के निर्देश देने की भी मांग की। पीठ ने कहा कि वह इस मामले में बुधवार को आदेश जारी करेगी।

इससे पहले, "डिजिटल अरेस्ट" के बढ़ते मामलों पर रोक लगाने के लिए गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि उसने व्यवस्था की कमियों को दूर करने और साइबर अपराध के पीड़ितों को तत्काल सुरक्षा देने के उद्देश्य से एक उच्चस्तरीय अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी) का गठन किया है।

16 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर अटॉर्नी जनरल की निगरानी में विभिन्न मंत्रालयों के बीच विचार-विमर्श का निर्देश दिया था और उसके परिणाम से अदालत को अवगत कराने को कहा था।

12 जनवरी को गृह मंत्रालय की ओर से दाखिल स्थिति रिपोर्ट में बताया गया था कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई), दूरसंचार विभाग और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े प्रमुख मंत्रालय मिलकर जाली दस्तावेजों और "डिजिटल अरेस्ट" के जरिए लोगों से ठगी करने वाले अंतरराष्ट्रीय गिरोहों के खिलाफ संयुक्त अभियान चला रहे हैं।

पीठ के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि सीबीआई ने दिल्ली के एक चर्चित धोखाधड़ी मामले की जांच अपने हाथ में ले ली है। इस मामले में 76 वर्षीय एक विधवा पेंशनभोगी महिला से कथित तौर पर "डिजिटल अरेस्ट" के नाम पर फर्जी दस्तावेज दिखाकर 1.64 करोड़ रुपये की ठगी की गई थी।


सीबीआई ने अदालत को बताया कि इस तरह के अपराध अक्सर संगठित और अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध गिरोहों द्वारा किए जाते हैं। इन गिरोहों पर कार्रवाई के लिए एजेंसी अब इंटरपोल के माध्यमों का भी उपयोग कर रही है। गृह मंत्रालय ने बताया कि विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) की अध्यक्षता में अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी) का गठन किया गया है।
 
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