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Supreme Court: कोर्ट में जबरन धर्मांतरण के खिलाफ याचिका पर सुनवाई स्थगित, मामला नौ जनवरी के लिए सूचीबद्ध

Mon, 12 Dec 2022 04:45 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Mon, 12 Dec 2022 04:45 PM IST
सार

इससे पहले केंद्र ने कहा था कि ऐसे मामलों पर रोक लगाने के लिए नौ राज्यों में कानून है। इसमें- ओडिशा, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक व हरियाणा शामिल हैं। यहां धर्मांतरण कानून बना हुआ है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में  कहा कि महिलाओं व आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए इस तरह के अधिनियम आवश्यक हैं।

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Supreme Court adjourns to January 9 plea against forced religious conversion
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने जबरन धर्मांतरण के खिलाफ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई नौ जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी है। सोमवार को इस याचिका पर हुई संक्षिप्त सुनवाई के दौरान एक पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने मामले में पक्षकार बनने की मांग करते हुए कहा कि याचिका में धर्मों के खिलाफ लगाए गए कुछ आरोप बहुत ही गंभीर और घृणित प्रकृति के हैं। हालांकि, इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अदालत के समक्ष नहीं उपस्थित थे, जिसके कारण जस्टिस एम आर शाह और एस रवींद्र भट की पीठ ने मामले में सुनवाई नौ जनवरी तक टाल दिया। गौरतलब है कि इससे पहले सुनवाई के दौरान जबरन धर्न परिवर्तन को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा था कि यह एक गंभीर मुद्दा है। इतना ही नहीं ये संविधान के खिलाफ भी है। 

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दरअसल, वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपनी याचिका में धोखाधड़ी और डरा-धमकाकर होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की मांग की है। याचिका में कहा है कि अगर इन पर रोक नहीं लगाई गई, तो जल्द ही भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे।  
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 उनकी याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई के दौरान एक पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने मामले में पक्षकार बनने की मांग की। इस दौरान दवे ने कहा, 'कृपया हमें पक्षकार बनने की अनुमति दें। आरोप वास्तव में दुखद हैं। आज आप इस पर विचार कर सकते हैं।' इस पर पीठ ने कहा कि वह मामले की सुनवाई की अगली तारीख पर विचार करेगी।
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इससे पहले हुई सुनवाई के दौरान दान के उद्देश्य पर जोर देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि जबरन धर्म परिवर्तन एक "गंभीर मुद्दा" है और संविधान के खिलाफ है।

पिछली सुनवाई के दौरान जस्टिस एम आर शाह और सी टी रविकुमार की पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मुद्दे पर विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने के लिए समय मांगते हुए कहा था कि वैधानिक शासन यह निर्धारित करेगा कि विश्वास में कुछ बदलाव के कारण कोई व्यक्ति परिवर्तित हो रहा है या नहीं। 

इस पर पीठ ने कहा कि 'इसे विरोध के रूप में न लें। यह एक बहुत ही गंभीर मुद्दा है। आखिरकार यह हमारे संविधान के खिलाफ है। जब हर कोई भारत में रहता है, तो उन्हें भारत की संस्कृति के अनुसार कार्य करना पड़ता है।' शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि जबरन धर्मांतरण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकता है और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर अतिक्रमण कर सकता है। साथ ही अदालत ने केंद्र से इस 'बेहद गंभीर' मुद्दे से निपटने के लिए गंभीर प्रयास करने को कहा था।


नौ राज्यों में पहले से है कानून
इससे पहले केंद्र ने कहा था कि ऐसे मामलों पर रोक लगाने के लिए नौ राज्यों में कानून है। इसमें- ओडिशा, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक व हरियाणा शामिल हैं। यहां धर्मांतरण कानून बना हुआ है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में  कहा कि महिलाओं व आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए इस तरह के अधिनियम आवश्यक हैं।

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