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अमर उजाला बैठक में चले सुधीश पचौरी के दिव्यास्त्र और अशोक वाजपेयी के ब्रह्मास्त्र

Mon, 25 Sep 2017 06:22 PM IST
amarujala.com- Presented By- टीम डिजिटल
amarujala.com- Presented By- टीम डिजिटल Updated Mon, 25 Sep 2017 06:22 PM IST
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Sudhish Pachauri and Ashok Vajpeyi took a great initiative for the amar ujala baithak
सुविख्यात कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी और सुप्रसिद्ध मीडिया समालोचक और लेखक सुधीश पचौरी। - फोटो : amarujala
अमर उजाला फाउंडेशन की पहली संवाद बैठक में वही हुआ, जिसका अंदाजा था। हिंदी साहित्य जगत के दो दिग्गज झूमते हुए आए और आते ही दोनों ने अपने अपने तरकश के मुंह खोल दिए।
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हास-परिहास, चुहल, नोकझोंक और तीखे व्यंग्‍य बाणों का संधान होने लगा। देखते देखते अमर उजाला के नोएडा स्थित मुख्यालय का पाटलीपुत्र सभागार `तीरन से तीरन काटन लगे` वाले नयनाभिराम मगर विचारोत्तेजक नजारों से भर गया। 
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मौका था अमर उजाला की नई पहल - बैठक सीरीज - की पहली कड़ी के आयोजन का, जिसमें वैचारिक जुगलबंदी के लिए आमंत्रित थे -- सुविख्यात कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी और सुप्रसिद्ध मीडिया समालोचक और लेखक सुधीश पचौरी। भारतीय भाषाओं के सम्‍मान के अभियान के बड़े मकसद से आरंभ हुई इस पहल का घोषित उद्देश्य है - उच्च स्तरीय संवाद का सृजन,  और बैठक के पहले क्षण से ही  यह सृजन आरंभ होता दिखा। 
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शुरुआत सुधीश पचौरी ने बीते दिनों की अवार्ड वापसी मुहिम पर एक निर्मम प्रश्न से की। कवि उदय प्रकाश और नयनतारा सहगल के अवार्ड वापसी संदर्भ में जब अशोक वाजपेयी से पूछा गया कि अपना अवार्ड वापस करने के बाद वे चुप क्यों बैठ गए तो उन्होंनें भी बड़े सहज भाव से चुटीले जवाब दिए।

आज रोजाना शो हो रहे हैं

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अमर उजाला के नोएडा स्थित मुख्यालय में युवा साथियों के साथ आमंत्रित साहित्यकार अशोक वाजपेयी और सुधीश पचौरी। - फोटो : amarujala
सुधीश पचौरी ने वाजपेयी जी को इंदिरा सरकार के समय लागू किए गए आपातकाल की याद दिलाई और कहा कि तब तो उन्होंने इस तरह से अवार्ड वापस कर विरोध नहीं जताया था और अब नरेंद्र मोदी की सरकार में असहिष्णुता दिखती है? उन्होंने कहा कि आप एक ही शो देखकर चुप हो गए, जबकि आज रोजाना शो हो रहे हैं। सवाल पूछते पूछते उन्होंने वाजपेयी जी के कथित अर्जुन सिंह प्रेम पर भी चुटकी ले ली।  

इस पर वाजपेयी बोले -- अवॉर्ड वापसी की मुहिम का ही नतीजा था कि इस बहाने लेखक लोग अखबारों के पहले पन्ने पर आ गए वरना लेखकों को तो अखबार उनके मरने के बाद ही छापते हैं। श्रोताओं के ठहाकों के बीच उन्होंने अपने जवाब को आगे बढ़ाया --- आप यह न भूलें कि अवार्ड वापसी के दिनों में जब वे कुछ अन्य लेखकों के साथ राष्ट्रपति से मुलाकात करने गए थे तो स्वयं राष्ट्रपति ने भी अवार्ड वापसी मुहिम की प्रशंसा की थी और असहिष्‍णुता बढ़ने पर चिंता जताई थी। 

वाजपेयी ने कहा कि उदय प्रकाश और नयनतारा सहगल के अवार्ड वापस करने के बाद उन्हें इंडियन एक्सप्रेस का फोन आया था जिसके जवाब में उन्होंने भी अनायास अपना अवार्ड वापस करने की बात कह दी थी। उसके पीछे कोई योजना नहीं थी। लेकिन बाद में वह एक मुहिम जैसा बन गया जिसका जागरुकता बढ़ाने में फायदा ही मिला। 

अर्जुन सिंह के संदर्भ में की गई व्यंग्योक्ति का भी जवाब उन्होंने बड़ी साफगोई से दिया -- वे मुझसे सलाह मांगते थे और अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए मैं उचित सलाह देता था। उन्होंने इमरर्जेंसी के दिनों में चुप रहने के आरोप को भी यह कहकर खारिज कर दिया कि उस वक्त मैं सरकार में था। एक सीमा से ज्यादा बोल नहीं सकता था। हालांकि उनकी इस सफाई के बाद सुधीश पचौरी  ने उनकी खबर लेना जारी रखा और कहा कि आपातकाल पर मन में विरोध था  तो सरकार में बने क्यों रहे, नौकरी छोड़ क्यों नहीं दी? 

मौजूदा सरकार की योजनाओं पर टीका टिप्पणी

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अमर उजाला परिवार की ओर से आमंत्रित साहित्यकार अशोक वाजपेयी और सुधीश पचौरी को स्मृति चिन्ह दिया गया। - फोटो : amarujala
साहित्य के दोनों महारथियों की यह भिड़ंत किसी एक विषय पर केंद्रित नहीं रही। उसमें धर्म  और अध्यात्म, जातिवाद, स्वच्छ भारत, नोटबंदी, देश की अर्थव्यवस्था और साहित्य क्षेत्र में साहित्यकारों, कवियों और युवाओं का योगदान और उनसे उम्मीद -- जैसे  सवालों पर जमकर विचार विनिमय हुआ। मौजूदा सरकार की योजनाओं पर टीका टिप्पणी भी हुई। सरकार की शासन शैली की आलोचना भी हुई और एक संदर्भ में गांधी जी के जीवन के कई मार्मिक प्रसंग भी याद किए गए। 

बैठक के बाद श्रोता ऐसे कई विचारबीज लेकर विदा हुए जो बाद में भी मंथन की मांग करते रहेंगे। मसलन सरकार की योजनाओं की समालोचना करते समय सुधीश पचौरी ने कहा कि इतिहास में यह पहला मौका है जब स्वच्छता अभियान के नाम पर देश के आम आदमी को उसके गुसल के मुद्दे पर अपमानित किया जा रहा है।

आम आदमी कैसे शौच कर्म करे और किस स्‍थान पर करे, इसको लेकर निरंतर प्रश्नवाचन और दबाव का माहौल बनाया जा रहा है और इस पूरे विमर्श में उस आदमी की माली हालत की कोई चर्चा नहीं है। टायलेट बनवाने के लिए उसकी क्षमता है या नहीं - इस पर सवाल नहीं हो रहा है। एक दूसरे संदर्भ में, जब अशोक वाजपेयी  के समक्ष यह आरोप आया कि कवि बिरादरी केवल भाषणबाजी करके अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर सकती, तो उन्होंने बड़े धैर्य से कहा कि कवि के लिए कविता लिखना ही पर्याप्त है। आवश्यक नहीं कि कवि सड़क पर उतर कर आंदोलन भी करें। 

बीमा का फायदा तो मरने के बाद मिलता है

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अमर उजाला परिवार के लिए यादगार के रूप में कप पर साइन करते आमंत्रित साहित्यकार अशोक वाजपेयी और सुधीश पचौरी। - फोटो : amarujala
बैठक में एक सवाल पर सुधीश पचौरी ने कहा कि यह देखना दुखद है कि सरकार की ज्यादातर योजनाएं या तो कर्ज पर हैं या मर्ज पर। इन योजनाओं में बीमा योजनाओं की भरमार है। बीमा का फायदा तो मरने के बाद मिलता है। इस तरह की योजनाओं के शोर में कल्याणकारी राज्य की मूल अवधारणा का उपहास उड़ रहा है।

उधर, अशोक वाजपेयी ने कहा कि सरकार की तरफ से रोज नए नए झूठ सामने आ रहे हैं।  एक और संदर्भ में उन्होंने शिकवा जताया कि  युवा साहित्यकार राजनीतिक विचलनों की आलोचना करने से बच रहे हैं। एक रोचक सवाल के जवाब में उन्होंने ठहाकों के बीच यह भी कहा कि वे जीवन में कभी भी राजनेता या पत्रकार नहीं बनना चाहेंगे। 

बहरहाल, अमर उजाला बैठक सीरिज की पहली कड़ी का आयोजन अपने इस मकसद में कामयाब रहा कि संवाद के बहाने भारतीय भाषाओं में व्यक्त होने वाले जीवन मूल्यों को रेखांकित किया जाए। बैठक में उन्मुक्त बातचीत हुई। आरोप-प्रत्यारोप हुए लेकिन कहीं भी मैत्री भाव घटता नहीं नजर आया। कटाक्ष हुए लेकिन मुस्कुराहटों के साथ। हास्य के साथ ही कटाक्षों को स्वीकार भी किया गया। और इस पूरे उपक्रम में श्रोताओं और अमर उजाला के संपादक परिवार को कई मुद्दों पर अंतरदृष्टि मिली। घटनाओं और घोषणाओं को देखने समझने का नया नजरिया मिला। 

बैठक के अंत में दोनों विद्वानों को अमर उजाला की ओर से सम्‍मान चिह्न भेंट किए गए। यादगार के तौर पर एक कॉफी मग पर उनके हस्ताक्षर भी लिए गए। साथ ही अमर उजाला प्रबंधन की ओर से सबको एक वादा भी मिला कि जल्दी ही देश के किसी हिस्से में बैठक की अगली कड़ी होगी और उसमें भारतीय भाषाओं के ऐसे ही हैवीवेट गणमान्य विचारक आएंगे और बिंदास बातचीत में अपना दिल खोलकर दिखा कर जाएंगे। 
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