फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Story of Mumbai Police constable arun jadhav witness of mumbai attack

26/11: आतंकवादियों का डटकर सामना करने वाले पुलिसकर्मी की कहानी

Mon, 26 Nov 2018 01:48 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Mon, 26 Nov 2018 01:48 PM IST
विज्ञापन
Story of Mumbai Police constable arun jadhav witness of mumbai attack
Arun Jadhav - फोटो : BBC

टोयोटा एसयूवी गनपाउडर और खून की बदबू से भर गई थी। कॉन्स्टेबल अरुण जाधव गाड़ी के पिछले हिस्से में छुपे हुए थे। वहां बहुत कम जगह थी। जाधव के दाएं हाथ और कंधे में गोली लगी थी और खून निकल रहा था।

विज्ञापन


सड़क पर हुई फायरिंग में घायल हुए तीन कॉन्स्टेबल उनके ऊपर पड़े थे। इनमें से दो की मौत हो चुकी थी। शहर के एंटी-टेरर यूनिट के इंचार्ज का शव बीच वाली सीट पर था। उनके सीने पर गोली लगी थी।
विज्ञापन


गाड़ी में बैठे एक पुलिस अधिकारी और इंस्पेक्टर को भी गोली लग गई थी। वहीं, ड्राइवर सीट पर सीनियर इंस्पेक्टर बैठे थे वो भी गोली लगने से स्टेयरिंग पर गिरे हुए थे। वो 26 नवंबर 2008 की शाम थी। भारत की आर्थिक राजधानी और सिनेमा का गढ़ मुंबई दुनिया के सबसे भयावह चरमपंथी हमले की चपेट में थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


उस शाम को दस हथियारबंद चरमपंथी समुद्र के रास्ते मुंबई पहुंचे थे। ये सभी पाकिस्तान से थे। यहां उतरकर चरमपंथी दो समूहों में बंट गए, एक ने गाड़ी का अपहरण किया और पहले से तय जगहों पर निशाना बनाया।

उन्होंने एक प्रमुख रेलवे स्टेशन, दो लग्जरी होटल, एक यहूदी सांस्कृतिक केंद्र और एक अस्पताल पर हमला किया। चरमपंथियों ने जैसे 60 घंटों तक पूरे शहर को बंधक बना लिया था। मौत के उस तांडव में 166 लोग मारे गए और कई घायल हो गए। इस हमले ने भारत-पाकिस्तान के बीच की दरार को और गहरा कर दिया।

जब अस्पताल पर हुआ हमला

अरुण जाधव और अन्य छह पुलिसकर्मी एक सफेद एसयूवी में 132 साल पुराने उस अस्पताल की तरफ दौड़े जिस पर चरमपंथियों ने हमला कर दिया था। वहां अस्पताल के स्टाफ ने अपनी सूझबूझ से अस्पताल के वार्ड्स पर ताला लगा दिया था ताकि मरीजों की जान बचाई जा सके।

"हमसे पहले पुलिस अस्पताल में घुस चुकी थी। तभी ऊपरी मंजिल से फायरिंग हुई। इसके जवाब में एक सीनियर ऑफिसर ने भी फायरिंग की। इसके बाद बंदूकधारी वहां से भाग गए और अस्पताल के पीछे ताड़ के पेड़ों वाले रास्ते पर छुप गए। तभी वहां पर हमारी एसयूवी पहुंची।"

"हम पहुंचे ही थे कि कुछ ही सेकेंड में चरमपंथियों ने हम पर हमला बोल दिया और गाड़ी के अंदर दो राउंड फायरिंग की।" ये हमला इतना औचक था कि सिर्फ अरुण जाधव ही जवाबी फायरिंग कर पाए बाकी सभी पुलिसकर्मी गोलियों से छलनी हो गए। उन्होंने फायरिंग का जवाब देते हुए गाड़ी की पिछली सीट से बंदूकधारियों को तीन गोलियां मारीं।

बंदूकधारियों ने तुरंत ही आगे और बीच की सीट से तीनों अधिकारियों के शव निकालकर सड़क पर पटक दिए। उनमें से एक ने ये भी कहा कि सिर्फ एक पुलिसवाले ने बुलेट प्रूफ जैकेट पहनी है। इसके बाद वो बाकी शवों को निकालने के लिए पीछे का दरवाजा खोलने लगे लेकिन दरवाजा नहीं खुला।

मोहम्मद अजमल आमिर कसाब और इस्माइल खान को लगा कि पीछे की तरफ चार लाशें पड़ी हैं। असल में, उनमें से एक जिंदा था और दूसरा धीरे-धीरे सांसे ले रहा था। बाकी दो मर चुके थे। तभी अचानक कॉन्स्टेबल योगेश पाटिल की जेब में फोन बजना शुरू हो गया। वे ऑपरेशन पर जाने से पहले उसे साइलेंट करना भूल गए थे।

फोन की आवाज सुनकर कसाब ने पीछे की तरफ फिर से गोलियां चलाईं। गोली बीच की सीट से होते हुए योगेश पाटिल को जा लगी और उनकी मौत हो गई। लेकिन, खून से भीगे और लाशों के बीचे दबे हुए अरुण जाधव के जिंदा होने के बारे में चरमपंथी नहीं जानते थे। वो कहते हैं, "अगर कसाब ने अपनी बंदूक थोड़ा और घुमाई होती तो मैं भी जिंदा नहीं होता।"

लोग मौत को करीब से देख रहे थे

मौत को करीब से देखने वालों को लेकर किए गए अध्ययनों में बताया जाता है कि उस वक्त लोग शांति और शरीर से अलगाव महसूस करते हैं। उन्हें किसी सुरंग के अंत में तेज रोशनी और साये दिखाई दे रहे थे।

लेकिन, मुंबई के आसपास के इलाकों में लंबे समय से अपराध का सामना कर रहे अरुण जाधव को ऐसा कुछ भी महसूस नहीं हुआ। परिवार से जुड़ी यादें जैसे उनकी आखों के सामने तैरने लगीं। उन्हें लगा कि जैसे अब उनका समय खत्म हो चुका है।

51 साल के अरुण जाधव बताते हैं, "मैं उस वक्त सोच रहा था कि मैं जल्द ही मर जाऊंगा। मैं अपने बीवी-बच्चे, माता-पिता को याद कर रहा था। मुझे लगा कि यही मेरा अंत है।"

अरुण जाधव ने बताया कि फिर उन्होंने किसी तरह अपनी बंदूक उठाने की कोशिश की, जो कार में गिर गई थी। लेकिन, उनकी घायल बाजू में बिल्कुल भी ताकत नहीं थी। अब उन्हें अपनी 9एमएम की पिस्तौल न होने का अफसोस हो रहा था। उन्होंने गाड़ी पर चढ़ते वक्त वो पिस्तौल अपने सहकर्मी को दे दी थी।

वह कहते हैं, "मैं किसी हल्के हथियार से आसानी से बंदूकधारियों को मार सकता था।"

चरमपंथियों के साथ गाड़ी में
अब चरमपंथी गाड़ी में बैठ गए थे और तेजी से उसे दौड़ाने लगे। एक क्रॉसिंग पर उन्होंने बाहर खड़े लोगों पर गोलियां बरसा दीं। इससे अफरा-तफरी मच गई। बाहर मौजूद पुलिस ने गाड़ी पर गोली चलाई और पीछे के पहिये पर गोली लगी। गाड़ी में मौजूद वायरलेस से दूसरी जगहों पर हुए हमलों के लगातार संदेश आ रहे थे। एक संदेश आया, "कुछ ही देर पहले एक पुलिस वैन से फायरिंग हुई है।"

लेकिन, बंदूकधारियों ने उस पंक्चर टायर से 20 मिनट तक गाड़ी चलाई जब तक कि टायर बाहर नहीं आ गया। उसके बाद उन्होंने गाड़ी छोड़ दी और एक स्कोडा सेडान को रोका और उसमें मौजूद तीन लोगों को बाहर निकाल दिया। फिर खुद गाड़ी लेकर समुद्र की तरफ चले गए।

फिर वे एक पुलिस चेकप्वाइंट में घुस गए। वहां भी फायरिंग हुई, जिसमें इस्माइल और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई। सिर्फ कसाब को ही जिंदा पकड़ा जा सका। जाधव कहते हैं, "मैं गाड़ी में मरने का नाटक कर रहा था और सीट के पीछे से सब देख रहा था।"

चरमपंथियों के जाने के बाद उन्होंने किसी तरह वायरलेस उठाया और कंट्रोल रूम को घटना की जानकारी दी और मदद मांगी। जब एंबुलेंस उन तक पहुंची तो वो बिना किसी मदद के उसमें चढ़े और फिर उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

उस गाड़ी में मारे गए तीन लोग शहर के शीर्ष पुलिसकर्मी थे। इनमें शहर के एंटी-टेररिस्ट स्कवाड के प्रमुख हेमंत करकरे, एडिशनल कमिशनर अशोक कामटे और इंस्पेक्टर विजय सलास्कर शामिल थे।

मुख्य गवाह बने जाधव

1988 में मुंबई ज्वाइन करने के बाद अरुण जाधव की पदोन्नित हुई और उन्हें गैंगस्टर्स का खात्मा करने के लिए सलास्कर की टीम में शामिल किया गया। जब जाधव जिंदगी और मौत के बीच फंसे थे तब उनके एक कमरे के घर में पत्नी और तीन बच्चे पूरी रात इन हमलों से जुड़ी खबरें टीवी पर देख रहे थे। जब इस मुठभेड़ की खबर आई तो वे भगवान से प्रार्थना कर रही थे।

अरुण जाधव ने अस्पताल पहुंचने के बाद अगली सुबह अपनी पत्नी से बात की। उनका ऑपरेशन किया गया और हाथ और कंधे से पांच गोलियां निकाली गईं। उनका इलाज करने वाले डॉक्टर हैरान थे कि इन सबके बावजूद भी उन्हें सदमा नहीं लगा। उन्हें सात महीनों तक आराम करने के लिए कहा गया।

कसाब को सजा दिलाने में अरुण जाधव प्रमुख चश्मदीद बने। उन्होंने जेल में कसाब को पहचाना और उस दिन की हर एक बात बहुत बारीकी से जज के सामने रखी। मार्च 2010 में कसाब को फांसी की सजा सुनाई गई। दो साल बाद पुणे की जेल में कसाब को फांसी दे दी गई।

अरुण जाधव को उनकी बहादुर के लिए सम्मानित भी किया गया और मुआवजा भी दिया गया। उनकी बड़ी बेटी को सरकारी नौकरी दी गई। उनका एक बेटा और बेटी इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहे हैं।

अब कैसी है जिंदगी

दस साल बाद भी अरुण जाधव के लिए जिंदगी बहुत ज्यादा नहीं बदली है। काम के दौरान वो अब भी अपराधियों को पकड़ने की कोशिश करते हैं। बाद में उनके हाथ की दो सर्जरी हुईं। वह बताते हैं कि अब भी हाथ में दर्द होता है और ध्यान भी ज्यादा रखना पड़ता है।

हालांकि, कुछ चीजें बदली हैं। अब वो किसी ऑपरेशन में जाने से पहले अपने परिवार को बताते हैं। सोमवार को इस हमले के 10 साल पूरे होने पर गेटवे ऑफ इंडिया पर एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाएगी जिसमें अरुण जाधव का इंटरव्यू भी होगा।

हालांकि, अरुण जाधव उस दिन शहर में नहीं होंगे। वह अपने परिवार के साथ उत्तर भारत में किसी गुरु के आश्रम में जा रहे हैं। वह कहते हैं, "ऐसी घटना के बाद दिमाग़ को शांत रखना मुश्किल हो सकता है। कभी-कभी बीच रात में जग जाने पर मुझे फिर से नींद नहीं आती। मुझे उस दिन की कुछ घटनाएं याद आने लगती हैं।"

"मुझे हैरानी होती है कि मैं मौत के मुंह से कैसे बचकर आ गया। मुझे खुद नहीं पता। शायद मैं खुशकिस्मत था? या मैंने अच्छे काम किए थे? या फिर इससे भी आगे कुछ और? मुझे लगता है कि ये कभी पता नहीं चलेगा।"

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed