कहानी चुनाव की: स्टील ने दिया धोखा तो लकड़ी के बक्से ने कर दिया कमाल, पढ़ें 1952 का किस्सा
चुनाव आयोग ने इन चुनावों में इस्तेमाल के लिए विभिन्न कंपनियों को ऑर्डर देकर स्टील के बने बैलट बॉक्स तैयार कराए थे। हालांकि, एक समय ऐसी भी नौबत आई जब चुनाव एकदम सिर पर आ गए और स्टील की मतपेटियां कम पड़ गईं।
विस्तार
भारत में प्रथम आम चुनाव 25 अक्तूबर ,1951 से 21 फरवरी, 1952 के बीच हुए। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ कराए गए चुनावों में 17.32 करोड़ मतदाताओं ने हिस्सा लिया। इतने बड़े पैमाने पर चुनाव संपन्न कराने के लिए देशभर में करीब दो लाख पोलिंग बूथ बनाए गए थे। चुनाव आयोग ने इन चुनावों में इस्तेमाल के लिए विभिन्न कंपनियों को ऑर्डर देकर स्टील के बने बैलट बॉक्स तैयार कराए थे। हालांकि, एक समय ऐसी भी नौबत आई जब चुनाव एकदम सिर पर आ गए और स्टील की मतपेटियां कम पड़ गईं। दरअसल, हुआ यह कि स्टील के बैलट बॉक्स बनाने वाली एक कंपनी महीनों तक दिन-रात की कड़ी मेहनत के बावजूद तय समय पर ऑर्डर पूरे नहीं कर पाई। इससे चुनाव में देरी होने का खतरा पैदा हो गया। वैसे भी संविधान सभा शुरुआत में 1950 में ही जल्द से जल्द चुनाव करा लेना चाहती थी। हालांकि, चुनाव के लिए जरूरी जमीनी तैयारियां अधूरी होने के कारण यह संभव नहीं हुआ।
मद्रास में लकड़ी का बैलट बॉक्स
जब ऐन चुनाव के समय स्टील के बैलट बॉक्स की कमी सामने आई, तो इस परेशानी से निपटने के लिए तत्काल लकड़ी का बैलट बॉक्स इस्तेमाल करने का फैसला किया गया। लकड़ी की इन मतपेटियों का इस्तेमाल मद्रास प्रांत में चुनाव के दौरान किया गया। लोकसभा व विधानसभा के लिए एकसाथ चुनाव हुए थे। मतदाताओं को किसी तरह का भ्रम न हो, इसके लिए मतपेटियों को अलग रंग से रंगा गया था।