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टूट गई NCP: अजित पवार की बगावत का महाराष्ट्र में कितना पड़ेगा असर, शरद पवार आगे क्या करेंगे? जानें
Sun, 02 Jul 2023 04:18 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Sun, 02 Jul 2023 04:18 PM IST
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एनसीपी में फूट
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अमर उजाला
विस्तार
शिवसेना के बाद अब एनसीपी में भी फूट पड़ चुकी है। एनसीपी के नेता और पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने भाजपा की अगुआई वाले गठबंधन यानी एनडीए का दामन थाम लिया है। आठ विधायकों के साथ अजित राजभवन पहुंचे और यहां उन्होंने उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ग्रहण कर ली। अजित का दावा है कि उनके साथ एनसीपी के 40 विधायकों का समर्थन है। एनसीपी में पड़ी फूट ने सूबे में सियासी भूचाल ला दिया है। खासतौर पर एनसीपी के अंदर दूसरे गुट में खलबली मची हुई है। ये दूसरा गुट है खुद पार्टी के मुखिया यानी शरद पवार का।अब सवाल उठता है कि आखिर महाराष्ट्र की राजनीति में अब आगे क्या होगा? शरद पवार के पास पार्टी बचाने के लिए क्या विकल्प है? क्या एनसीपी अब पूरी तरह से अजित पवार की हो जाएगी? आइए समझते हैं...
पहले जानिए एनसीपी में दरार पड़ने की पूरी कहानी
इसकी शुरुआत नवंबर 2019 से हुई। तब विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। भाजपा को 105 सीटों पर जीत मिली थी। शिवसेना के 56 और एनसीपी के 54 प्रत्याशी चुनाव जीते थे। कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली थी।
भाजपा के साथ चुनाव लड़ने वाली शिवसेना ने मुख्यमंत्री के मुद्दे पर गठबंधन तोड़ लिया। भाजपा भले ही सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से दूर थी। बहुमत के लिए पार्टी को 145 विधायकों का समर्थन चाहिए था। आनन-फानन में अजित पवार ने एनसीपी का समर्थन दे दिया और देवेंद्र फडणवीस सीएम बन गए। अजित पवार ने डिप्टी सीएम का पद की शपथ ली।
ये सबकुछ अजित ने खुद के बल पर किया। मतलब इसके लिए उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार की मंजूरी नहीं ली थी। कुल मिलाकर ये एक तरह से बगावत थी। इसका असर हुआ कि पांच दिन के अंदर ही एनसीपी ने अपना समर्थन वापस ले लिया। अजित चाहते हुए भी भाजपा के साथ नहीं जा पाए। देवेंद्र फडणवीस की सरकार गिर गई।
उधर, एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बना ली। उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनाए गए, जबकि अजित पवार को डिप्टी सीएम का पद फिर से मिल गया। जब शिवसेना में दो फाड़ हुआ और वापस भाजपा की सरकार बनी तो अजित गुट में हलचल तेज हो गई। कई एक्सपर्ट कहते हैं कि अजित गुट चाहता है कि भाजपा के साथ मिलकर महाराष्ट्र में राजनीति करें, जबकि पवार ऐसा नहीं चाहते हैं।
दो मई को शरद पवार ने अचानक अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। 24 घंटे तक इसको लेकर खूब गहमा-गहमी रही, बाद में नेताओं के कहने पर पवार ने अपना इस्तीफा वापस भी ले लिया। हालांकि, तभी ये तय हो गया था कि शरद पवार पार्टी में कुछ बड़ा करने वाले हैं।
बाद में, पार्टी के 25वें स्थापना दिवस समारोह पर शरद पवार ने दो कार्यकारी अध्यक्ष के नामों का एलान किया। इसमें एक बेटी सुप्रिया सुले हैं तो दूसरे पार्टी के उपाध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल का नाम है। सुप्रिया को केंद्रीय चुनाव समिति का प्रमुख भी बनाया गया। इस दौरान अजित को लेकर कोई एलान नहीं किया गया। अजित इससे काफी खफा थे।
इसकी शुरुआत नवंबर 2019 से हुई। तब विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। भाजपा को 105 सीटों पर जीत मिली थी। शिवसेना के 56 और एनसीपी के 54 प्रत्याशी चुनाव जीते थे। कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली थी।
भाजपा के साथ चुनाव लड़ने वाली शिवसेना ने मुख्यमंत्री के मुद्दे पर गठबंधन तोड़ लिया। भाजपा भले ही सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से दूर थी। बहुमत के लिए पार्टी को 145 विधायकों का समर्थन चाहिए था। आनन-फानन में अजित पवार ने एनसीपी का समर्थन दे दिया और देवेंद्र फडणवीस सीएम बन गए। अजित पवार ने डिप्टी सीएम का पद की शपथ ली।
ये सबकुछ अजित ने खुद के बल पर किया। मतलब इसके लिए उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार की मंजूरी नहीं ली थी। कुल मिलाकर ये एक तरह से बगावत थी। इसका असर हुआ कि पांच दिन के अंदर ही एनसीपी ने अपना समर्थन वापस ले लिया। अजित चाहते हुए भी भाजपा के साथ नहीं जा पाए। देवेंद्र फडणवीस की सरकार गिर गई।
उधर, एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बना ली। उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनाए गए, जबकि अजित पवार को डिप्टी सीएम का पद फिर से मिल गया। जब शिवसेना में दो फाड़ हुआ और वापस भाजपा की सरकार बनी तो अजित गुट में हलचल तेज हो गई। कई एक्सपर्ट कहते हैं कि अजित गुट चाहता है कि भाजपा के साथ मिलकर महाराष्ट्र में राजनीति करें, जबकि पवार ऐसा नहीं चाहते हैं।
दो मई को शरद पवार ने अचानक अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। 24 घंटे तक इसको लेकर खूब गहमा-गहमी रही, बाद में नेताओं के कहने पर पवार ने अपना इस्तीफा वापस भी ले लिया। हालांकि, तभी ये तय हो गया था कि शरद पवार पार्टी में कुछ बड़ा करने वाले हैं।
बाद में, पार्टी के 25वें स्थापना दिवस समारोह पर शरद पवार ने दो कार्यकारी अध्यक्ष के नामों का एलान किया। इसमें एक बेटी सुप्रिया सुले हैं तो दूसरे पार्टी के उपाध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल का नाम है। सुप्रिया को केंद्रीय चुनाव समिति का प्रमुख भी बनाया गया। इस दौरान अजित को लेकर कोई एलान नहीं किया गया। अजित इससे काफी खफा थे।
अब जानिए महाराष्ट्र की राजनीति में आगे क्या होगा?
इसे समझने के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता चंद्र प्रकाश पांडेय से बात की। एडवोकेट चंद्र प्रकाश पांडेय ने कहा, 'ये ठीक उसी तरह की परिस्थिति है, जैसा पिछले साल शिवसेना के साथ हुआ था। तब भी शिवसेना के ज्यादातर विधायक एकनाथ शिंदे के साथ खड़े हो गए थे और देखते ही देखते महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई थी। अब शिवसेना पर पूरी तरह से एकनाथ शिंदे का कब्जा हो चुका है। हालांकि, मामला अभी भी कोर्ट में लंबित है।'
पांडेय कहते हैं, '2019 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी ने 54 सीटों पर जीत हासिल की थी। एनडीए का दामन थामने के बाद अजित पवार ने दावा किया है कि उनके पास 40 विधायकों का समर्थन है। अगर ये सही है तो एक तरह से अजित पवार का पक्ष मजबूत होता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि अभी अजित विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं। हां, केवल विधायकों के समर्थन से ही पार्टी पर हक का फैसला नहीं हो सकता है। इसके लिए पार्टी के राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर के पदाधिकारियों का समर्थन भी अजित को चाहिए। ऐसे में भले ही अभी अजित ने 40 विधायकों के समर्थन के दावे के साथ एनडीए का साथ पकड़ लिया है, लेकिन उन्हें आगे चलकर इसे साबित भी करना होगा और पार्टी पर पूरी तरह से पकड़ बनाने के लिए भी उन्हें पदाधिकारियों का विश्वास जीतना होगा।'
पांडेय ने बताया कि अब शरद पवार के पास तीन रास्ते हैं और वह तीनों ही रास्तों पर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे। पहला वह तुरंत विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का नाम बदलकर बागी विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे। इसके लिए पार्टी की तरफ से वह विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल को चिट्ठी लिखेंगे। दूसरा रास्ता न्यायालय का होगा। वह शिवसेना की तरह इस मामले में पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का रूख अख्तियार कर सकते हैं। तीसरा वह अजित के दावे के खिलाफ चुनाव आयोग का भी दरवाजा खटखटा सकते हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग पहले एनसीपी का चुनाव चिह्न सीज करेगी और फिर पूरे मामले की जांच के बाद उचित फैसला देगी।
इसे समझने के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता चंद्र प्रकाश पांडेय से बात की। एडवोकेट चंद्र प्रकाश पांडेय ने कहा, 'ये ठीक उसी तरह की परिस्थिति है, जैसा पिछले साल शिवसेना के साथ हुआ था। तब भी शिवसेना के ज्यादातर विधायक एकनाथ शिंदे के साथ खड़े हो गए थे और देखते ही देखते महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई थी। अब शिवसेना पर पूरी तरह से एकनाथ शिंदे का कब्जा हो चुका है। हालांकि, मामला अभी भी कोर्ट में लंबित है।'
पांडेय कहते हैं, '2019 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी ने 54 सीटों पर जीत हासिल की थी। एनडीए का दामन थामने के बाद अजित पवार ने दावा किया है कि उनके पास 40 विधायकों का समर्थन है। अगर ये सही है तो एक तरह से अजित पवार का पक्ष मजबूत होता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि अभी अजित विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं। हां, केवल विधायकों के समर्थन से ही पार्टी पर हक का फैसला नहीं हो सकता है। इसके लिए पार्टी के राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर के पदाधिकारियों का समर्थन भी अजित को चाहिए। ऐसे में भले ही अभी अजित ने 40 विधायकों के समर्थन के दावे के साथ एनडीए का साथ पकड़ लिया है, लेकिन उन्हें आगे चलकर इसे साबित भी करना होगा और पार्टी पर पूरी तरह से पकड़ बनाने के लिए भी उन्हें पदाधिकारियों का विश्वास जीतना होगा।'
पांडेय ने बताया कि अब शरद पवार के पास तीन रास्ते हैं और वह तीनों ही रास्तों पर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे। पहला वह तुरंत विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का नाम बदलकर बागी विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे। इसके लिए पार्टी की तरफ से वह विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल को चिट्ठी लिखेंगे। दूसरा रास्ता न्यायालय का होगा। वह शिवसेना की तरह इस मामले में पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का रूख अख्तियार कर सकते हैं। तीसरा वह अजित के दावे के खिलाफ चुनाव आयोग का भी दरवाजा खटखटा सकते हैं। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग पहले एनसीपी का चुनाव चिह्न सीज करेगी और फिर पूरे मामले की जांच के बाद उचित फैसला देगी।
राजनीतिक तौर पर क्या बदलेगा?
महाराष्ट्र की राजनीति को समझने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने ये बड़ा दांव खेल दिया है। ऐसे समय पहले शिवसेना और फिर एनसीपी में फूट पड़ने का फायदा भाजपा को हो सकता है। अजित पवार महाराष्ट्र की सियासत पर अच्छी पकड़ रखते हैं। स्थानीय स्तर पर उनकी डिमांड भी काफी है। ऐसे में आने वाले दिनों में वह भाजपा और शिवसेना के साथ मिलकर विपक्ष के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति को समझने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने ये बड़ा दांव खेल दिया है। ऐसे समय पहले शिवसेना और फिर एनसीपी में फूट पड़ने का फायदा भाजपा को हो सकता है। अजित पवार महाराष्ट्र की सियासत पर अच्छी पकड़ रखते हैं। स्थानीय स्तर पर उनकी डिमांड भी काफी है। ऐसे में आने वाले दिनों में वह भाजपा और शिवसेना के साथ मिलकर विपक्ष के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।