केरल विधानसभा चुनाव: 'हमारे कारण लेफ्ट को नुकसान होगा'
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भारतीय धर्म जन सेना पार्टी (बीडीजेएस) के गठन को अभी एक वर्ष भी नहीं हुए हैं, लेकिन उसकी मौजूदगी से केरल विधानसभा के चुनाव दिलचस्प हो गए हैं। केरल के प्रभावशाली सामाजिक संगठन श्री नारायण धर्म पालना योगम (एसएनडीपी) का यह राजनीतिक फ्रंट एनडीए का हिस्सा है। एसएनडीपी के महासचिव वेलापल्ली नटेसन के बेटे तुषार वेलापल्ली इस पार्टी के अध्यक्ष हैं। तुषार दावा करते हैं कि उनकी पार्टी को आठ से नौ सीटें तक मिल सकती हैं। वह खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन पार्टी जिन 38 सीटों पर चुनाव लड़ रही वहां वे प्रचार अभियान में जुटे हुए हैं। उनके दावों की सच्चाई जानने के लिए सुदीप ठाकुर ने उनसे बात कीः
- आपकी पार्टी पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रही है, कितनी सीटों की उम्मीद कर रहे हैं?
हमारी पार्टी को आठ से नौ सीटें मिलनी चाहिए।
- यह भी कहा जा रहा है कि आपकी वजह से लेफ्ट फ्रंट को नुक्सान होगा, क्योंकि पारंपरिक रूप से उसे वोट देना वाला इड़वा समुदाय आपकी ओर झुक रहा है?
यह सही है कि हमें एलडीएफ के वोट मिल रहे हैं। बीडीजेएस जिन सीटों पर चुनाव लड़ रही है, वहां सौ फीसदी लेफ्ट की हार होगी।
- तो आपके निशाने पर लेफ्ट है और क्या आप इस तरह कांग्रेस को फायदा नहीं पहुंचा रहे हैं?
नहीं। हम किसी को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए चुनाव लड़ रहे हैं। एनएडीए को 30 से 35 सीटें तक मिल सकती है। हम चुनाव के बाद केरल के दूसरे छोटे दलों के साथ मिलकर सरकार भी बना सकते हैं।
- आपको नहीं लगता कि 30 सीटें कुछ ज्यादा हैं?
नहीं। कुछ महीने पहले हुए पंचायत चुनाव में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया था।
- आपकी पार्टी नई है लोग वोट क्यों देंगे?
पिछले छह सात दशक से कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां प्रदेश में शासन कर रही हैं। कर्नाटक और तमिलनाडु की तुलना में यहां कम विकास हुआ है। यहां से इंडस्ट्री बाहर जा रही है। सड़कों की हालत खराब है। केरल की आर्थिक हालात बदतर होती जा रही है। कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां यहां सांप्रदायिक मुद्दे पर चुनाव लड़ती रही हैं। एनडीए विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहा है।
- देश के दूसरे हिस्सों में भाजपा और संघ परिवार कट्टर हिंदुत्व के मुद्दे को उठाते रहे हैं। लेकिन केरल की डेमोग्राफी बिल्कुल अलग तरह की है। यहां हिंदुओं के साथ ही ईसाइयों और मुस्लिमों की अच्छी खासी आबादी है। संघ परिवार के हिंदुत्व के मुद्दे का आपको यहां नुक्सान नहीं होगा?
यह धारणा सही नहीं। यहां कई क्षेत्रों में 70 से 80 फीसदी तक हिंदू हैं। यहां हिंदू और ईसाई एक साथ रहते हैं। कुछ जगहों पर जरूर मुस्लिमों के कारण मुश्किल आती है। वास्तव में एनडीए को सिर्फ हिंदू ही नहीं, ईसाई और मुस्लिम भी समर्थन दे रहे हैं, क्योंकि सभी को विकास चाहिए। कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी सिर्फ मुस्लिमों को ही खुश करने की कोशिश करते हैं। यदि कोई मुस्लिम महिला विधवा होती है तो उसे यूडीएफ सरकार उसे तीन लाख रुपये देती है। इस नीति से हिंदुओं और ईसाइयों को अलग रखा गया है।