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स्पैडेक्स: किफायती तकनीक से खंगालेंगे अंतरिक्ष की गहराई, नासा भी मिशन के लिए ऐसी ही तकनीक का करती है इस्तेमाल
Tue, 31 Dec 2024 05:45 AM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Tue, 31 Dec 2024 05:45 AM IST
सार
इसरो का महत्वाकांक्षी स्पैडेक्स मिशन अंतरिक्ष यान को उन्हें एक-दूसरे से जोड़ने और अलग करने की क्षमता प्रदर्शित करेगा। सबसे अहम यह है कि स्पैडेक्स मिशन में इस्तेमाल प्रौद्योगिकी अन्य देशों की तुलना में कम लागत की है।
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स्पैडेक्स मिशन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का महत्वाकांक्षी स्पैडेक्स मिशन अंतरिक्ष यान को उन्हें एक-दूसरे से जोड़ने और अलग करने की क्षमता प्रदर्शित करेगा। सबसे अहम यह है कि स्पैडेक्स मिशन में इस्तेमाल प्रौद्योगिकी अन्य देशों की तुलना में कम लागत की है। इस मिशन के लॉन्च के साथ ही भारत ने किफायती तकनीक के जरिये अंतरिक्ष को गहराई से खंगालने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) में यान भेजने और वापस लाने में इसी तकनीक का इस्तेमाल करती है। स्पैडेक्स मिशन की सफलता से भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद ऐसी प्रौद्योगिकी वाला चौथा देश हो जाएगा।
अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर रहा भारत
मानव मिशन और अंतरिक्ष केंद्र बनाने में अहम अपना खुद की डॉकिंग सिस्टम प्रौद्योगिकी विकसित करके इसरो अंतरिक्ष के क्षेत्र में खुद को एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर रहा है। यह तकनीक मानव मिशन शुरू करने, चंद्रमा के नमूने धरती पर लाने, अंतरिक्ष स्टेशन बनाने जैसे अहम लक्ष्यों की दिशा में बेहद अहम है।
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यान की मरम्मत होगी संभव
यह मिशन निर्माण और आपातकालीन बचाव की सुविधा प्रदान करेगा। साथ ही इस तकनीक के सफल होने के बाद भारत रखरखाव, मरम्मत, ईंधन भरने और मलबे के प्रबंधन में सक्षम हो पाएगा।
ऐसे होगी डॉकिंग प्रक्रिया
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अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) में यान भेजने और वापस लाने में इसी तकनीक का इस्तेमाल करती है। स्पैडेक्स मिशन की सफलता से भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद ऐसी प्रौद्योगिकी वाला चौथा देश हो जाएगा।
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अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर रहा भारत
मानव मिशन और अंतरिक्ष केंद्र बनाने में अहम अपना खुद की डॉकिंग सिस्टम प्रौद्योगिकी विकसित करके इसरो अंतरिक्ष के क्षेत्र में खुद को एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर रहा है। यह तकनीक मानव मिशन शुरू करने, चंद्रमा के नमूने धरती पर लाने, अंतरिक्ष स्टेशन बनाने जैसे अहम लक्ष्यों की दिशा में बेहद अहम है।
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यान की मरम्मत होगी संभव
यह मिशन निर्माण और आपातकालीन बचाव की सुविधा प्रदान करेगा। साथ ही इस तकनीक के सफल होने के बाद भारत रखरखाव, मरम्मत, ईंधन भरने और मलबे के प्रबंधन में सक्षम हो पाएगा।
ऐसे होगी डॉकिंग प्रक्रिया
- मिशन का मकसद यह है कि जब दोनों यान तेज रफ्तार से पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे होंगे तो चेजर यान टारगेट का पीछा करेगा और दोनों तेजी से एक दूसरे के साथ डॉक यानी जुड़ेंगे। वांछित कक्षा में स्थापित होने के बाद दोनों अंतरिक्ष यान 24 घंटे में 20 किमी दूर हो जाएंगे।
- इसके बाद वैज्ञानिक उन्हें जोड़ने यानी डॉकिंग की प्रक्रिया शुरू करेंगे। ईंधन का उपयोग करते हुए चेजर यान टारगेट से धीरे-धीरे दूरी कम करेगा। चेजर फिर चरणों में टारगेट के पास पहुंचेगा। इससे दूरी धीरे-धीरे 5 किमी, 1.5 किमी, 500 मीटर, 225 मीटर, 15 मीटर और अंत में 3 मीटर तक कम हो जाएगी, जहां डॉकिंग होगी।
- यानों को जोड़ने के बाद फिर उन्हें अलग करने से पहले अंतरिक्ष यान के बीच पावर ट्रांसफर का प्रदर्शन किया जाएगा।