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अब सोशल मीडिया दे रहा इफ्तार पार्टियों में अहम रोल

Thu, 22 Jun 2017 02:55 PM IST
प्रदीपिका सारस्वत/बीबीसी हिंदी
प्रदीपिका सारस्वत/बीबीसी हिंदी Updated Thu, 22 Jun 2017 02:55 PM IST
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Social media giving a big roll in the Iftar parties
Iftar parties - फोटो : bbc

इस्लामिक कैलेंडर के नवें महीने रमजान की आजकल धूम है। इधर सोशल मीडिया पर एक नई तरह की हवा भी बह रही है। जिक्र है एक 'इंटरफेथ' यानी सर्वधर्म इफ्तार का। हमने नेताओं, अभिनेताओं, अन्य जानी-मानी हस्तियों और कई जगह अपने दोस्तों-जानने वालों की पार्टियों के बारे में सुना है, लेकिन इस खास इफ्तार की कहानी कुछ अलग है। 

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कैसे हुई शुरुआत-
ये कहानी शुरू होती है रमजान के तीसरे दिन लिखी गई एक फेसबुक पोस्ट से। नोएडा में रहने वाली नाजिया इरम ने 28 मई को अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा, "ऐसे कितने लोग हैं जो कभी किसी इफ्तार में नहीं गए?" इस सवाल के जवाब में तीस से ज्यादा लोगों ने बताया कि वे कभी किसी इफ्तार में शामिल नहीं हुए।

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दिल्ली-नोएडा की कुल 12 महिलाओं ने मिलकर इस इफ्तार की शुरुआत

Social media giving a big roll in the Iftar parties
Iftar parties - फोटो : bbc

नाजिया, जो इसे बड़ी सामाजिक कमी की तरह देख रही थीं, उन्होंने तय किया कि इस कमी को दूर किया जाना चाहिए। लेकिन अकेले ये सब कर पाना मुश्किल था, और इतने लोगों को एक साथ बुलाने के लिए बड़ी जगह भी चाहिए थी। ऐसे में नाजिया की मदद की उनके व्हाट्सऐप ग्रुप ने।

देशभर में रह रही करीब 500 हिंदू-मुसलमान महिलाओं का ये ग्रुप उन्होंने अपनी किताब 'मदरिंग अ मुस्लिम' के लिए देशाटन करते हुए बनाया था। इस तरह दिल्ली-नोएडा की कुल 12 महिलाओं ने मिलकर इस इफ्तार की शुरुआत की। और इसकी खासियत यही रही कि दोस्तों-रिश्तेदारों के अलावा बिलकुल अनजान लोगों ने भी इस इफ्तार में हिस्सा लिया। सिर्फ यही नहीं इसे आयोजित करने वाले 12 लोग भी एक दूसरे को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानते थे।

एक 5-6 साल की बेटी की मां और लेखिका शाजिया इरम बताती हैं, "मुझे अंदाज़ा नहीं था कि इतने लोगों ने कभी इफ्तार में हिस्सा नहीं लिया होगा। हालांकि किताब के लिए ट्रैवल करते वक्त मैं इतना तो समझ ही चुकी थी कि अब भी हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने एक मुसलमान का घर भीतर से नहीं देखा, उनके उत्सवों-त्योंहारों में भाग लेना अलग बात है। ऐसे में लगा कि इस मौके पर हम इस दूरी को पाटने के लिए एक कदम तो उठा ही सकते हैं।"

वो कहती हैं, "लोगों में मुसलमानों को, उनकी तहजीब को, उनकी औरतों को लेकर तमाम भ्रांतियां हैं, यहां तक कि एक सीएसडीएस स्टडी ये साबित करती है कि देश के सिर्फ 30 फीसदी हिंदुओं के मुसलमान करीबी दोस्त हैं। दो लोगों में नफरत तभी पनपती है जब वे एक दूसरे को जानते नहीं हैं। तो जब हम मिले, हमने रोज़े और इफ़्तार के बारे में बातचीत की तो हमने देखा कि हमारे बारे में स्टीरियोटाइप्स टूट रहे थे।"

नजरिए को साबित करता अनुभव-

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Iftar parties - फोटो : bbc

नाजिया की बात को बिलकुल सही साबित करता है दिल्ली के राहुल घोष का अनुभव। राहुल कहते हैं, "इफ्तार में जाने का ये पहला मौका था मेरे लिए। यहां मैं आत्मविश्वास से भरे, खूबसूरत दिखते इन युवा मुसलमान लड़के-लड़कियों से मिला, जो अपनी जिंदगी में काफी अच्छा कर रहे थे। इन लड़कियों में कोई बाइकर थी तो कोई पायलट, कोई लेखिका तो कोई वकील या नेता। इनसे मिलकर समझ आया कि मीडिया ने हमारे मन में मुसलमानों के लिए स्टीरियोटाइप बना दिए थे, लगता था जैसे इस तरह के पढ़े लिखे मुसलमान देश में हैं ही नहीं। मुझे इनसे मिलकर गर्व का अनुभव हुआ," राहुल ने बताया।

इसी तरह का अनुभव कुनाल छतवानी का भी था-
कुनाल ने बताया, "इससे पहले मुझे रमजान या इफ्तार के बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी। मुझे कोई अंदाजा था कि यूं भी मुसलमान परिवार अपने गैर-मुसलमान दोस्तों के लिए इफ्तार रखते हैं, और ये सामाजिक मेल-मिलाप बढ़ाने का एक तरीका है। मेरे लिए ये पहला इफ्तार था। बहुत अच्छा लगा मुझे दूसरे मत के परिवार से मिलना, उनकी संस्कृति को करीब से देखना। हमारे समाज को ऐसे और अनुभवों की बेहद जरूरत है।"

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संस्कृति का असर-

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Iftar parties - फोटो : bbc

कंचन बग्गा उन 12 महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने इफ्तार के लिए इंतजाम किए। उनके लिए इफ्तार में शामिल होने का पहला मौका तो नहीं था, लेकिन इफ्तार आयोजित कराने में पहली बार उन्होंने मदद की। उन्होंने कहा, "मैं साझी संस्कृति के माहौल में पली बढ़ी हूं, एक करीबी मुस्लिम दोस्त भी है, लेकिन पिछले कुछ समय से बिगड़ती देश की सामाजिक स्थिति ने मुझे काफी निराश किया है। मुझे खुशी है कि ऐसी पहल की गई और मैं चाहती हूं कि ऐसा हर साल किया जाए। मैं अगली बार फिर इसमें हिस्सा लेना चाहूंगी। एक थाली से खाते हुए आपस की भ्रांतियां दूर होते देखना वाकई सुखद है।"

पहला इफ्तार जहां नोएडा में हना खान के घर पर आयोजित किया गया वहीं दूसरा इफ्तार अली शेरवानी और निहारिका शेरवानी के घर अलकनंदा, दिल्ली में रखा गया। दोनों ही जगह करीब 30 के आस-पास बिलकुल अनजान लोगों ने हिस्सा लिया. सबसे पहले राना सफवी ने रोजे और फाके के बारे में बताया, इफ़्तार और उसकी सामाजिक जरूरत पर बात हुई, फिर बाकायदा खजूर और पानी के साथ रोजेदारों ने रोजा खोला, नमाज हुई, और फिर खाने और बातों का दौर काफी लंबा चलता रहा।

जान-पहचान से लेकर, सियासत, हिंदुस्तान-पाकिस्तान, क्रिकेट और बच्चों की परवरिश तक हर तरह की बातें हुईं। दूसरे इफ्तार के मेजबान अली शेरवानी और निहारिका मुसलमानों को स्टीरियोटाइप करने के मीडिया के नजरिये से नाराज नजर आए। इस बारे में अली का कहना था कि मौजूदा वक्त में हमें एक-दूसरे से कटने की नहीं, एक दूसरे को समझने की जरूरत है।

सोशल मीडिया पर तारीफ और सहयोग मिलाः आभा सिंह

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वकील आभा सिंह - फोटो : bbc

अली ने बताया, "मीडिया में अक्सर मुसलमानों की एकतरफा तस्वीर दिखाई जाती है। अभी सिविल सर्विसेज में 50-55 मुसलमान बच्चों ने अपनी जगह बनाई, मीडिया ने इस पर बात नहीं की। ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बन जाती है कि हम खुद अपने देश में अपने लोगों तक अपनी आवाज पहुंचाएं। धर्म एक निजी मसला है, जबकि मानवता समाज के लिए है।

अगर हम सब दूसरे धर्मों के बारे में अपने पूर्वाग्रह तोड़कर आपस में मिल-जुल सकें, बात कर सकें, तभी कुछ बदल सकेगा।" उनकी पत्नी निहारिका, जोकि होम फर्निशिंग का व्यवसाय संभालती हैं, उन्होंने कहा कि खाने पर मिलना, एक-दूसरे के बारे में जानने-समझने का सबसे अच्छा मौका हो सकता है। नाजिया की शुरुआत के बाद इस तरह के इफ्तार मुंबई, गुवाहाटी और हैदराबाद में भी आयोजित किए गए। मुंबई की आभा के लिए ये अनुभव न सिर्फ लखनऊ में बीते उनके बचपन की यादों को ताजा कर देने वाला था, बल्कि अनजाने इस मौके पर वे अचानक अपने पुराने दोस्त से भी मिलीं।

पेशे से वकील आभा सिंह ने बताया, "खुशी हुई कि ऐसा कुछ हमारे शहर में किया जा रहा था। ये बहुत ही अच्छी शुरुआत है हमारी मिली-जुली संस्कृति को बचाए रखने की।" इस नई शुरुआत को सोशल मीडिया पर जहां काफी तारीफ और सहयोग मिला वहीं कुछ लोगों ने यह कहकर आलोचना भी की कि अमीर हिंदुओं को इफ्तार पर बुलाने से कुछ नहीं बदलेगा। इस बारे में नाजिया और उसके साथियों का कहना था कि ये पहल अमीर या गरीब के लिए नहीं, सिर्फ एक दूसरे को जानने का एक मौका जुटाने के लिए की गई जोकि एक छोटे स्तर पर ही सही कामयाब हो रही है। 

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