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Shivsena: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद महाराष्ट्र में शिंदे सरकार का क्या होगा? आंकड़ों से समझें पूरा गणित

Thu, 11 May 2023 01:37 PM IST
हिमांशु मिश्रा स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Thu, 11 May 2023 01:37 PM IST
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सार
अब तक शिवसेना की लड़ाई में क्या-क्या हुआ? आगे क्या हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या कानूनी और सियासी मतलब है? आइए समझते हैं...
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Shivsena: Will the eknath Shinde government fall in Maharashtra after the Supreme Court verdict? Understand
उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महाराष्ट्र में शिवसेना में बगावत और शिंदे सरकार के गठन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पूरे घटनाक्रम को लेकर तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल की भूमिका को लेकर जरूर सवाल खड़े किए।कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल ने कानून के तहत काम नहीं किया। कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर उद्धव ठाकरे फ्लोर टेस्ट का सामना करते और इस्तीफा नहीं देते तो आज स्थिति कुछ और ही होती।


कोर्ट ने स्पीकर की भूमिका को लेकर भी टिप्पणी की। कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने इस पूरे मामले को सही से नहीं लिया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि चूंकि उद्धव ठाकरे ने बहुमत परीक्षण का सामना किए बिना ही इस्तीफा दे दिया ऐसे में पुरानी स्थिति बहाल नहीं हो सती है।   

 
उद्धव गुट ने बागी हुए शिंदे समेत 15 विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की थी। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सात जजों की बेंच को ट्रांसफर कर दिया। हालांकि, जब तक बेंच का फैसला नहीं आता है तब तक विधानसभा अध्यक्ष को फैसला लेने के लिए कहा। हालांकि, ये तय नहीं है कि वह कब तक फैसला लेंगे। 

सुप्रीम कोर्ट ने चीफ व्हिप को लेकर भी बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि विधायक चीफ व्हिप तय नहीं कर सकते। ये पार्टी का फैसला होगा। कोर्ट की ये टिप्पणी शिंदे गुट के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट का मामला सात जजों की बड़ी बेंच को सौंप दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आगे की सुनवाई सात जजों की बेंच करेगी। 

 

शिवसेना में अब तक क्या-क्या हुआ? 
2019 में महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव हुआ था। 288 विधानसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। देवेंद्र फडणवीस की अगुआई में पार्टी ने 105 सीटों पर जीत हासिल की। उद्धव ठाकरे की अगुआई वाली शिवसेना को 56, एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 42 सीटें मिलीं थीं।  बाकी अन्य पर छोटे दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत हासिल की। 

मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर शिवसेना और भाजपा में मुख्यमंत्री पद को लेकर ठन गई। बात इतनी बढ़ी की शिवसेना ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया। बाद में शिवसेना ने कांग्रेस, एनसीपी के साथ मिलकर सरकार का गठन किया। उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने।  

सरकार गठन के ढाई साल बाद हुई बगावत
सरकार गठन के ढाई साल बाद 20 जून 2022 को शिवसेना में बगावत हो गई।  एमएलसी चुनाव में शिवसेना के कई विधायकों ने भाजपा के उम्मीदवार को वोट किया। एक दिन बाद यानी 21 जून को ही उद्धव ठाकरे से नाखुश चल रहे विधायकों सूरत चले गए। इन विधायकों का नेतृत्व कैबिनेट मंत्री एकनाथ शिंदे कर रहे थे। यहां से ये सभी गुवाहाटी पहुंचे। इन विधायकों को मनाने के लिए 22 जून को शिवसेना प्रमुख के कहने पर तीन नेताओं का प्रतिनिधिमंडल बागी विधायकों से मिलने पहुंचा। हालांकि कुछ बात नहीं बनी। 

शिंदे गुट ने भाजपा से साथ मिलकर बनाई सरकार
इसके बाद करीब छह दिन बाद शिंदे गुट को मनाने के लिए उद्धव जुटे रहे, लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ। इस बीच, उद्धव ठाकरे गुट की शिकायत पर डिप्टी स्पीकर ने 16 बागी विधायकों को अयोग्यता का नोटिस दे दिया। इसके खिलाफ शिंदे गुट सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। कोर्ट ने डिप्टी स्पीकर की कार्रवाई पर 12 जुलाई तक रोक लगा दी। उधर, भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल से मिलकर फ्लोर टेस्ट की मांग कर दी। राज्यपाल ने भी इसके लिए आदेश जारी कर दिया। हालांकि, इसके पहले ही उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद भाजपा के समर्थन से 30 जून 2022 को एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बन गए। भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने डिप्टी सीएम का पद संभाला। 

फ्लोर टेस्ट में बहुमत साबित किया, चुनाव आयोग तक पहुंचा विवाद
चार जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में फ्लोर टेस्ट हुआ। इसमें एकनाथ शिंदे ने बहुमत साबित किया। शिंदे को सरकार बचाने के लिए 144 विधायकों का समर्थन चाहिए था। फ्लोर टेस्ट के दौरान 164 विधायकों ने शिंदे सरकार के पक्ष में वोट किया। विपक्ष में 99 वोट पड़े और 22 विधायक गैर हाजिर रहे। 

इसके बाद उद्धव गुट ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का रूख किया। चुनाव आयोग ने इसी साल फरवरी में अपना फैसला सुनाया। आयोग ने शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न दोनों ही एकनाथ शिंदे गुट को दे दिया। आयोग ने कहा कि शिंदे गुट ही असली शिवसेना है। चुनाव आयोग ने झटका लगने के बाद उद्धव ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट में पैरवी तेज कर दी।

17 फरवरी को पीठ ने शिवसेना के उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट की याचिकाओं पर सुनवाई की। 21 फरवरी से कोर्ट ने लगातार नौ दिन यह केस सुना था। 16 मार्च को सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने पर कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस मामले में कोर्ट ने उद्धव और शिंदे गुट के साथ-साथ केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल का पक्ष भी सुना। आज इसी मामले में कोर्ट का अहम फैसला आया। 

कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
  • शिंदे और 15 अन्य विधायकों को पिछले साल जून में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत करने के लिए अयोग्य नहीं ठहरा सकता है। यह अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास तब तक रहेगा, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच इसपर फैसला नहीं सुना देती।
  • फ्लोर टेस्ट को किसी पार्टी के आंतरिक विवाद को सुलझाने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते।
  • राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने यह निष्कर्ष निकालने में गलती की थी कि ठाकरे ने विधायकों के बहुमत का समर्थन खो दिया था।
  • राज्यपाल के पास फ्लोर टेस्ट बुलाने के लिए कोई पुख्ता आधार नहीं था। इस मामले में राज्यपाल के विवेक का प्रयोग कानून के अनुसार नहीं था।
  • सदन के स्पीकर का शिंदे गुट की ओर से प्रस्तावित स्पीकर गोगावले को चीफ व्हिप नियुक्त करना अवैध फैसला था। स्पीकर को सिर्फ राजनीतिक दल की ओर से नियुक्त व्हिप को ही मान्यता देनी चाहिए थी।

अब आगे क्या होगा? 
इसे समझने के लिए हमने राजनीतिक विश्लेषक आनंद त्रिपाठी से बात की। उन्होंने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट ने शिंदे सरकार के गठन की प्रक्रिया पर सवाल जरूर खड़े किए हैं, लेकिन इसके खिलाफ कोई फैसला नहीं सुनाया है। कोर्ट के फैसले से साफ है कि महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की सरकार कायम रहेगी। इसके साथ ही कोर्ट ने शिवसेना चुनाव चिह्न और नाम को लेकर भी चुनाव आयोग के फैसले पर किसी तरह का दखल न देने की बात कही है। मतलब साफ है कि ये शिंदे सरकार के लिए बड़ी राहत है।'

आनंद आगे कहते हैं, 'कोर्ट ने अपने फैसले में शिंदे सरकार के गठन की प्रक्रिया पर तीखी टिप्पणी की है। विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में उद्धव गुट इसी को लेकर शिंदे सरकार के खिलाफ बड़ी बेंच का रूख कर सकती है। इसके अलावा बागी विधायकों पर कार्रवाई की मांग को लेकर भी नए सिरे से उद्धव गुट काम शुरू कर सकती है।'

कोर्ट के फैसले का सियासी मतलब है? 
आनंद कहते हैं, 'भले ही शिंदे सरकार पर फिलहाल कोई खतरा नहीं है, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर ये उद्धव ठाकरे गुट की भी बड़ी जीत है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं, उसके बड़े सियासी मायने हैं। उद्धव गुट आने वाले चुनावों में इसका फायदा उठाने की कोशिश करेगा। जनता के बीच ये बताने की कोशिश होगी कि गलत तरीके से उनके विधायकों को तोड़ा गया और शिंदे ने सरकार बनाई। वह कोर्ट की इस टिप्पणी के सियासी संदेश को जनता के बीच पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं।'
 

सात जजों की बेंच क्या फैसला करेगी? 
इसे समझने के लिए हमने संविधान विशेषज्ञ कनु सारदा से संपर्क किया। उन्होंने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला उद्धव ठाकरे की नैतिक जीत है। कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष से लेकर राज्यपाल तक की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने इस मामले को सात जजों की बेंच के पास ट्रांसफर भी किया है। ये बेंच राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों को पर फैसला सुनाएगी। इसमें ये तय होगा कि इस तरह के मामलों में क्या होना चाहिए? विधायकों को अयोग्य ठहराना चाहिए या नहीं? चीफ व्हिप को कैसे डिसाइड किया जा सकता है? राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष के पास क्या शक्तियां होती हैं?'
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