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शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में कल भी होगी सुनवाई, शिंदे गुट ने किया चुनाव आयोग के फैसले का बचाव; क्या कहा?
Tue, 15 Sep 2026 07:47 PM IST
देवेश त्रिपाठी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Tue, 15 Sep 2026 07:47 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को शिवसेना में टूट और पार्टी के नाम-चुनाव चिह्न से जुड़े मामले की सुनवाई फिर शुरू हुई। शिंदे गुट ने निर्वाचन आयोग के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि आयोग को राजनीतिक दल के संविधान और संगठनात्मक ढांचे की जांच करने का अधिकार है।
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शिवसेना में टूट का विवाद
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को शिवसेना में टूट से जुड़े मामले में अंतिम सुनवाई फिर शुरू की। मामले में महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार किया गया था। सुनवाई के दौरान शिंदे गुट ने निर्वाचन आयोग के उस फैसले का बचाव किया, जिसमें उसे 'असली' शिवसेना माना गया था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ उद्धव ठाकरे गुट की उस याचिका पर भी सुनवाई कर रही है, जिसमें निर्वाचन आयोग के 17 फरवरी 2023 के आदेश को चुनौती दी गई है। इस आदेश में शिवसेना का नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न शिंदे गुट को आवंटित किया गया था।
शिंदे गुट के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में दी क्या दलील?
शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को किसी राजनीतिक दल के संविधान और संगठनात्मक ढांचे के लोकतांत्रिक स्वरूप की जांच करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि आयोग यह तय कर सकता है कि कौन सा गुट वास्तविक राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करता है।
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कौल ने कहा, 'आपको पूरे रिकॉर्ड को देखना होगा। सवाल यह है कि संविधान निर्वाचन आयोग के पास था या नहीं।' उन्होंने कहा कि ठाकरे गुट जिस संविधान पर भरोसा कर रहा है, वह निर्वाचन आयोग के पास पंजीकृत नहीं था। वहीं, 1999 में आयोग को सौंपे गए संविधान के संबंध में चुनाव प्राधिकरण और पार्टी के बीच विस्तृत पत्राचार हुआ था।
चुनाव आयोग के फैसले के बचाव में क्या बोला शिंदे गुट?
कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग यह तय नहीं कर रहा था कि पार्टी के संविधान में कौन से संशोधन किए जाने चाहिए या नहीं किए जाने चाहिए। आयोग यह देख रहा था कि संगठनात्मक ढांचा पार्टी के कार्यकर्ताओं की इच्छा को दर्शाता है या नहीं। उन्होंने कहा, 'अगर तदर्थ नियुक्तियां और निर्वाचित नहीं हुए पदाधिकारी हैं, तो संगठनात्मक ढांचा जरूरी नहीं कि कार्यकर्ताओं की इच्छा को दर्शाए।'
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि निर्वाचन आयोग कई दशकों से राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक कामकाज और उनके संविधानों को लेकर उनसे पत्राचार करता रहा है। उनके मुताबिक, ऐसी जांच संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को मिले व्यापक अधिकारों के दायरे में आती है।
चुनाव आयोग ने किस आधार पर लिया था फैसला?
कौल ने कहा, 'निर्वाचन आयोग आंतरिक चुनावों को रद्द नहीं कर रहा है और न ही यह तय कर रहा है कि किसी व्यक्ति का चुनाव सही तरीके से हुआ था या गलत तरीके से, जैसा कोई दीवानी अदालत करती है।' उन्होंने कहा कि आयोग उचित कसौटी लागू करते हुए पार्टी के संविधान, संगठनात्मक ढांचे और विधायी शाखा की जांच कर सकता है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि केवल किसी पार्टी के संविधान के अस्तित्व के कारण निर्वाचन आयोग को उसके संगठनात्मक ढांचे की जांच करने से नहीं रोका जा सकता, खासकर तब जब संगठन के बड़े हिस्से का संचालन तदर्थ नियुक्तियों के जरिये किया जा रहा हो।
शिंदे गुट ने बताया क्यों हुई शिवसेना में टूट?
राजनीतिक दल में टूट और उसके विधायी दल में टूट के बीच कानूनी अंतर से जुड़े सवाल पर कौल ने कहा कि शिंदे गुट का मामला राजनीतिक दल में टूट का है। उन्होंने कहा, 'हमारा मामला कभी यह नहीं रहा कि केवल विधायी दल में टूट हुई थी। हमारा मामला यह है कि राजनीतिक दल में टूट हुई थी।'
कौल ने शिवसेना के कार्यकर्ताओं में उन राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन को लेकर कथित असंतोष का भी जिक्र किया, जिन्हें वे पार्टी के वैचारिक सिद्धांतों के खिलाफ मानते थे। उन्होंने कहा कि संगठनात्मक बहुमत की कसौटी प्रासंगिक है, क्योंकि निर्वाचन आयोग किसी राजनीतिक दल के प्रत्येक प्राथमिक सदस्य के बीच जनमत संग्रह नहीं करा सकता।
जारी रहेगी मामले की सुनवाई
उन्होंने कहा, 'राजनीतिक दल की जान उसके कार्यकर्ता और जमीनी स्तर के वे कार्यकर्ता हैं, जो सीधे मतदाताओं से जुड़े होते हैं।' कौल ने कहा कि अगर पार्टी के कार्यकर्ताओं और तदर्थ तरीके से नामित निकायों के बीच जुड़ाव नहीं है, तो संगठनात्मक बहुमत की कसौटी अपना महत्व खो देगी।
मामले में मंगलवार को सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। अब बुधवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। 2 सितंबर को भी शिंदे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने पार्टी प्रमुख के हाथों में सत्ता के केंद्रीकरण को रोकने और संगठन को अधिक 'लोकतांत्रिक' बनाने के लिए जो संगठनात्मक ढांचा तैयार किया था, उसमें 2018 में उद्धव ठाकरे ने महत्वपूर्ण बदलाव किए थे।
कौल ने कहा था कि निर्वाचन आयोग के निर्देश के बाद सभी राजनीतिक दलों को अपने संविधान का ब्योरा आयोग के रिकॉर्ड में जमा कराना था और इसी प्रक्रिया के तहत शिवसेना ने 1999 में अपना संविधान सौंपा था। उन्होंने कहा था कि 2012 में बाल ठाकरे के निधन के बाद पार्टी ने उस संगठनात्मक ढांचे में बुनियादी बदलाव किए।
ठाकरे गुट ने किया था चुनाव आयोग के फैसले का विरोध
वहीं, उद्धव ठाकरे गुट ने पहले सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले समूह की ओर से शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल 'अवैध' है। ठाकरे गुट ने शीर्ष अदालत से आग्रह किया था कि यदि वह तत्काल चुनाव चिह्न उसे वापस नहीं देती है तो कम से कम शिंदे गुट को शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोका जाए।
पीठ 2024 में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं में निर्वाचन आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न शिंदे गुट को आवंटित किया गया था। याचिकाओं में 17 फरवरी 2023 के उस आदेश को भी चुनौती दी गई है, जिसमें निर्वाचन आयोग ने शिंदे गुट को मूल शिवसेना के रूप में मान्यता दी थी।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ उद्धव ठाकरे गुट की उस याचिका पर भी सुनवाई कर रही है, जिसमें निर्वाचन आयोग के 17 फरवरी 2023 के आदेश को चुनौती दी गई है। इस आदेश में शिवसेना का नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न शिंदे गुट को आवंटित किया गया था।
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शिंदे गुट के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में दी क्या दलील?
शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को किसी राजनीतिक दल के संविधान और संगठनात्मक ढांचे के लोकतांत्रिक स्वरूप की जांच करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि आयोग यह तय कर सकता है कि कौन सा गुट वास्तविक राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करता है।
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कौल ने कहा, 'आपको पूरे रिकॉर्ड को देखना होगा। सवाल यह है कि संविधान निर्वाचन आयोग के पास था या नहीं।' उन्होंने कहा कि ठाकरे गुट जिस संविधान पर भरोसा कर रहा है, वह निर्वाचन आयोग के पास पंजीकृत नहीं था। वहीं, 1999 में आयोग को सौंपे गए संविधान के संबंध में चुनाव प्राधिकरण और पार्टी के बीच विस्तृत पत्राचार हुआ था।
चुनाव आयोग के फैसले के बचाव में क्या बोला शिंदे गुट?
कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग यह तय नहीं कर रहा था कि पार्टी के संविधान में कौन से संशोधन किए जाने चाहिए या नहीं किए जाने चाहिए। आयोग यह देख रहा था कि संगठनात्मक ढांचा पार्टी के कार्यकर्ताओं की इच्छा को दर्शाता है या नहीं। उन्होंने कहा, 'अगर तदर्थ नियुक्तियां और निर्वाचित नहीं हुए पदाधिकारी हैं, तो संगठनात्मक ढांचा जरूरी नहीं कि कार्यकर्ताओं की इच्छा को दर्शाए।'
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि निर्वाचन आयोग कई दशकों से राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक कामकाज और उनके संविधानों को लेकर उनसे पत्राचार करता रहा है। उनके मुताबिक, ऐसी जांच संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को मिले व्यापक अधिकारों के दायरे में आती है।
चुनाव आयोग ने किस आधार पर लिया था फैसला?
कौल ने कहा, 'निर्वाचन आयोग आंतरिक चुनावों को रद्द नहीं कर रहा है और न ही यह तय कर रहा है कि किसी व्यक्ति का चुनाव सही तरीके से हुआ था या गलत तरीके से, जैसा कोई दीवानी अदालत करती है।' उन्होंने कहा कि आयोग उचित कसौटी लागू करते हुए पार्टी के संविधान, संगठनात्मक ढांचे और विधायी शाखा की जांच कर सकता है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि केवल किसी पार्टी के संविधान के अस्तित्व के कारण निर्वाचन आयोग को उसके संगठनात्मक ढांचे की जांच करने से नहीं रोका जा सकता, खासकर तब जब संगठन के बड़े हिस्से का संचालन तदर्थ नियुक्तियों के जरिये किया जा रहा हो।
शिंदे गुट ने बताया क्यों हुई शिवसेना में टूट?
राजनीतिक दल में टूट और उसके विधायी दल में टूट के बीच कानूनी अंतर से जुड़े सवाल पर कौल ने कहा कि शिंदे गुट का मामला राजनीतिक दल में टूट का है। उन्होंने कहा, 'हमारा मामला कभी यह नहीं रहा कि केवल विधायी दल में टूट हुई थी। हमारा मामला यह है कि राजनीतिक दल में टूट हुई थी।'
कौल ने शिवसेना के कार्यकर्ताओं में उन राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन को लेकर कथित असंतोष का भी जिक्र किया, जिन्हें वे पार्टी के वैचारिक सिद्धांतों के खिलाफ मानते थे। उन्होंने कहा कि संगठनात्मक बहुमत की कसौटी प्रासंगिक है, क्योंकि निर्वाचन आयोग किसी राजनीतिक दल के प्रत्येक प्राथमिक सदस्य के बीच जनमत संग्रह नहीं करा सकता।
जारी रहेगी मामले की सुनवाई
उन्होंने कहा, 'राजनीतिक दल की जान उसके कार्यकर्ता और जमीनी स्तर के वे कार्यकर्ता हैं, जो सीधे मतदाताओं से जुड़े होते हैं।' कौल ने कहा कि अगर पार्टी के कार्यकर्ताओं और तदर्थ तरीके से नामित निकायों के बीच जुड़ाव नहीं है, तो संगठनात्मक बहुमत की कसौटी अपना महत्व खो देगी।
मामले में मंगलवार को सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। अब बुधवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। 2 सितंबर को भी शिंदे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने पार्टी प्रमुख के हाथों में सत्ता के केंद्रीकरण को रोकने और संगठन को अधिक 'लोकतांत्रिक' बनाने के लिए जो संगठनात्मक ढांचा तैयार किया था, उसमें 2018 में उद्धव ठाकरे ने महत्वपूर्ण बदलाव किए थे।
कौल ने कहा था कि निर्वाचन आयोग के निर्देश के बाद सभी राजनीतिक दलों को अपने संविधान का ब्योरा आयोग के रिकॉर्ड में जमा कराना था और इसी प्रक्रिया के तहत शिवसेना ने 1999 में अपना संविधान सौंपा था। उन्होंने कहा था कि 2012 में बाल ठाकरे के निधन के बाद पार्टी ने उस संगठनात्मक ढांचे में बुनियादी बदलाव किए।
ठाकरे गुट ने किया था चुनाव आयोग के फैसले का विरोध
वहीं, उद्धव ठाकरे गुट ने पहले सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले समूह की ओर से शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल 'अवैध' है। ठाकरे गुट ने शीर्ष अदालत से आग्रह किया था कि यदि वह तत्काल चुनाव चिह्न उसे वापस नहीं देती है तो कम से कम शिंदे गुट को शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोका जाए।
पीठ 2024 में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं में निर्वाचन आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न शिंदे गुट को आवंटित किया गया था। याचिकाओं में 17 फरवरी 2023 के उस आदेश को भी चुनौती दी गई है, जिसमें निर्वाचन आयोग ने शिंदे गुट को मूल शिवसेना के रूप में मान्यता दी थी।