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अयोध्या में नहीं लखनऊ के हुसैनाबाद में शिया वक्फ बोर्ड चाहता है मस्जिद-ए-अमन

Mon, 20 Nov 2017 08:25 PM IST
शशिधर पाठक/ नई दिल्ली
शशिधर पाठक/ नई दिल्ली Updated Mon, 20 Nov 2017 08:25 PM IST
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Shia Waqf Board wants Masjid-e-Aman in Lucknow's Husainabad not in Ayodhya

शिया वक्फ बोर्ड ने सद्भावपूर्ण इच्छाशक्ति दिखाई है। वक्फबोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने दिगंबर अखाड़े के सुरेश दास, हनुमान गढ़ी के महंत धर्मदास,निर्मोही अखाड़े के भास्करदास की सहमति पर राम मंदिर निर्माण के संबंध में उच्चतम् न्यायालय में 18 नंवंबर को एक शपथ पत्र दाखिल किया है। 

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इस शपथ पत्र को महंत नृत्य गोपाल दास, डा. राम विलास वेदांती और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेन्द्र गिरी का समर्थन हासिल है। शपथ पत्र के अनुसार शिया वक्फ बोर्ड चाहता है कि अयोध्या में विवादित स्थान पर राम मंदिर तथा लखनऊ के हुसैनाबाद में घंटाघर के सामने शिया वक्फबोर्ड की जमीन पर भव्य मस्जिद का निर्माण हो और इसका नाम मस्जिद-ए-अमन रखा जाए। 
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अमर उजाला पिछले सप्ताह इस आधार पर सहमति बनने की खबर प्रकाशित की थी। डॉ. राम विलास वेदांती के अनुसार यह सबसे अच्छा फार्मूला है। इस आधार पर राम मंदिर जन्मभूमि विवाद का सुखद हल हो सकता है। 
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शिया वक्फ बोर्ड और अयोध्या के राम जन्मभूमि न्यास से जुड़े संत समाज की यह सहमति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल तथा उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की निजी स्तर पर सोच का भी समथन करती है। 

राज्यसभा सांसद विनय कटियार पहले ही कह चुके हैं कि वह अयोध्या में जमीन को बंटने नहीं देंगे। जहां राम लला विराजमान हैं वहां राम मंदिर बनेगा और उसके आस-पास कोई मस्जिद नहीं होगी। 

राम मंदिर निर्माण के समय सक्रिय रहने वाले महरौली स्थित प्राचीन योगशक्ति पीठ के प्रमुख रसायनी बाबा का कहना है कि इस आधार पर सहमति बन जाए। उच्चतम न्यायालय इस आधार पर निर्णय दे दो बहुत अच्छा है। 


सबकी निगाहें उच्चतम न्यायालय पर

सुन्नी वक्फ बोर्ड का तेवर भी राम मंदिर निर्माण की दिशा में माने रखेगा। पांच दिसंबर से राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर उच्चतम न्यायालय नियमित सुनवाई करेगा। इसके लिए सभी पक्षकार अपने स्तर पर तैयार हैं। आम सहमति के प्रयास भी जारी हैं। आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर भी इसमें मध्यस्थता करने की पहल शुरू कर चुके हैं। सुन्नी समाज इस मामले में अभी खुलकर अपने पत्ते नहीं खोल रहा है। ऐसे में सभी की निगाहें उच्चतम न्यायालय में पांच दिसंबर से नियमित होने वाली सुनवाई पर टिकी है।

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