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शक्ति की समृद्धि: आर्थिक आत्मनिर्भरता देगी नारी शक्ति को नई उड़ान, घर से बदलाव की शुरुआत
Mon, 09 Mar 2026 04:25 AM IST
Nitin Gautam
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Mon, 09 Mar 2026 04:25 AM IST
सार
महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर करने के उद्देश्य से अमर उजाला बोनस द्वारा शक्ति की समृद्धि कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में ओलंपिक मेडल विजेता पहलवान साक्षी मलिक, राज्यसभा सांसद रेखा शर्मा समेत कई गणमान्य लोग शामिल हुए।
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महिलाओं में आर्थिक निर्भरता की नई उड़ान
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित 'शक्ति की समृद्धि' कार्यक्रम में नारी सशक्तीकरण का स्वर पूरे उत्साह के साथ गूंजा। विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुकी महिलाओं ने मंच साझा करते हुए आत्मनिर्भरता, नेतृत्व और सामाजिक भागीदारी के अनुभव बांटे तथा विकसित भारत के निर्माण में नारी शक्ति की निर्णायक भूमिका पर जोर दिया। अमर उजाला बोनस की ओर से आयोजित कार्यक्रम में व्यवसाय, शिक्षा, न्याय, खेल, चिकित्सा, सामाजिक सेवा, विज्ञान और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में काम कर रहीं सैकड़ों महिलाओं ने हिस्सा लिया और सफलता और संघर्ष की प्रेरक कहानियां साझा कीं। कार्यक्रम का उद्देश्य महिलाओं को वित्तीय आत्म निर्भर बनाना और उनके आत्मबल को मजबूत करना और देश के विकास में उनकी भूमिका को रेखांकित करना रहा।
एसआईपी से सपनों तक
महिलाओं की आर्थिक साक्षरता पर हुए पैनल डिस्कशन में वित्तीय एक्सपर्ट सारिका चावला और अवनीत कौर ने महिलाओं को मेंटल कंडीशनिंग और खर्च की मानसिकता से बाहर निकलने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि एसआईपी एक महिला के लिए सर्व इच्छा पूर्ति के जैसा है। उन्हें छोटे कदमों से बड़े एक्सपोजर की तरफ जाना चाहिए। सारिका चावला ने कहा कि उन्हें कोविड में अपने पति की मौत के बाद यह अहसास हुआ कि पैसे से महिलाओं का संबंध केवल खर्च से नहीं है। इस माइंडसेट से निकलना होगा। वहीं अवनीत कौर ने बताया महिलाओं के लिए भी इमरजेंसी फंड बहुत जरूरी है इसके साथ ही मैटरनिटी जैसी स्थितियां भी उनके साथ होती हैं तो उन्हें टर्म और लाइफ इंश्योरेंश के साथ हेल्थ इंश्योरेंश भी जरूरी है। ताकि अचानक आने वाली परेशानियों से वह खुद निपट सकें।
ईच वन, टीच टेन से बढ़ेगी नारी शक्ति
महिलाओं के सशक्तिकरण पर विशेष सत्र आयोजित किया गया। यशोदा अस्पताल की निदेशक उपासना अरोड़ा ने कहा कि उन्होंने हमेशा गुणवत्ता को प्राथमिकता दी। उनका मानना है कि एक अच्छी लीडर वही होती है जो नए लीडर तैयार करे। वे ‘ईच वन, टीच टेन’ के मंत्र पर काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार में एआरटीओ इज्या तिवारी ने कहा कि पीएम जन धन योजना ने महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसी प्रेरणा से प्रशासनिक सेवा में आने का फैसला किया। डिप्टी जेलर ज्ञान लता ने कहा कि अब कारागार केवल सजा की जगह नहीं, बल्कि सुधार गृह के रूप में काम कर रहे हैं। एंटरप्रेन्योर और शिक्षाविद रति गुप्ता ने बताया कि उनकी सोसाइटी की महिलाओं ने प्लास्टिक रीसाइकिल कर अन्य सोसाइटियों को स्वच्छता का संदेश दिया है।
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'बदलाव की शुरुआत घर से करें'
राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रेखा शर्मा ने महिलाओं के अधिकार, नेतृत्व क्षमता और समाज में बदलाव की जरूरत पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि महिलाओं को अपने अधिकार जानने और परिवार से ही बदलाव की शुरुआत करनी चाहिए। रेखा शर्मा ने कहा कि भारत में जहां शिव की पूजा होती है, वहीं शक्ति की भी पूजा की जाती है। इसलिए सबसे पहले महिलाओं को यह समझना चाहिए कि संविधान ने उन्हें कौन-कौन से अधिकार दिए हैं। उन्होंने कहा कि महिलाएं जन्म से ही नेतृत्व क्षमता लेकर आती हैं। हम दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती को शक्ति के रूप में पूजते हैं, लेकिन समाज में कई बार बेटियों के साथ भेदभाव देखने को मिलता है। कई परिवारों में तीसरी बेटी तब पैदा होती है जब बेटा पाने की इच्छा होती है।
रेखा शर्मा ने कहा कि महिलाएं घर और बाहर दोनों जगह जिम्मेदारी निभाती हैं, लेकिन बेटों को घर के काम सिखाने की परंपरा अभी भी कमजोर है। बच्चों की परवरिश में भी फर्क किया जाता है, बेटियों को किचन सेट और बेटों को इंजीनियरिंग के खिलौने दिए जाते हैं, यहां तक कि रंग भी अलग तय कर दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि बदलाव की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए। बेटियों को भी वही मौके मिलने चाहिए जो बेटों को मिलते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में महिलाओं को बराबरी का अधिकार लंबे समय से मिला हुआ है और देश ने महिला प्रधानमंत्री भी दी है। समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में पत्रकारिता की भी बड़ी भूमिका है और सकारात्मक रिपोर्टिंग से महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल सकती है।
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एसआईपी से सपनों तक
महिलाओं की आर्थिक साक्षरता पर हुए पैनल डिस्कशन में वित्तीय एक्सपर्ट सारिका चावला और अवनीत कौर ने महिलाओं को मेंटल कंडीशनिंग और खर्च की मानसिकता से बाहर निकलने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि एसआईपी एक महिला के लिए सर्व इच्छा पूर्ति के जैसा है। उन्हें छोटे कदमों से बड़े एक्सपोजर की तरफ जाना चाहिए। सारिका चावला ने कहा कि उन्हें कोविड में अपने पति की मौत के बाद यह अहसास हुआ कि पैसे से महिलाओं का संबंध केवल खर्च से नहीं है। इस माइंडसेट से निकलना होगा। वहीं अवनीत कौर ने बताया महिलाओं के लिए भी इमरजेंसी फंड बहुत जरूरी है इसके साथ ही मैटरनिटी जैसी स्थितियां भी उनके साथ होती हैं तो उन्हें टर्म और लाइफ इंश्योरेंश के साथ हेल्थ इंश्योरेंश भी जरूरी है। ताकि अचानक आने वाली परेशानियों से वह खुद निपट सकें।
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ईच वन, टीच टेन से बढ़ेगी नारी शक्ति
महिलाओं के सशक्तिकरण पर विशेष सत्र आयोजित किया गया। यशोदा अस्पताल की निदेशक उपासना अरोड़ा ने कहा कि उन्होंने हमेशा गुणवत्ता को प्राथमिकता दी। उनका मानना है कि एक अच्छी लीडर वही होती है जो नए लीडर तैयार करे। वे ‘ईच वन, टीच टेन’ के मंत्र पर काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार में एआरटीओ इज्या तिवारी ने कहा कि पीएम जन धन योजना ने महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसी प्रेरणा से प्रशासनिक सेवा में आने का फैसला किया। डिप्टी जेलर ज्ञान लता ने कहा कि अब कारागार केवल सजा की जगह नहीं, बल्कि सुधार गृह के रूप में काम कर रहे हैं। एंटरप्रेन्योर और शिक्षाविद रति गुप्ता ने बताया कि उनकी सोसाइटी की महिलाओं ने प्लास्टिक रीसाइकिल कर अन्य सोसाइटियों को स्वच्छता का संदेश दिया है।
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'बदलाव की शुरुआत घर से करें'
राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रेखा शर्मा ने महिलाओं के अधिकार, नेतृत्व क्षमता और समाज में बदलाव की जरूरत पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि महिलाओं को अपने अधिकार जानने और परिवार से ही बदलाव की शुरुआत करनी चाहिए। रेखा शर्मा ने कहा कि भारत में जहां शिव की पूजा होती है, वहीं शक्ति की भी पूजा की जाती है। इसलिए सबसे पहले महिलाओं को यह समझना चाहिए कि संविधान ने उन्हें कौन-कौन से अधिकार दिए हैं। उन्होंने कहा कि महिलाएं जन्म से ही नेतृत्व क्षमता लेकर आती हैं। हम दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती को शक्ति के रूप में पूजते हैं, लेकिन समाज में कई बार बेटियों के साथ भेदभाव देखने को मिलता है। कई परिवारों में तीसरी बेटी तब पैदा होती है जब बेटा पाने की इच्छा होती है।
रेखा शर्मा ने कहा कि महिलाएं घर और बाहर दोनों जगह जिम्मेदारी निभाती हैं, लेकिन बेटों को घर के काम सिखाने की परंपरा अभी भी कमजोर है। बच्चों की परवरिश में भी फर्क किया जाता है, बेटियों को किचन सेट और बेटों को इंजीनियरिंग के खिलौने दिए जाते हैं, यहां तक कि रंग भी अलग तय कर दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि बदलाव की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए। बेटियों को भी वही मौके मिलने चाहिए जो बेटों को मिलते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में महिलाओं को बराबरी का अधिकार लंबे समय से मिला हुआ है और देश ने महिला प्रधानमंत्री भी दी है। समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में पत्रकारिता की भी बड़ी भूमिका है और सकारात्मक रिपोर्टिंग से महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल सकती है।