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फलों के राजा आम पर भी कोरोना का असर, बाजार में अब भी नहीं बन पाई पहुंच

Tue, 21 Apr 2020 05:10 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 21 Apr 2020 05:10 PM IST
सार

  • दक्षिण भारत के आम के व्यवसाय को भारी नुकसान हुआ
  • उत्तर भारत में बारिश और आंधी से आम की फसलों को हुआ नुकसान, बाजार न खुलने से यहां भी काफी असर पड़ने की उम्मीद
  • एपीडा ने कहा, कोरोना काल में भी फलों-सब्जियों के निर्यात को प्रोत्साहित करने की हो रही कोशिश

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severe impact of lockdown on mango also, you may still miss the mangoes in market
MANGO - फोटो : AmarUjala (सांकेतिक)

विस्तार

अप्रैल का महीना अपने अंत की ओर बढ़ रहा है, लेकिन बाजार में आम अभी भी बहुत कम दिखाई पड़ रहे हैं। आम के व्यापारियों और किसानों का कहना है कि कोरोना के कारण आम के किसानों को भारी नुकसान होने की आशंका है।

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दक्षिण भारत से आने वाले आमों का समय अपने अंत की ओर बढ़ रहा है, लेकिन अभी तक बाजार में उनकी पहुंच नहीं हो पाई है। इस तरह दक्षिण भारत के आम के किसानों और व्यापारियों को कोरोना के कारण काफी नुकसान हो चुका है।
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जबकि उत्तर भारत के आमों का सीजन अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन जिस तरह बाजार में बंदी बनी हुई है, यहां के किसानों को भी काफी नुकसान होने की आशंका है।
 
'यूपी रत्न' पुरस्कार से सम्मानित मुजफ्फरनगर के आम के व्यवसायी मुस्तफा ने अमर उजाला को बताया कि दक्षिण भारत से आने वाले सफेदा, सुर्खा, बेगमपल्ली और गुजरात का केसर अभी तक बाजारों में नहीं पहुंच सका है।
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महाराष्ट्र का प्रसिद्ध अलफांसो आम अभी तक लोगों तक नहीं पहुंच पाया है, जबकि मई अंत तक इनका सीजन खत्म मान लिया जाता है। कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन के कारण इनकी फसल बाजारों तक नहीं पहुंच पाई।

मंडी में किसान इन्हें औने-पौने दामों पर बिचौलियों को बेचने को मजबूर हुए। स्थानीय बाजारों में भी इनकी खपत न के बराबर हो पाई जिसका खामियाजा किसानों और व्यापारियों को भुगतना पड़ा।
 
मलीहाबाद, लखनऊ के आम के व्यवसायी और किसान कदीम ने बताया कि उत्तर प्रदेश के दशहरी आम, लंगड़ा, चौसा, हुसनारा, गुलाब खास और लखनऊ सफेदा पूरे देश में पसंद किए जाते हैं।

इनका विदेशों में निर्यात भी होता है, लेकिन इस साल ठंड के लंबे खिंचने, बारिश-ओले और आंधी से फसलों को काफी नुकसान हुआ है। अनुमान है कि आम की फसल को 40 फीसदी तक नुकसान हो चुका है। लेकिन अभी भी मौसम खराब बना हुआ है जिसका असर पड़ सकता है।
 
'मोदी आम' तैयार कर सुर्खियां बटोर चुके कदीम के मुताबिक अगर आने वाले दिनों में मौसम का साथ मिलता है, तो कुछ फसल तैयार हो जाएगी, लेकिन इसके बाद भी इन्हें बाजारों तक पहुंचाना बड़ी चुनौती होगी।

इस समय बागों में कामकाज के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं, इसलिए लॉकडाउन खुलने पर भी आम को बाजारों तक पहुंचाने में परेशानी आ सकती है।

विदेशी बाजारों में पहुंच न के बराबर

भारत आम के उत्पादन के मामले में पूरी दुनिया में नंबर एक है। लेकिन भारत के कुल आम के उत्पादन का लगभग 98 फीसदी घरेलू बाजार में ही खप जाता है। लगभग दो फीसदी उत्पाद अमेरिकी, यूरोपीय और मध्य पूर्व के बाजारों में सप्लाई किया जाता है।
 
आम व्यवसाय के प्रमोशन से जुड़े सचिन अवस्थी के मुताबिक, लेकिन इसके बाद भी इससे भारत को अच्छी विदेशी मुद्रा की आय होती है। लेकिन कोरोना के कारण इस समय पूरा अमेरिकी, यूरोपीय बाजार ध्वस्त हुआ पड़ा है।

मध्य-पूर्व के बाजारों के भी खुलने की नजदीक में कोई उम्मीद नहीं दिखाई पड़ रही है। इसका भारी खामियाजा भारत के आम व्यापारियों को भुगतना पड़ा है।
 
राजधानी के दिल्ली हाट और चंडीगढ़ के पंजौर गार्डेन में आमों के व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए हर साल मेले लगाए जाते हैं। इनमें आम की हजारों किस्में दिखाकर बाजार को प्रोत्साहित किया जाता है। 

इन मेलों से आम व्यापारियों को देश से लेकर विदेश तक के बाजारों में नए-नए अवसर मिलते हैं, लेकिन इस वर्ष इन मेलों के आयोजन पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

आम की प्रोसेसिंग ही एकमात्र विकल्प

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर संजय सिंह ने बताया कि अनाजों की खरीद के लिए बने फ़ूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की तरह फलों की खरीद के लिए किसी मैकेनिज्म का न होना इस सेक्टर के किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या है।

फसलों के उत्पादन के बाद उनकी बिक्री और आपूर्ति पूरी तरह बाजार के भरोसे काम करता है। इनके स्टोरिंग की उचित व्यवस्था हमारे देश में उपलब्ध नहीं है। ऐसे में जब बाजार में मांग होती है तो किसानों को अच्छा दाम मिल जाता है, लेकिन किसी संकट के समय उनकी सुरक्षा नहीं हो पाती।

अगर सरकार आमों की खरीद और बिक्री की सही व्यवस्था बना सके तो किसानों को नुकसान से बचाया जा सकेगा।
 
उन्होंने बताया कि अगर बाजार में किसी फल की मांग नहीं भी है, तो भी उसकी प्रोसेसिंग कर दूसरे उपयोगी उत्पादों में बदलने से उनको लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सकेगा।

इससे उनके उपयोग की समयसीमा भी बढ़ाई जा सकेगी और किसानों को भी नुकसान से बचाया जा सकेगा। इसके लिए सरकार और प्राइवेट सेक्टर से निवेश किया जाना चाहिए।

एपीडा की मदद से दिख रही राह

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के मुताबिक कोरोना काल में भी भारतीय किसानों के उत्पादों को विदेशी बाजारों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

अभी तक 24 करोड़ टन हरी सब्जियां मुंबई बंदरगाह से फ्रैंकफर्ट, जर्मनी भेजी जा चुकी हैं। भारत में लगभग 200 आमों की अच्छी प्रजातियां पाई जाती हैं और इनके निर्यात पर भी जोर दिया जा रहा है।    

 

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