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UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: कई दलों ने किया स्वागत, कुछ ने जातई नाराजगी; जानें किसने क्या कहा

Thu, 29 Jan 2026 10:11 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु चंदेल Updated Thu, 29 Jan 2026 10:11 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी से मार्च तक जवाब मांगा है। तब तक इन नियमों पर रोक जारी रहेगी। यह मामला न केवल शिक्षा नीति, बल्कि सामाजिक न्याय और राजनीति के बड़े सवालों से जुड़ गया है। अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि सरकार और यूजीसी अदालत में क्या सफाई देते हैं और आगे किस तरह का संतुलित समाधान निकलता है। आइए इस मामले को विस्तार से समझते हैं।

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Several political parties reactions over Supreme Court stays UGC new rules bsp congress cpiml
यूजीसी। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

विश्वविद्यालय परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशंस पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। अदालत के इस फैसले पर विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं रही। बसपा, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने फैसले का स्वागत किया है, जबकि वामपंथी दल सीपीआई(एमएल) लिबरेशन ने अदालत की टिप्पणियों पर गहरी नाराजगी जताई है।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई रोक?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूजीसी के नए नियम पहली नजर में अस्पष्ट हैं और इनके दूरगामी असर हो सकते हैं। अदालत के मुताबिक, यह ढांचा समाज को बांट सकता है और इसका प्रभाव खतरनाक हो सकता है। इसी आधार पर कोर्ट ने इन नियमों के अमल पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब मांगा है। यह नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में कथित जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए थे।
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विपक्ष का समर्थन- सही समय पर सही फैसला
बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि इन नियमों से देश में सामाजिक तनाव का माहौल बन गया था, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप जरूरी था। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए जाति और वर्ग के नाम पर टकराव पैदा करती है। तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी ने भी नियमों को असंवैधानिक बताते हुए अदालत के फैसले को सही ठहराया।
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सीपीआई (एमएल) ने जताई नाराजगी
सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को संकीर्ण सोच वाला बताया। पार्टी का कहना है कि जातिगत भेदभाव कोई पुरानी बात नहीं, बल्कि आज भी शिक्षण संस्थानों में यह एक कड़वी सच्चाई है।

 
जानें क्या दिया तर्क

  • कैंपस में भेदभाव के मामले लगातार बढ़े हैं।
  • समानता के कानूनों का विरोध हमेशा प्रभुत्वशाली वर्ग करता है।
  • जातिविहीन समाज की बात पीड़ितों को न्याय नहीं दिला सकती।


डाटा क्या कहता है?
यूजीसी के आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2024 के बीच विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वामपंथी दलों का कहना है कि ऐसे में नियमों पर रोक लगाने से पीड़ित वर्गों की आवाज कमजोर होगी। वहीं सरकार का तर्क है कि नियमों को और स्पष्ट करने की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी से मार्च तक जवाब मांगा है। तब तक इन नियमों पर रोक जारी रहेगी। यह मामला न केवल शिक्षा नीति, बल्कि सामाजिक न्याय और राजनीति के बड़े सवालों से जुड़ गया है। अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि सरकार और यूजीसी अदालत में क्या सफाई देते हैं और आगे किस तरह का संतुलित समाधान निकलता है।

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