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SC Updates: मतदाता सिर्फ तकनीकी कारणों से मताधिकार से न हों वंचित, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Wed, 04 Feb 2026 11:25 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु चंदेल Updated Wed, 04 Feb 2026 11:25 PM IST
सार

जमानत याचिकाओं में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। अदालत ने सभी हाईकोर्ट से लंबित जमानत मामलों की पूरी रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। जनवरी से अब तक दाखिल सभी जमानत अर्जियों का ब्योरा मांगा गया है। सुप्रीम कोर्ट में और भी मामलों की सुनवाई हुई। आइए अहम मामलों की सुनवाई पर एक नजर डालते हैं। 

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SC Updates Supreme Court questions delays in bail seeks report from High Courts on pending cases
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

विस्तार

जमानत याचिकाओं की सुनवाई में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा है कि व्यक्तिगत आजादी से जुड़े मामलों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, लेकिन कई हाईकोर्ट में जमानत याचिकाएं समय पर सूचीबद्ध नहीं हो रहीं। इसी चिंता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट से लंबित जमानत मामलों का पूरा ब्योरा मांगा है। अदालत ने साफ कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से बढ़कर कुछ भी नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे इस साल 1 जनवरी के बाद दायर सभी जमानत याचिकाओं की जानकारी दें। इसमें नियमित और अग्रिम जमानत, दोनों तरह की अर्जी शामिल होंगी। कोर्ट ने कहा कि हर केस की फाइलिंग तारीख, अगली सुनवाई की तारीख और फैसला हुआ या नहीं, इसकी जानकारी दी जाए।

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साथ ही जनवरी 2025 से पहले दाखिल होकर अभी तक लंबित जमानत याचिकाओं का भी पूरा डेटा देने को कहा गया है। अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि भारी पेंडेंसी अपनी जगह है, लेकिन जमानत जैसे मामलों को टाला नहीं जा सकता। बेंच ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि कुछ हाईकोर्ट में जमानत मामलों की अर्जेंट लिस्टिंग नहीं हो रही, जिससे लोग जेल में पड़े रहते हैं और उन्हें यह भी नहीं पता होता कि उनकी अर्जी कब सुनी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि रोस्टर तय करना मुख्य न्यायाधीश का अधिकार है, लेकिन जरूरत हो तो जमानत मामलों के लिए बेंच बढ़ाई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह जरूरी दिशानिर्देश जारी करने के लिए बाध्य है। यह मामला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित एक जमानत केस में बार-बार स्थगन को लेकर दाखिल याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। अदालत ने राज्य एजेंसियों को भी निर्देश दिया कि वे जमानत मामलों के त्वरित निपटारे में सहयोग करें।
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हयात रीजेंसी ओटीएस डील पर उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट जांच याचिका सुनने को तैयार

दिल्ली के फाइव स्टार हयात रीजेंसी होटल से जुड़े वन-टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) सौदों में कथित कम मूल्यांकन के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। अदालत ने केंद्र सरकार, एशियन होटल्स (नॉर्थ) प्राइवेट लिमिटेड, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और पंजाब नेशनल बैंक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामला एक एनजीओ की याचिका पर उठा है, जिसमें ओटीएस समझौते की जांच की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि बैंक और वित्तीय संस्थानों के व्यावसायिक फैसलों में आम तौर पर दखल नहीं दिया जाता, लेकिन जब मामला सार्वजनिक धन से जुड़ा हो तो पारदर्शिता और निष्पक्षता देखना जरूरी है। अदालत ने बैंकों से लोन, वसूली और ओटीएस से जुड़े पूरे रिकॉर्ड पेश करने को कहा है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि होटल की नीलामी पहले कब कराई गई थी।

एनजीओ की ओर से पेश वकील ने इसे संभावित बैंक धोखाधड़ी जैसा मामला बताया। वहीं बैंक की तरफ से पेश विधि अधिकारी ने कहा कि यह पूरी तरह वैध व्यावसायिक सौदा है और बैंक ने 116 प्रतिशत तक वसूली कर ली है। उनके अनुसार 2023 में नीलामी की कोशिश हुई थी, लेकिन कोई बोली नहीं मिली। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले इस मामले में सीबीआई और सीवीसी जांच की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि ठोस सबूत के बिना बैंकों के आर्थिक फैसलों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले की आगे सुनवाई करेगा।

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वांगचुक का स्वास्थ्य अच्छा नहीं, हिरासत पर पुनर्विचार करे केंद्र: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। ऐसे में सरकार उन्हें हिरासत में रखने पर पुनर्विचार करे। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज से कहा, दलीलों, प्रति-दलीलों और कानूनी पहलुओं के अलावा, अदालत के एक अधिकारी के तौर पर इस पर जरा गौर कीजिए। हिरासत का आदेश 26 सितंबर, 2025 को पारित किया गया था, यानी लगभग पांच महीने पुराना। हिरासत में लिए गए व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए... जो रिपोर्ट हमने पहले देखी, उससे पता चलता है कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उम्र से संबंधित कुछ लक्षण हो सकते हैं, या शायद कुछ और भी। क्या सरकार के लिए इस पर पुनर्विचार करने या फिर से देखने की कोई संभावना है? पीठ ने नटराज से इस मुद्दे पर सरकार से निर्देश लेने को कहा। इस पर नटराज ने कहा कि वह इस सुझाव को संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखेंगे।

सुनवाई के दौरान, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि पिछले साल लेह में हुई हिंसा के लिए वांगचुक जिम्मेदार थे। उस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई और 161 लोग घायल हुए थे। नटराज ने कहा, अंततः, यह उनके भड़काऊ भाषण, उकसावे और उत्पात का ही नतीजा था। व्यक्ति का सक्रिय रूप से भाग लेना आवश्यक नहीं है, किसी समूह को प्रभावित करने की उसकी प्रवृत्ति ही काफी है। इस मामले में बृहस्पतिवार को भी सुनवाई होेगी।
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तमिलनाडु सरकार के कुलपतियों को नियुक्त करने के प्रावधान पर अंतरिम रोक का आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें तमिलनाडु सरकार को राज्य संचालित विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति करने में सक्षम बनाने वाले संशोधित प्रावधान पर रोक लगा दी गई थी। शीर्ष अदालत राज्य की याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी, जिसमें हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ की ओर से मई 2025 में दिए गए आदेश को चुनौती दी गई थी। राज्य ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग करते हुए भी एक याचिका दायर की थी।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य को सुनवाई का उचित अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। पीठ ने आदेश को रद्द कर दिया और इसे नए सिरे से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के पास भेज दिया। पीठ ने यह भी कहा कि चूंकि हम मुख्य रूप से तकनीकी आधार पर फैसले को रद्द कर रहे हैं, इसलिए हमारे आदेश का मामले के गुण दोषों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अर्जियों पर शीघ्र सुनवाई न होना निराशाजनक, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने लंबित जमानत मामलों के बारे में सभी हाईकोर्ट से रिपोर्ट मांगते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की याचिकाओं पर शीघ्र सुनवाई न होना निराशाजनक है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों को इस वर्ष 1 जनवरी के बाद दायर सभी जमानत याचिकाओं, जिनमें नियमित और अग्रिम याचिकाएं शामिल हैं, का विवरण उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
 
पीठ ने कहा, याचिका दायर करने की तिथि, अगली सुनवाई की तिथि और यदि कोई निर्णय हो, तो उसकी तिथि भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। कोर्ट ने जनवरी, 2025 से पहले दायर लंबित जमानत याचिकाओं का विवरण भी मांगा।
पीठ ने कहा, हमें यह देखकर बेहद निराशा हुई है कि व्यक्तियों की स्वतंत्रता से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई नहीं हो रही है। मुकदमों की संख्या चाहे कितनी भी अधिक हो और विचारणीय मामले भी हों, लेकिन जमानत याचिका से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं हो सकता। विभिन्न हाईकोर्ट में जमानत याचिकाओं के निपटारे में हो रही देरी पर जोर देते हुए, पीठ ने कहा कि पटना हाईकोर्ट में जमानत मामलों को तत्काल सूचीबद्ध नहीं किया जाता और याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट के समक्ष जमानत याचिकाओं को सूचीबद्ध करवाने के लिए भी शीर्ष अदालत का रुख करना पड़ता है।

लोग जेलों में सड़ रहे, सुनवाई नहीं हो रही
कोर्ट ने कहा, हम इस तथ्य से अवगत हैं कि मामलों की सूची बनाना मुख्य न्यायाधीशों का विशेषाधिकार है, क्योंकि वे मास्टर ऑफ रोस्टर हैं। लोग जेलों में सड़ रहे हैं, जमानत याचिकाओं पर सुनवाई नहीं हो रही है, और यह पूरी तरह अनिश्चित है कि उन्हें अपनी याचिका के परिणाम का पता कब चलेगा। पीठ ने कहा, इस न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह कुछ अनिवार्य दिशानिर्देश जारी करे। पीठ ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया कि वे अपने रोस्टरों की समीक्षा करें और यदि कुल लंबित मामलों और पीठ में उपलब्ध मामलों के बीच कोई विसंगति हो तो जमानत याचिकाओं की सूची के लिए उन्हें विस्तारित करें।

नीट-पीजीः कट ऑफ घटाने को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने नीट पीजी 2025-26 के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ प्रतिशत घटाने के राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एनबीई) के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ अब इस मामले पर शुक्रवार को सुनवाई करेगी। याचिका में 13 जनवरी को जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसके तहत नीट पीजी की क्वालिफाइंग कट-ऑफ को अभूतपूर्व रूप से कम कर दिया गया।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कट-ऑफ को शून्य और यहां तक कि नेगेटिव परसेंटाइल तक घटा दिया गया है, जो परीक्षा की प्रतिस्पर्धात्मक और मेरिट आधारित प्रकृति को समाप्त करता है। याचिका के अनुसार, पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा के लिए योग्यता मानकों में इस तरह की ढील मनमानी है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) व अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।

मरीजों की सुरक्षा पर पड़ेगा असर
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि कट-ऑफ घटाने से मरीजों की सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ सकता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि खाली सीटें भरने के उद्देश्य से मेरिट को दरकिनार करना अनुचित है।

मतदाता सिर्फ तकनीकी कारणों से मताधिकार से न हों वंचित : शीर्ष कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि नामों में असंगतियों के आधार पर मतदाताओं को नोटिस भेजते समय अत्यधिक सावधानी बरती जाए। अदालत ने दोनों याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को तय की।

पीठ ने कहा, भारत जैसे भाषाई और सांस्कृतिक रूप से विविध देश में नामों की वर्तनी, उच्चारण और स्थानीय बोलियों के कारण अंतर होना स्वाभाविक है। ऐसे मामलों में वास्तविक और योग्य मतदाताओं को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। नोटिस बहुत सोच-समझकर भेजे जाने चाहिए। ऐसा न हो कि प्रतिष्ठित व्यक्तियों या सामान्य नागरिकों के नाम केवल वर्तनी के अंतर के कारण संदिग्ध सूची में डाल दिए जाएं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि एसआईआर प्रक्रिया अत्यंत जल्दबाजी में की जा रही है और इसके चलते बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम तार्किक विसंगित की श्रेणी में डाल दिए गए हैं। उन्होंने बताया कि केवल चार दिन का समय शेष है, जबकि लगभग 32 लाख मतदाता अब भी अनमैप्ड हैं और 1.36 करोड़ नामों को तार्किक विसंगति सूची में डाला गया है। दीवान ने कहा कि करीब 70 लाख मामलों में समस्या केवल नाम की वर्तनी या मिलान से जुड़ी है। 
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