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SC Updates: I-PAC दफ्तर की तलाशी मामले में कोर्ट ने सुनवाई टाली; आनंद राय पर SC/ST एक्ट के आरोप भी रद्द किए

Tue, 10 Feb 2026 01:41 PM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Tue, 10 Feb 2026 01:41 PM IST
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SC Updates Court defers hearing in I-PAC office search case SC/ST Act charges against Anand Rai also dropped
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

पश्चिम बंगाल के आई-पैक दफ्तर की तलाशी मामला में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट सुनवाई टाल दी है। कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिकाओं पर सुनवाई 18 फरवरी तक टाल दी है। ये याचिकाएं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के अन्य अधिकारियों के खिलाफ हैं। ईडी का आरोप है कि उसने आई-पैक नाम की राजनीतिक कंसल्टेंसी कंपनी के दफ्तरों में तलाशी लेने की कोशिश की थी, लेकिन इसमें रुकावट डाली गई।

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आई-पैक का संबंध तृणमूल कांग्रेस से बताया जाता है। मामले में ईडी का कहना है कि तलाशी के दौरान राज्य सरकार के अधिकारियों ने जांच एजेंसी के काम में बाधा पहुंचाई। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट अब 18 फरवरी को आगे सुनवाई करेगा।
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सुप्रीम कोर्ट : असम में अतिक्रमणकारियों पर फैसले के लिए समिति बनाने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने ने जगंलों को देश के सबसे अहम प्राकृतिक संसाधनों में से एक बताते हुए असम सरकार को गोलाघाट जिले के दोयांग आरक्षित वन क्षेत्र और उसके आसपास के गांवों में अतिक्रमणकारियों के बारे में फैसला लेने के लिए वन और राजस्व अधिकारियों की एक समिति गठित करने की मंगलवार को अनुमति दे दी।
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जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि समिति कथित अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी करेगी और उन्हें यह साबित करने के लिए सबूत पेश करने का मौका देगी कि उन्हें उस भूमि पर रहने का अधिकार है, जिस पर उन्होंने अतिक्रमण कर रखा है। अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई तभी की जाएगी जब यह पाया जाए कि आरक्षित वन क्षेत्र में अतिक्रमण है। कोर्ट ने कहा कि अगर कहीं गैर-कानूनी कब्जा पाया जाता है तो मौखिक आदेश जारी किया जाएगा और संबंधित व्यक्ति को दिया जाएगा, जिसमें उसे अवैध कब्जा खाली करने के लिए 15 दिन का नोटिस दिया जाएगा।

यौन उत्पीड़न मामलों में टिप्पणियां: राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से रिपोर्ट तैयार कराने को तैयार सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामलों में अदालतों की ओर से की जाने वाली टिप्पणियों और भाषा को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि वह इस विषय पर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) से एक व्यापक रिपोर्ट तैयार कराने पर विचार करेगा। अदालत ने कहा कि इस रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के लिए पूरे देश में लागू होने वाले दिशानिर्देश तय किए जाएंगे।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा कि वह यौन उत्पीड़न के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च 2025 के आदेश को रद्द करेगी। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह की टिप्पणियां न केवल असंवेदनशील हैं, बल्कि पीड़ितों, उनके परिवारों और समाज पर नकारात्मक और भय पैदा करने वाला असर डालती हैं। बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने उस आदेश में कहा था कि नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना, उसके पायजामे की डोरी तोड़ना और निचला वस्त्र खींचने की कोशिश करना, दुष्कर्म के प्रयास का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पहले ही कार्यवाही शुरू कर दी थी। इससे पहले मार्च 2025 में ही शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों पर रोक लगाते हुए उन्हें पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय करार दिया था।

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 VYAPAM घोटाला: सुप्रीम कोर्ट ने आनंद राय पर SC/ST एक्ट के आरोप रद्द किए

सुप्रीम कोर्ट ने VYAPAM परीक्षा घोटाले के व्हिसलब्लोअर आनंद राय के खिलाफ जाति आधारित हिंसा के आरोप रद्द कर दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में SC/ST एक्ट का गलत इस्तेमाल किया गया। मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय करोल और एनके सिंह की बेंच ने कहा कि यह मामला कानून के अनुसार नहीं बनता और इसलिए आनंद राय की अपील मंजूर की जाती है।

बता दें कि यह मामला 15 नवंबर 2022 का है, जब मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में एक कार्यक्रम के दौरान हंगामे का आरोप लगा था। FIR में कहा गया था कि कुछ लोगों ने सांसद, विधायक और अधिकारियों का रास्ता रोका और पुलिस से झड़प हुई। आनंद राय को भी आरोपियों में शामिल किया गया था। उन्हें पहले जमानत मिल चुकी थी और अब सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ लगे आरोप पूरी तरह खत्म कर दिए हैं।

यौन उत्पीड़न मामलों की टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामलों में अदालतों की ओर से की जाने वाली टिप्पणियों और भाषा को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि वह इस विषय पर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) से एक व्यापक रिपोर्ट तैयार कराने पर विचार करेगा। अदालत ने कहा कि इस रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के लिए पूरे देश में लागू होने वाले दिशानिर्देश तय किए जाएंगे। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा कि वह यौन उत्पीड़न के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च 2025 के आदेश को रद्द करेगी। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह की टिप्पणियां न केवल असंवेदनशील हैं, बल्कि पीड़ितों, उनके परिवारों और समाज पर नकारात्मक और भय पैदा करने वाला असर डालती हैं। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने उस आदेश में कहा था कि नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना, उसके पायजामे की डोरी तोड़ना और निचला वस्त्र खींचने की कोशिश करना, दुष्कर्म के प्रयास का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पहले ही कार्यवाही शुरू कर दी थी। इससे पहले मार्च 2025 में ही शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों पर रोक लगाते हुए उन्हें पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय करार दिया था।

सुनवाई के दौरान एक अधिवक्ता ने यह मुद्दा भी उठाया कि यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में अदालतों को उम्र के अनुरूप और संवेदनशील भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता एच एस फुलका ने कहा कि कई मामलों में पीड़ितों की जिरह तक नहीं हुई है और केस आठ-नौ साल से लंबित पड़े हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें इस व्यापक समस्या को लेकर जनहित याचिका दाखिल करने की सलाह दी और कहा कि यह व्यवस्था और समाज दोनों के लिए जरूरी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस पूरे मामले में जल्द ही विस्तृत आदेश पारित करेगी।

एनआईए के लंबित मामलों पर  17 राज्यों और यूटी से मांगा जवाब
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 17 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों से ट्रायल के बढ़ते लंबित मामलों को देखते हुए विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) कोर्ट बनाने की स्थिति पर जवाब मांगा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ एनआईए मामलों के त्वरित निपटारे के लिए समर्पित विशेष अदालतों की आवश्यकता पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा कि जिला अदालतों में लंबित एनआईए मामलों के कारण गंभीर अपराधों की सुनवाई में अनावश्यक देरी हो रही है। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि एनआईए मामलों के लिए विशेष अदालतें नामित करने की प्रक्रिया में हाल ही में प्रगति हुई है। उन्होंने बताया कि 7 जनवरी तक केंद्र ने विशेष एनआईए अदालतों की स्थापना के लिए एक-एक करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने के मानक तय किए हैं।

सुप्रीम कोर्ट पति की सहमति के बिना खुला के अधिकार पर करेगा विचार, जानें क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर विचार करने की बात कही है जिसमें पति की सहमति के बिना भी किसी मुस्लिम महिला के पास खुला के जरिये विवाह समाप्त करने के अधिकार को मान्यता दी गई है। शीर्ष कोर्ट ने इस मामले में न्यायालय की मदद के लिए वरिष्ठ वकील शोएब आलम को न्याय मित्र नियुक्त किया।

खुला मुस्लिम महिलाओं को शादी खत्म करने का एक इस्लामी और कानूनी तरीका प्रदान करता है, जिसमें महिलाएं कुछ शर्तों के साथ अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करती है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले को 22 अप्रैल को नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। पीठ ने कहा, यह मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न से संबंधित है। इसलिए हम वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम से इस मामले में न्यायालय की सहायता करने का अनुरोध करते हैं। केरल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि इस्लामी कानून मुस्लिम महिला को ‘खुला’ के माध्यम से एकतरफा रूप से विवाह समाप्त करने का अधिकार देता है और यह अधिकार पति की सहमति या इच्छा पर निर्भर नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने इस बारे में दायर पुनरीक्षण याचिका को भी खारिज कर दिया था। पुनरीक्षण याचिका पर दिए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि पति सहमति देने से इन्कार करता है तो भी मुस्लिम महिला का खुला का अधिकार समाप्त नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि खुला इस्लामी कानून द्वारा प्रदत्त एक स्वतंत्र अधिकार है, जिसकी तुलना पति को प्राप्त तलाक के अधिकार से की जा सकती है।

एससी-एसटी के क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने की मांग पर केंद्र को सुप्रीम नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से उन याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने को कहा, जिनमें शैक्षिक संस्थाओं में दाखिले और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लाभ से अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के क्रीमी लेयर को बाहर रखने की मांग की गई है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ओपी शुक्ला और समता आंदोलन समिति की ओर से दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें आरक्षण पर 1 अगस्त, 2024 के ऐतिहासिक फैसले को लागू करने की मांग की गई है। पीठ ने केंद्र से याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा और बताया कि इन पर कुछ समय बाद विचार किया जाएगा। क्रीमी लेयर सिद्धांत मंडल आयोग के फैसले में प्रतिपादित किया गया था और इस सिद्धांत के तहत, ओबीसी के धनी लोगों को दाखिले और नौकरियों में आरक्षण का लाभ लेने से वंचित रखा गया था। एक अगस्त, 2024 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6-1 के बहुमत से सुनाए एक ऐतिहासिक फैसले में यह माना कि राज्यों को एससी के भीतर उप-वर्गीकरण करने का सांविधानिक अधिकार है।


 
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