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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   SC sets aside MP HC verdict on discharge of rape accused, says it's 'utterly incomprehensible'

MP HC: दुष्कर्म आरोपी को FIR में देरी के आधार पर छोड़ा, SC ने कहा- फैसला समझ से परे, तथ्य दिल तोड़ने वाले

Fri, 19 Aug 2022 04:30 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Fri, 19 Aug 2022 04:30 PM IST
सार

न्यायमूर्ति परदीवाला ने पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए कहा, हाई कोर्ट का आदेश पूरी तरह से समझ से बाहर है। एमपी हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी को एफआईआर में देरी के आधार पर छोड़ दिया था। 

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SC sets aside MP HC verdict on discharge of rape accused, says it's 'utterly incomprehensible'
Supreme Court - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकी दर्ज करने में देरी के आधार पर दुष्कर्म के एक आरोपी को बरी करने के मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को पूरी तरह से समझ से बाहर करार दिया है। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा कि इस मुकदमे के तथ्य काफी दिल तोड़ने वाले हैं और हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि आदेश विकृत है और कानून में टिकाऊ नहीं है। 

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फैसला 12 अगस्त को सुनाया गया था, लेकिन इसे शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किया जाना बाकी था। न्यायमूर्ति परदीवाला ने पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए कहा, हाई कोर्ट का आदेश पूरी तरह से समझ से बाहर है। हमारे सामने अभी तक एक ऐसा मामला नहीं आया है, जहां हाई कोर्ट ने बलात्कार के अपराध के आरोप में आरोपी को आरोप मुक्त करने के लिए प्राथमिकी दर्ज करने में देरी के आधार पर ऐसा फैसला दिया हो।  
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शीर्ष अदालत ने हालांकि आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत दंडनीय अपराध से आरोपी अमित कुमार तिवारी को आरोपमुक्त करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया। हाई कोर्ट के 2 दिसंबर, 2021 के आदेश का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि ध्यान देने योग्य बात ये है कि हालांकि हाई कोर्ट ने मृतक (बलात्कार पीड़िता) की उम्र के संबंध में तथ्य दर्ज करने के उद्देश्य से दो पैराग्राफ लिखे हैं, फिर भी अदालत द्वारा उस संबंध में कोई विशिष्ट निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया है।
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पीठ ने कहा, हाई कोर्ट पूरी तरह से एक अलग स्तर पर आगे बढ़ा। अदालत ने सभी आरोपों के आरोपियों को इस आधार पर आरोपमुक्त करना उचित समझा कि प्राथमिकी दर्ज करने में देरी हुई और मृतक के माता-पिता द्वारा रखा गया पूरा मामला संदिग्ध था।

सुनवाई लंबी न चले यह सुनिश्चित करना निचली अदालतों की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा, सुनवाई लंबी न चले यह सुनिश्चित करना निचली अदालतों की जिम्मेदारी है। क्योंकि अधिक समय तक सुनवाई लंबित रहने से गवाहों की गवाही में समस्या पैदा होती है। जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने कहा, निचली अदालतों को वादियों की मामले को लंबा खींचने की रणनीति को नियंत्रित करना होगा। 

पीठ ने आंध्र प्रदेश के चित्तौड़ जिले के महापौर की हत्यारों को भगाने में मदद करने वाले एक व्यक्ति को जमानत देते हुए यह टिप्पणियां की। पीठ ने पाया कि यह व्यक्ति बीते सात साल से जेल में है और अभी तक अभियोजन पक्ष के गवाहों की जांच होना बाकी है। हमारे लिए यह संकट की स्थिति है कि अभी इस मामले में सुनवाई शुरू होना भी बाकी है। पीठ ने कहा, यह बिलकुल स्वीकार्य नहीं है।

सहमति से बने थे संबंध, दुष्कर्म का आरोप कोर्ट ने किया खाारिज
सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ महिला द्वारा लगाए गए दुष्कर्म के आरोप को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने। यह संबंध महिला की शादी से पहले बने, शादी के दौरान जारी रहे और उसके तलाक के बाद भी बने रहे। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए यह फैसला दिया। 


हाईकोर्ट ने संबंधित व्यक्ति की आरोप खारिज करने और आरोपपत्र रद्द करने की याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों से संबंधित कोई ठोस तथ्य प्राथमिकी या आरोप पत्र में तलाश पाना असंभव है जो कि धारा 376 (दुष्कर्म) में अपराध स्थापित करने के लिए जरूरी है। इसे देखते हुए कोर्ट ने व्यक्ति की अपील मंजूर कर ली और हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए उसके खिलाफ दर्ज मामले को रद्द कर दिया। 

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