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सुप्रीम कोर्ट: 'समय पूर्व रिहाई देना सरकार का काम', शीर्ष अदालत ने गुजरात सरकार को दिया यह निर्देश

Tue, 24 Jan 2023 10:55 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Tue, 24 Jan 2023 10:55 PM IST
सार

बिलकिस बानो मामले के 11 गुनाहगारों को समय से पहले रिहा करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लंबित है। उन दोषियों को पिछले साल गुजरात सरकार ने 1992 की नीति पर ही रिहा कर दिया था। गुजरात सरकार के इस निर्णय को बिलकिस बानो और अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

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SC says granting premature release is the job of the government not the courts
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हत्या के एक दोषी की समय से पहले रिहाई की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि किसी दोषी को छूट देना या समय से पहले रिहाई देना सरकार का काम है न कि अदालतों का। यह कहते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने गुजरात राज्य की सक्षम अथॉरिटी को अपनी 1992 की नीति के अनुसार याचिकाकर्ता की समय से पहले रिहाई के अनुरोध पर विचार करने का निर्देश दिया।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'हमारा सुविचारित मत है कि इस पर राज्य द्वारा पुनर्विचार किया जाना चाहिए। चूंकि समय से पहले रिहाई देना एक कार्यकारी कार्रवाई है, इसलिए यह मामला राज्य सरकार द्वारा पुनर्विचार के लिए उपयुक्त है। हम सक्षम अथॉरिटी को निर्देश देते हैं कि राज्य सरकार समय से पहले रिहाई के अनुरोध पर नीति के तहत विचार करे।
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याचिकाकर्ता हितेश को हत्या का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। सजा के खिलाफ उनकी अपील अक्टूबर, 2009 में खारिज कर दी गई थी। इसके बाद एक सह-आरोपी को 2017 में समय से पहले रिहा कर दिया गया था, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने इसकी मांग की। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने साढ़े 15 साल की वास्तविक सजा काट ली है, जो छूट के साथ 19 साल तक की होती है।
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राज्य द्वारा दायर हलफनामे में, समय से पहले रिहाई पर मुख्य आपत्ति यह थी कि जब याचिकाकर्ता को 2005 में तीन सप्ताह के लिए अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया था, तब तक वह 5 साल तक फरार रहा था। 2010 में उसे फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। न्यायालय ने आगे कहा कि 1992 की राज्य की नीति 14 साल की सजा काटने के बाद समय पूर्व रिहाई की सुविधा देती है। इन बातों पर गौर करने के बाद शीर्ष अदालत ने यह माना कि याचिकाकर्ता द्वारा समय से पहले रिहाई की याचिका पर राज्य द्वारा पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

सीजेआई ने कहा, 'इस अदालत द्वारा निर्धारित कानून के मद्देनजर समय से पहले रिहाई राज्य की नीति पर है। यदि बाद में नीति को उदार बनाया जाता है तो उसे भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।


गौरतलब है कि बिलकिस बानो मामले के 11 गुनाहगारों को समय से पहले रिहा करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लंबित है। उन दोषियों को पिछले साल गुजरात सरकार ने 1992 की नीति पर ही रिहा कर दिया था। गुजरात सरकार के इस निर्णय को बिलकिस बानो और अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

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