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सुवेंदु को राहत: अंगरक्षक की मौत के मामले में पुलिस कार्रवाई पर रोक में दखल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
Mon, 13 Dec 2021 05:42 PM IST
सुरेंद्र जोशी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Mon, 13 Dec 2021 05:42 PM IST
सार
जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एस बोपन्ना की पीठ ने कोई दखल से इनकार किया, लेकिन हाईकोर्ट को मामले का शीघ्र अंतिम निपटारा करने को कहा है।
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सुवेंदु अधिकारी
- फोटो : twitter.com/SuvenduWB
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ एक आपराधिक मामले में पुलिस कार्रवाई पर कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को लेकर दखल देने से इनकार कर दिया। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु के अंगरक्षक की अस्वाभाविक मौत के मामले की सीआईडी जांच चल रही है। सीआईडी को भी सुवेंदु के खिलाफ किसी दंडात्मक कार्रवाई से रोका गया है।
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जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एस बोपन्ना की पीठ ने कोई दखल से इनकार किया, लेकिन हाईकोर्ट को मामले का शीघ्र अंतिम निपटारा करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत एक विशेष अनुमति याचिका दायर की गई है। इसमें 6 सितंबर, 2021 के कलकत्ता हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने प्रतिवादी पक्ष यानी बंगाल पुलिस को चार सप्ताह में जवाबी हलफनामा दायर करने को कहा था, लेकिन जांच अधिकारियों ने अब तक जवाब दाखिल नहीं किया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की टिप्पणियां प्रथम दृष्ट्या मौजूदा स्तर पर अंतरिम रोक के पक्ष में हैं। चूंकि यह मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है और यह एसएलपी अंतरिम आदेश के खिलाफ दायर की गई, इसलिए हम संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत दखल देने के इच्छुक नहीं हैं। हालांकि पीठ केस के मेरिट को लेकर अपनी कोई राय प्रकट नहीं कर रही है।
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अनुच्छेद 136 सुप्रीम कोर्ट की असाधारण शक्तियों से संबंधित है। इसके तहत शीर्ष कोर्ट मामलों में विशेष अनुमति याचिकाओं की सुनवाई कर सकती है।
शीर्ष कोर्ट में सुनवाई के आरंभ में पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने कहा कि राज्य पुलिस को इस अदालत द्वारा लगाई गई किसी भी शर्त के अधीन पूरे मामले की जांच करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकारी के खिलाफ दुर्भावनावश कोई केस दायर नहीं किया गया है।
उन्होंने कहा कि रोक का एक ऐसा आदेश दिया गया है, जिससे भविष्य में भी कुछ नहीं किया जा सकेगा। ऐसे मामलों में याचिकाकर्ता को गिरफ्तार करने से पूर्व सरकार कोर्ट से अनुमति भी ले सकती है। जांच में सचाई पता चलेगी और उपयुक्त फौजदारी अदालत अपना काम करेगी। हमने शिकायत नहीं कराई है, बल्कि कई लोगों की शिकायत मिली थी। ऐसे में पुलिस को केस दर्ज करना चाहिए या नहीं? मैंने अपने 41 साल के आदेश में हाईकोर्ट का ऐसा आदेश कभी नहीं देखा। ललिताकुमारी केस का हवाला देते हुए बंदोपाध्याय ने कहा कि यदि पुलिस इस केस के फैसले के अनुसार केस दायर करती है तो इसमें वह कानून का उल्लंघन कहां कर रही है?