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SC: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक और फैसले पर जताई नाराजगी, कहा- कानूनी सिद्धांतों को नजरअंदाज किया

Thu, 07 Aug 2025 11:10 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Thu, 07 Aug 2025 11:10 PM IST
सार

SC: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट को फटकार लगाते हुए कहा कि उसने सजा निलंबन की याचिका पर फैसला देते समय तयशुदा कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी की। शीर्ष कोर्ट ने फैसले को 'कानूनी रूप से दोषपूर्ण' बताया और मामले को 15 दिनों में नए सिरे से विचार के लिए हाईकोर्ट को लौटा दिया।

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SC criticises Allahabad HC for ignoring settled law on sentence suspension
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले पर नाराजगी जताई है। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने एक तय-अवधि की सजा के निलंबन की याचिका खारिज करते समय स्थापित कानूनी सिद्धांतों को नजरअंदाज किया। हाल ही में एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज को फटकार लगाई थी, जिन्होंने दीवानी विवाद में आपराधिक कार्रवाई की अनुमति दे दी थी।
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चार अगस्त को दिए गए एक अभूतपूर्व आदेश में जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने हाईकोर्ट जज से आपराधिक मामलों की सुनवाई का अधिकार तब तक छीन लिया, जब तक वह पद पर बने रहते हैं। कारण यह था कि उन्होंने गलती से एक दीवानी विवाद में आपराधिक समन को सही ठहराया था। इसी बेंच ने एक अन्य मामले में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को गलत करार दिया।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक और ऐसा मामला है, जिससे हम निराश हैं। यह याचिका हाईकोर्ट के 29 मई के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट द्वारा दी गई सजा को निलंबित करने से इनकार कर दिया था।
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जस्टिस पारदीवाला ने छह अगस्त के आदेश में कहा, हमें एक बार फिर यह कहने को मजबूर होना पड़ रहा है कि ऐसी गलतियां हाईकोर्ट स्तर पर इसलिए होती हैं, क्योंकि तय कानूनी सिद्धांतों को सही तरीके से लागू नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि न्यायालय को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि मामला किस विषय से जुड़ा है, फिर उसमें उठाए गए मुद्दों को समझना चाहिए और अंत में याचिकाकर्ता की दलीलों को ध्यान में रखते हुए सही कानूनी सिद्धांतों को लागू करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को 'कानूनी रूप से दोषपूर्ण' बताया और कहा कि इसमें स्थापित न्यायिक परंपराओं का उल्लंघन हुआ है। यह मामला उस दोषी की अपील से जुड़ा था, जिसे पॉक्सो अधिनियम, भारतीय दंड संहिता और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत चार साल की कठोर सजा दी गई थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि सज़ाएं एक साथ चलेंगी।

दोषी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 389 के तहत सजा निलंबन की याचिका दाखिल की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि अपराध 'घृणित' था, और इस निर्णय में स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर विचार नहीं किया गया।


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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को रद्द कर दिया और कहा कि तय-अवधि की सजा को निलंबित करने के मामलों में अपीलीय अदालतों को उदार रवैया अपनाना चाहिए, जब तक कि कोई विशेष परिस्थिति न हो। बेंच ने कहा, यह जरूरी है कि पहले विषय-वस्तु को देखा जाए, फिर मुद्दों की जांच की जाए और अंत में याचिकाकर्ता की बात को समझकर सही कानूनी सिद्धांतों को लागू किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने याचिका की कानूनी दृष्टि से सही तरीके से जांच नहीं की।

बेंच ने कहा, हाईकोर्ट ने बस अभियोजन पक्ष की दलीलें और मौखिक गवाहियां दोहराईं, लेकिन यह नहीं देखा कि तय-अवधि की सजा के निलंबन के लिए कानून क्या कहता है। सुप्रीम कोर्ट ने अब यह मामला पुनर्विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया है और निर्देश दिया है कि हाईकोर्ट 15 दिनों के भीतर उचित आदेश पारित करे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा, हाईकोर्ट को ध्यान रखना चाहिए कि यह सजा सिर्फ चार साल के लिए है। और केवल तभी निलंबन से इनकार किया जा सकता है जब यह लगे कि दोषी की रिहाई जनहित में नहीं होगी।


 
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