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Supreme Court: क्या बार कोटे से जिला जज बन सकते हैं न्यायिक अधिकारी? सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू

Tue, 23 Sep 2025 01:55 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Tue, 23 Sep 2025 01:55 PM IST
सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी सवाल पर सुनवाई शुरू की है कि जो न्यायिक अधिकारी भर्ती होने से पहले सात साल तक वकील रहे हैं, क्या वे बार कोटा के तहत जिला जज पद के लिए पात्र हैं। पांच जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जो देशभर की न्यायिक भर्तियों को प्रभावित कर सकता है।  

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SC commences hearing on eligibility of judicial officers for District Judge posts under Bar quota
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम कानूनी सवाल पर सुनवाई शुरू की है। सवाल यह है कि जो न्यायिक अधिकारी न्यापालिका में शामिल होने से पहले सात साल तक वकील के रूप में काम कर चुके हैं, क्या वे बार कोटा के तहत जिला जज के पदों के लिए पात्र माने जा सकते हैं या नहीं। 
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चीफ जस्टिस (सीजेआई) बीआर गवई की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मुद्दे पर सुनवाई की। संविधान पीठ में जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एससी शर्मा और जस्टिस के विनोद चंद्रन शामिल हैं। यह मामला देशभर में न्यायिक भर्तियों को प्रभावित कर सकता है। 
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यह पीठ संविधान के अनुच्छेद 233 की व्याख्या से जुड़े सवालों पर विचार कर रही है। अनुच्छेद 233 में राज्य में जिला जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। अनुच्छेद 233 के अनुसार, किसी राज्य में जिला जज की नियुक्ति, पदस्थापन और पदोन्नति राज्यपाल द्वारा उस हाईकोर्ट से परामर्श करके की जाएगी जो उस राज्य के संबंध में क्षेत्राधिकार रखता है। 
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इसके  साथ ही इसमें यह भी कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति जो केंद्र या राज्य सरकार में सेवा में नहीं है, केवल तब ही जिला जज के पद के लिए पात्र होगा, जब वह कम से कम सात वर्षों तक वकील रहा हो और हाईकोर्ट द्वारा उसकी नियुक्ति की सिफारिश की गई हो। 

वरिष्ठ वकील जयंत भूषण उन न्यायिक अधिकारियों की ओर पेश हुए, जिन्हें बार कोटा के तहत जिला जज की सीधी भर्ती परीक्षा में भाग लेने से वंचित कर दिया गया था। उन्होंने बहस की शुरुआत की। भूषण ने कहा कि कई न्यायिक अधिकारियों ने न्यायिक सेवा में आने से पहले वकील के रूप में सात साल तक काम किया था। इसके बावजूद उन्हें बार कोटा के तहत आवेदन करने से रोक दिया गया। 

इन न्यायिक अधिकारियों की याचिकाएं विभिन्न हाईकोर्ट के पहले के दिए गए फैसलों के आधार पर खारिज कर दी गई थीं। भूषण ने दलील दी, अब यह मामला एक महत्वपूर्ण सांविधानिक व्याख्या के सवाल में बदल गया है। 


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चार प्रमुख सवालों को उठाया
उन्होंने चार प्रमुख सवालों का जिक्र किया, जिनमें पहला यह था कि क्या कोई ऐसा न्यायिक अधिकारी, जिसने न्यायिक सेवा में आने से पहले बार में सात साल की सेवा पूरी कर ली हो, उसे बार कोटा के अंतर्गत अतिरिक्त जिला जज के पद के लिए पात्र माना जा सकता है? दूसरा सवाल उन्होंने उठाया कि जिला जज पद के लिए पात्रता का मूल्यांकन आवेदन के समय होना चाहिए या नियुक्ति के समय, या दोनों समय? तीसरा मुद्दा यह था कि क्या अनुच्छेद 233(2) न्यायिक सेवा में पहले से कार्यरत व्यक्तियों के लिए अलग पात्रता की शर्तें निर्धारित करता है? चौथा सवाल उन्होंने यह उठाया कि क्या वकील और न्यायिक अधिकारी के रूप में संयुक्त रूप से सात वर्षों की अवधि को पात्रता के लिए माना जा सकता है?

भूषण ने भारतीय लोकसेवा अधिनियम, 1861 और संविधान सभा की बहसों का हवाला देते हुए जिला जज की नियुक्तियों के ऐतिहासिक संदर्भ को सामने रखा। फिलहाल इस मामले पर सुनवाई चल रही है। इससे पहले 12 सितंबर को सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि यह 23 सितंबर से तीन दिन तक इस मामले में सुनवाई करेगी।


 
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