{"_id":"631c7d3be392ce01991cffb6","slug":"sand-being-removed-from-sanctum-sanctorum-of-konark-sun-temple-after-119-years","type":"story","status":"publish","title_hn":"Konark Sun Temple: 119 साल बाद इस मंदिर के गर्भगृह से निकाली जा रही रेत, जानें कैसे तीन वर्षों में होगा ये काम","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Konark Sun Temple: 119 साल बाद इस मंदिर के गर्भगृह से निकाली जा रही रेत, जानें कैसे तीन वर्षों में होगा ये काम
Sat, 10 Sep 2022 06:00 PM IST
शिव शरण शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भुवनेश्वर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भुवनेश्वर
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Sat, 10 Sep 2022 06:00 PM IST
सार
कोणार्क का मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मंडप ढह चुके हैं। वहीं, तीसरे मंडप में जहां मूर्ति स्थापित थी, अंग्रेजों ने स्वतंत्रता से पूर्व ही साल 1903 में रेत और पत्थर भरवा कर सभी द्वारों को स्थायी रूप से बंद करवा दिया था। ताकि मंदिर और क्षतिग्रस्त न हो पाए, लेकिन उसके बाद भी मंदिर की संरचना में क्षरण हो रहा है और पत्थरों में दरारें आ रहीं हैं।
विज्ञापन
कोणार्क सूर्य मंदिर
- फोटो : Facebook/India in Ireland (Embassy of India, Dublin)
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भारत में ऐसे कई एतिहासिक मंदिर हैं, जो सदियों से लोगों के आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं। इन्हीं में से एक कोणार्क का सूर्य मंदिर। इस समय ये मंदिर फिर चर्चा में है। इसकी वजह यह है कि इस मंदिर के गर्भगृह से 119 साल बाद रेत निकाली जा रही है। कहा जा रहा है कि मंदिर के गर्भगृह से रेत निकाले जाने के बाद इसका आकार भी परिवर्तित हो जाएगा। मंदिर के गर्भगृह में जमा रेत को निकालने के लिए तीन साल का लक्ष्य तय किया गया है।
विज्ञापन
निकाली जाएगी गर्भगृह से रेत
मंदिर के गर्भगृह से रेत निकालने की पूरी कार्यप्रणाली के बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीक्षक अरुण मलिक ने जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इसके लिए पिछले दो साल से विचार-विमर्श किया जा रहा था। जिसके बाद इस पूरे काम के लिए विशेषज्ञों और इंजीनियरों के साथ राय-मशविरा करके एक सुरक्षित प्रणाली अपनाई जा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि गर्भगृह से रेत निकालने के काम में कोई बाधा ना पैदा हो, इसके लिए बीते दिन सूर्य भगवान की पूजा-अर्चना भी की गई थी। मंदिर के गर्भगृह से रेत निकालने के बाद लोग 13 वीं शताब्दी के मंदिर में प्रवेश कर सकेंगे।
विज्ञापन
उड़ीसा उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद शुरू की गई प्रक्रिया
गौरतलब है कि सूर्य मंदिर से रेत निकालने के लिए प्रकिया उड़ीसा उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद शुरू की गई। ये काम निजी कंपनी बीडीआर कंस्ट्रक्शन करेगी। इस दौरान एएसआई अधिकारी भी तैनात रहेंगे। 2020 में कोणार्क में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में एएसआई ने यह निर्णय लिया था। एएसआई अधिकारियों के मुताबिक, गर्भगृह से रेत निकालने के लिए निजी कंपनी चार फीट चौड़ी और पांच फीट ऊंची सुरंग बनाकर मेकेनिकल वर्किंग प्लेटफार्म तैयार करेगी। इसके जरिए ही मंदिर से ट्रॉली और लिफ्ट के जरिए मंदिर से रेत निकाली जाएगी। इस पूरे काम में मंदिर की संरचना को अस्थाई सपोर्ट देने के लिए स्टील के बीम बनाए जाएंगे।
विज्ञापन
अंग्रेजों ने भरवा दी थी रेत
कोणार्क का मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मंडप ढह चुके हैं। वहीं, तीसरे मंडप में जहां मूर्ति स्थापित थी, अंग्रेजों ने स्वतंत्रता से पूर्व ही साल 1903 में रेत और पत्थर भरवा कर सभी द्वारों को स्थायी रूप से बंद करवा दिया था, ताकि मंदिर और क्षतिग्रस्त न हो पाए, लेकिन उसके बाद भी मंदिर की संरचना में क्षरण हो रहा है और पत्थरों में दरारें आ रहीं हैं। इसके बाद दुनिया भर के विशेषज्ञों ने संरचना को बनाए रखने और उसे मजबूती प्रदान करने के लिए गर्भगृह से रेत निकालने का सुझाव दिया गया था।
सामंत राजा नरसिंह देव प्रथम ने कराया था निर्माण
यह मंदिर भारत के चुनिंदा सूर्य मंदिरों में से एक है, जो उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी से 35 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में कोणार्क शहर में स्थित है। यह मंदिर ओडिशा की मध्यकालीन वास्तुकला का अनोखा नमूना है और इसी वजह से साल 1984 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। यह मंदिर अपनी पौराणिकता और आस्था के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। लाल रंग के बलुआ पत्थरों और काले ग्रेनाइट के पत्थरों से बने इस मंदिर का निर्माण अब तक एक रहस्य ही बना हुआ है। हालांकि ऐसा माना जाता है कि इसे 1238-64 ईसा पूर्व गंग वंश के तत्कालीन सामंत राजा नरसिंह देव प्रथम द्वारा बनवाया गया था। वहीं, कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर को भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने बनवाया था।