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RSS: 'आपातकाल में गिरफ्तार हुए लोगों में 80 फीसदी थे संघ के कार्यकर्ता', आरएसएस नेता रामलाल का बड़ा दावा
Sun, 24 May 2026 09:21 AM IST
Devesh Tripathi
पीटीआई, मुंबई
पीटीआई, मुंबई
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sun, 24 May 2026 09:21 AM IST
सार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने देश के बंटवारे से लेकर आपातकाल को लेकर कई चौंकाने वाले दावे किए। उन्होंने कहा कि देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान-बांग्लादेश से आए कई लोगों ने आरएसएस स्वयंसेवकों की मदद से जिंदा रहने की बात मानी है।
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आरएसएस नेता रामलाल
- फोटो : ANI
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विस्तार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ नेता रामलाल ने दावा किया कि अगर आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह में संघ के कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा नहीं लिया होता, तो तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार 1977 में आम चुनाव की घोषणा नहीं करती।
संघ के कोंकण प्रभाग की एक बैठक के समापन समारोह में बोलते हुए संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने कहा, "अगर आपातकाल के दौरान आरएसएस स्वयंसेवकों ने इतने बड़े पैमाने पर सत्याग्रह में भाग नहीं लिया होता और जेलें नहीं भरी होतीं, तो सरकार ने आम चुनाव की घोषणा नहीं की होती, और जनता पार्टी सत्ता में नहीं आई होती। आपातकाल जारी रहता और भारत लंबे समय तक एक सत्तावादी शासन का गवाह बनता।"
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आपातकाल में गिरफ्तार किए गए 80 फीसदी लोग थे संघ के कार्यकर्ता
संघ के नेता ने यह भी दावा किया कि आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किए गए लगभग 80 प्रतिशत लोग आरएसएस कार्यकर्ता थे। रामलाल ने बताया कि उन्होंने खुद उस दौरान आठ महीने जेल में बिताए थे। गौरतलब है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा घोषित आपातकाल 1975 से 1977 तक 21 महीने तक चला था। इसके बाद हुए चुनावों में विपक्ष की जनता पार्टी सत्ता में आई थी।
रामलाल का दावा- आपदाओं में संघ ने की बढ़-चढ़ कर सहायता
अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने दावा किया कि आरएसएस कार्यकर्ताओं ने संकट के समय में नागरिक प्रशासन की सहायता भी की है। इसमें 1965 के युद्ध के दौरान दिल्ली में यातायात प्रबंधन भी शामिल था। रामलाल ने कहा, "24 घंटे के प्रशिक्षण के साथ, आरएसएस स्वयंसेवकों ने दिल्ली के यातायात को इस तरह से प्रबंधित किया कि उनके कार्यकाल के दौरान दुर्घटनाओं की संख्या सबसे कम दर्ज की गई।" उन्होंने यह भी बताया कि 1962 के युद्ध के बाद, 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में लगभग 3,000 स्वयंसेवकों ने कम समय में तैयारी कर हिस्सा लिया था।
संघ में अनुशासन और समन्वय पर जोर
रामलाल ने बताया कि आरएसएस अपनी दैनिक 'शाखाओं' (स्थानीय सभाओं) के माध्यम से अनुशासन, समन्वय और सामूहिक कार्यप्रणाली पर जोर देता है। उन्होंने कहा, "एक साथ काम करना और सभी के साथ घुलना-मिलना आरएसएस में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके लिए शरीर, मन और बुद्धि के समन्वय की आवश्यकता होती है।" उन्होंने यह भी कहा कि छोटी, नियमित गतिविधियों का उद्देश्य भी विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच एकता और देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देना था।
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देश के बंटवारे पर क्या बोले रामलाल?
वहीं, उन्होंने दावा किया कि विभाजन के दौरान भारत आए कई लोगों ने आरएसएस को उनके जीवित रहने के लिए श्रेय दिया। उन्होंने कहा, "आप उस अवधि के दौरान पाकिस्तान या बांग्लादेश से आए किसी भी व्यक्ति से बात करें, वे कहेंगे कि वे केवल इसलिए जीवित हैं क्योंकि आरएसएस स्वयंसेवकों ने उनकी मदद की।" उन्होंने यह भी कहा कि कई स्वयंसेवकों ने अपने जीवन का बलिदान दिया।
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संघ के कोंकण प्रभाग की एक बैठक के समापन समारोह में बोलते हुए संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने कहा, "अगर आपातकाल के दौरान आरएसएस स्वयंसेवकों ने इतने बड़े पैमाने पर सत्याग्रह में भाग नहीं लिया होता और जेलें नहीं भरी होतीं, तो सरकार ने आम चुनाव की घोषणा नहीं की होती, और जनता पार्टी सत्ता में नहीं आई होती। आपातकाल जारी रहता और भारत लंबे समय तक एक सत्तावादी शासन का गवाह बनता।"
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आपातकाल में गिरफ्तार किए गए 80 फीसदी लोग थे संघ के कार्यकर्ता
संघ के नेता ने यह भी दावा किया कि आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किए गए लगभग 80 प्रतिशत लोग आरएसएस कार्यकर्ता थे। रामलाल ने बताया कि उन्होंने खुद उस दौरान आठ महीने जेल में बिताए थे। गौरतलब है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा घोषित आपातकाल 1975 से 1977 तक 21 महीने तक चला था। इसके बाद हुए चुनावों में विपक्ष की जनता पार्टी सत्ता में आई थी।
रामलाल का दावा- आपदाओं में संघ ने की बढ़-चढ़ कर सहायता
अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने दावा किया कि आरएसएस कार्यकर्ताओं ने संकट के समय में नागरिक प्रशासन की सहायता भी की है। इसमें 1965 के युद्ध के दौरान दिल्ली में यातायात प्रबंधन भी शामिल था। रामलाल ने कहा, "24 घंटे के प्रशिक्षण के साथ, आरएसएस स्वयंसेवकों ने दिल्ली के यातायात को इस तरह से प्रबंधित किया कि उनके कार्यकाल के दौरान दुर्घटनाओं की संख्या सबसे कम दर्ज की गई।" उन्होंने यह भी बताया कि 1962 के युद्ध के बाद, 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में लगभग 3,000 स्वयंसेवकों ने कम समय में तैयारी कर हिस्सा लिया था।
संघ में अनुशासन और समन्वय पर जोर
रामलाल ने बताया कि आरएसएस अपनी दैनिक 'शाखाओं' (स्थानीय सभाओं) के माध्यम से अनुशासन, समन्वय और सामूहिक कार्यप्रणाली पर जोर देता है। उन्होंने कहा, "एक साथ काम करना और सभी के साथ घुलना-मिलना आरएसएस में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके लिए शरीर, मन और बुद्धि के समन्वय की आवश्यकता होती है।" उन्होंने यह भी कहा कि छोटी, नियमित गतिविधियों का उद्देश्य भी विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच एकता और देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देना था।
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देश के बंटवारे पर क्या बोले रामलाल?
वहीं, उन्होंने दावा किया कि विभाजन के दौरान भारत आए कई लोगों ने आरएसएस को उनके जीवित रहने के लिए श्रेय दिया। उन्होंने कहा, "आप उस अवधि के दौरान पाकिस्तान या बांग्लादेश से आए किसी भी व्यक्ति से बात करें, वे कहेंगे कि वे केवल इसलिए जीवित हैं क्योंकि आरएसएस स्वयंसेवकों ने उनकी मदद की।" उन्होंने यह भी कहा कि कई स्वयंसेवकों ने अपने जीवन का बलिदान दिया।