ट्रंप की जीत से संघ परिवार में खुशी का माहौल
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अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की जीत से भगवा परिवार में खुशी का माहौल है। ट्रंप की सोच को भगवा परिवार अपने करीब मान रहा है। अपने चुनावी अभियान में जिस तरह से ट्रंप ने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ आक्रामकता दिखाई थी। उसे संघ परिवार के लोगों को ट्रंप में अपना वैचारिक अक्स दिखाई दे रहा है।
संघ ने ट्रंप की जीत पर औपचारिक रूप से अभी कुछ नहीं कहा है। मगर ट्रंप के जीत की खबर से परिवार में खुशी का माहौल है। राष्ट्र सेविका समिति की पत्रकार वार्ता के दौरान जब खबर आई की ट्रंप जीत गए हैं तो समिति की राष्ट्रीय महासचिव सीता ताई ने प्रसन्नता जताते हुए कहा कि इससे भारत के रिश्ते अमेरिका के साथ और मजबूत होंगे।
हालांकि, औपचारिक टिप्पणी से पहले संघ ट्रंप के भावी कदम को परख लेना चाहता है। ट्रंप की जीत से इस बात की आशंका बढ़ रही है कि अमेरिकियों को नौकरी देने के नाम पर वह भारतीयों की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। लेकिन जिस तरह चुनाव के दौरान ट्रंप के पुत्र ने मंदिरों में जाकर भारतीयों खासतौर से हिंदुओं को रिझाने का प्रयास किया। उसे देख संघ परिवार के बीच ट्रंप की जीत से उम्मीद का माहौल है कि वे मुस्लिमों के खिलाफ अभियान में कुछ न कुछ कदम जरूर उठाएंगे।
संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अनौपचारिक चर्चा में कहा कि ट्रंप संघ विचार के व्यक्ति हैं। चुनाव में अमेरिकी हिंदुओं ने उनका जमकर समर्थन किया है। ट्रंप इस बात को भूला नहीं सकते। उनकी जीत से दक्षिण पंथ की राजनीति को विश्व स्तर पर बल मिलेगा।
दक्षिण पंथ की सियासत का बोलबाला बढ़ेगा
विश्व के सबसे मजबूत देश के प्रमुख पद पर दक्षिण पंथ विचार वाले व्यक्ति के आने से विश्व के अन्य देशों में भी दक्षिण पंथ की सियासत का बोलबाला बढ़ेगा। यूरोपीय यूनियन से इंग्लैंड के अलग होने के बाद अमेरिका में ट्रंप की जीत दक्षिण पंथ विचार के दुनिया में बढ़ते प्रभाव का प्रतीक है।
अब संघ परिवार विभिन्न माध्यमों से दुनिया के अलग देशों में भी राष्ट्रवाद की अलख जगाएगा। बौद्धिक मंथन के सहारे संघ ने दुनिया के अन्य देशों में राष्ट्रवाद का अलख जगाने की पहल शुरू भी कर दी है। संघ विचारक राकेश सिन्हा ने कहा है कि ब्रिटिश उपनिवेश राज के दौरान विभिन्न देशों में वहां की स्थानीय संस्कृति को दबा दिया गया। उसे दोबारा से उभारना है।
उन्होंने कहा कि यूरोप का सच पूरे विश्व की हकीकत नहीं है। सिन्हा ने कहा कि बौद्धिक उभार भारत की सीमा तक ही सीमित नहीं रहेगी। ब्रिटिश शासन के अधीन रहे देशों में भी बौद्धिक आंदोलन शुरू करना है।