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आरएसएस प्रमुख भागवत ने कहा- संघ केवल हिंदुओं के लिए नहीं, हम सब भारत मां के पुत्र हैं

Thu, 07 Jun 2018 10:46 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, नागपुर
ब्यूरो, अमर उजाला, नागपुर Updated Thu, 07 Jun 2018 10:46 PM IST
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RSS believes in unity in diversity says Mohan Bhagwat

भारतीय स्वयं सेवक संघ को लेकर तरह-तरह की धारणाओं को खारिज करते हुए मोहन भागवत ने साफ कर दिया कि हम जैसा करते हैं, वैसा ही दिखते हैं। चुनौती दी, आइए, आप भी परख सकते हैं। यहां आने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। आइए, समझिए और अपना भाव बनाइए। हम जैसे थे वैसे ही रहेंगे।

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उन्होंने कहा, विचार कुछ भी हो, जाति कुछ भी हो, समाज हितैषी आचरण को बढ़ावा देने वाले लोगों का संगठन है संघ। उन्होंने कहा, तत्व ज्ञान की हमारे पास कभी कमी नहीं रही, हां व्यवहार के मामले में हम निकृष्ट थे, लेकिन अब कुछ सुधार हुआ है। इसके बावजूद अभी भी बहुत कुछ हासिल किया जाना बाकी है।
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दुनिया को जवाब देना है
संघ प्रमुख ने कहा, भारत को दुनिया की समस्याओं का जवाब देना है। इस गंतव्य तक पहुंचने के लिए संघ सभी सज्जन शक्तियों को इकट्ठा करना चाहता है। प्रामाणिक लोगों में मत आड़े नहीं आते हैं। सब मिलकर चलते हैं।

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प्रणब मुखर्जी वहीं रहेंगे जो पहले थे

RSS believes in unity in diversity says Mohan Bhagwat

प्रणब मुखर्जी को बुलाए जाने पर भागवत ने साफ किया कि संघ की परंपरा रही है कि हम देश के सज्जनों को आमंत्रित करते हैं। इस बार कुछ विशेष चर्चा चली। इसका कोई अर्थ नहीं है। यह वैसे ही हुआ है जैसे हर साल होता है। संघ और प्रणब मुखर्जी वही रहेंगे जो पहले थे। संघ संपूर्ण समाज को संगठित करना चाहता है। इसलिए हमारे लिए कोई पराया नहीं है। भारत की धरती पर जन्मा प्रत्येक व्यक्ति भारत का पुत्र है। देशभक्ति करना उसका काम है। केवल पोषण और आजीविका के लिए प्रकृति ने हमें साधन नहीं दिए हैं। भाषाओं और पंथों की विविधता तो पहले से ही है। विविधता होना सुंदरता है। विविधता के बीच एकता ही हमारी संस्कृति है। यह सारे विश्व और स्वार्थ के भेद मिटाकर सुख शांति पूर्ण जीवन देने वाली भूमि है। मत-मतांतर तो होते ही रहते हैं। लेकिन इन सब बातों की एक मर्यादा है। अंतत: हम सब भारत माता के पुत्र हैं। हम सब मिलकर इसका भाग्य बदल देंगे। हेडगेवार ने कांग्रेस के आंदोलनों में दो बार भाग लिया। आजादी के आंदोलन में क्रांतिकारियों का साथ दिया। उन्होंने नेता जी सुभाष चंद्र बोस का भी जिक्र किया।

संगठित समाज ही देश का भाग्य बदल सकता है
किसी राष्ट्र का भाग्य बनाने वाले समूह नहीं होते हैं। सरकारें बहुत कुछ कर सकती हैं लेकिन सब कुछ नहीं कर सकती हैं। जब तक देश का सामान्य समाज गुणसंपन्न होकर देश के लिए पुरुषार्थ करने के लिए तैयार नहीं होता है तब तक सारे दल और समूह भी कुछ नहीं कर सकते हैं। हम सब एक हैं, सबके पूर्वज एक हैं। यह किसी को तुरंत समझ में आ जाता है लेकिन किसी-किसी को कुछ मालूम ही नहीं है। अपने संकुचित भेद छोड़कर इस भेद को हम सब समझ लें तो इस सनातन समाज को समृद्ध बनाया जा सकता है। संगठित समाज ही देश का भाग्य बदल सकता है।
 
किसी भी कार्य को करने के लिए शक्ति चाहिए। शक्ति संगठन में होती है। सबके मिलकर काम करने में होती है। अगर शक्ति को शील का आधार नहीं रहा तो वह शक्ति दानवी शक्ति बन जाती है। विद्या प्राप्त लोग विवाद में समय गंवा देते हैं। धनपति उसके मद में ही चूर रहते हैं। जबकि शक्ति संपन्न लोग इसका इस्तेमाल दूसरों को परेशान करने के लिए करते हैं। जबकि विद्या का इस्तेमाल ज्ञान के प्रसार में होना चाहिए। पांच गुणों के आधार पर संघ के कार्यकर्ता अपना जीवन बिताते हैं। इसी आधार पर संघ अपने प्रति प्रतिकूलता के वातावरण को अनुकूलता में बदलने में कामयाब रहा है।

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