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Cash Row: जज वर्मा के पास इस्तीफा देना ही एकमात्र विकल्प, संसद ने हटाया तो नहीं मिलेंगे पेंशन समेत अन्य लाभ
Wed, 13 Aug 2025 04:46 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 13 Aug 2025 04:46 PM IST
सार
लोकसभा अध्यक्ष ने जज यशवंत वर्मा के घर पर जली हुई नकदी की बरामदगी के मामले में जांच समिति का गठन किया है। अगर संसद वर्मा को हटाती है तो उन्हें पेंशन समेत अन्य लाभ नहीं मिलेंगे। ऐसे में उनके पास इससे पहले इस्तीफा देना ही एकमात्र विकल्प है।
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जज जस्टिस यशवंत वर्मा।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए एक समिति गठित की है। ऐसे में संसद की ओर से हटाए जाने से पहले उनके पास एकमात्र विकल्प इस्तीफा देना ही बचा है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट चीफ जस्टिस मनींद्र मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील बी. वी. आचार्य शामिल हैं।
146 लोकसभा सदस्यों ने की जज वर्मा को हटाने की मांग: बिरला
बिरला ने मंगलवार को लोकसभा में कहा कि यह समिति जल्द अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। तब तक वर्मा को हटाने का प्रस्ताव लंबित रहेगा। उन्होंने बताया कि 21 जुलाई को 146 लोकसभा सदस्यों ने जज वर्मा को हटाने की मांग की थी, जिसमें भाजपा के रवि शंकर प्रसाद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी शामिल थे।
ये भी पढ़ें: 'विकास के साथ पर्यावरण भी जरूरी', सुप्रीम कोर्ट ने गाचीबावली क्षेत्र के लिए तेलंगाना सरकार से मांगी योजना
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संसद ने हटाया तो नहीं मिलेंगे पेंशन और अन्य लाभ
जजों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया को जानने वाले अधिकारियों ने बताया कि वर्मा अगर संसद के सामने अपना पक्ष रखने जाते हैं, तो वह मौखिक रूप से इस्तीफा दे सकते हैं, जिसमें इस्तीफा माना जाएगा। अगर वह इस्तीफा देते हैं, तो उन्हें सेवानिवृत्त जज के रूप में पेंशन और अन्य लाभ मिलेंगे। लेकिन अगर उन्हें संसद की ओर से हटाया गया, तो उन्हें ये लाभ नहीं मिलेंगे।
क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 217
संविधान के अनुच्छेद 217 के मुताबिक, हाईकोर्ट के जज अपने हस्ताक्षर के साथ अपना इस्तीफा दे सकते हैं। जज के इस्तीफे को किसी स्वीकृति की जरूरत नहीं होती। केवल एक पत्र ही काफी होता है। जज इस्तीफे के लिए एक संभावित तारीख भी दे सकते हैं और इस तारीफ से पहले वे इस्तीफा वापस भी ले सकते हैं।
तत्कालीन सीजेआई ने इस्तीफा देने को कहा था
दूसरा तरीका यह है कि संसद भी जज को हटा सकती है। तत्कालीन चीफ जस्टिस (सीजेआई) संजीव खन्ना ने वर्मा को हटाने के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था। यह पत्र तीन जजों की जांच समिति की रिपोर्ट पर आधारित था। खन्ना ने वर्मा को इस्तीफा देने के लिए कहा था, लेकिन वर्मा ने इनकार किया था।
न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 के मुताबिक, जब किसी सदन में किसी जज को हटाने का प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है, तो अध्यक्ष या उपाध्यक्ष तीन सदस्यों की समिति बनाएंगे जो आरोपों की जांच करेगी। इस समिति में सीजेआई या सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित कानूनी जानकार शामिल होंगे। समिति की रिपोर्ट सदन में पेश की जाएगी और उसके बाद बहस होगी।
ये भी पढ़ें: 'मतदाता हितैषी है मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया', सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
घर पर आग लगने बाद मिली थी जली हुई नकदी
इस साल मार्च में दिल्ली हाईकोर्ट के जज रहते हुए वर्मा के घर में आग लगने की घटना हुई थी। इस दौरान उनके घर से नकदी के जले हुए बंडल बरामद हुए थे। जज ने नकदी की जानकारी न होने का दावा किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई समिति ने गवाहों से पूछताछ और उनके बयान के आधार पर उन्हें दोषी पाया था। इसके बाद वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेज दिया गया, जहां उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया है।
पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के जज वी रामास्वामी और कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन भी महाभियोग की प्रक्रिया का सामना कर चुके हैं, लेकिन उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। जज वर्मा के खिलाफ यह पहली महाभियोग प्रक्रिया होगी, जो नए संसद भवन में होगी।
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146 लोकसभा सदस्यों ने की जज वर्मा को हटाने की मांग: बिरला
बिरला ने मंगलवार को लोकसभा में कहा कि यह समिति जल्द अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। तब तक वर्मा को हटाने का प्रस्ताव लंबित रहेगा। उन्होंने बताया कि 21 जुलाई को 146 लोकसभा सदस्यों ने जज वर्मा को हटाने की मांग की थी, जिसमें भाजपा के रवि शंकर प्रसाद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी शामिल थे।
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संसद ने हटाया तो नहीं मिलेंगे पेंशन और अन्य लाभ
जजों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया को जानने वाले अधिकारियों ने बताया कि वर्मा अगर संसद के सामने अपना पक्ष रखने जाते हैं, तो वह मौखिक रूप से इस्तीफा दे सकते हैं, जिसमें इस्तीफा माना जाएगा। अगर वह इस्तीफा देते हैं, तो उन्हें सेवानिवृत्त जज के रूप में पेंशन और अन्य लाभ मिलेंगे। लेकिन अगर उन्हें संसद की ओर से हटाया गया, तो उन्हें ये लाभ नहीं मिलेंगे।
क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 217
संविधान के अनुच्छेद 217 के मुताबिक, हाईकोर्ट के जज अपने हस्ताक्षर के साथ अपना इस्तीफा दे सकते हैं। जज के इस्तीफे को किसी स्वीकृति की जरूरत नहीं होती। केवल एक पत्र ही काफी होता है। जज इस्तीफे के लिए एक संभावित तारीख भी दे सकते हैं और इस तारीफ से पहले वे इस्तीफा वापस भी ले सकते हैं।
तत्कालीन सीजेआई ने इस्तीफा देने को कहा था
दूसरा तरीका यह है कि संसद भी जज को हटा सकती है। तत्कालीन चीफ जस्टिस (सीजेआई) संजीव खन्ना ने वर्मा को हटाने के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था। यह पत्र तीन जजों की जांच समिति की रिपोर्ट पर आधारित था। खन्ना ने वर्मा को इस्तीफा देने के लिए कहा था, लेकिन वर्मा ने इनकार किया था।
न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 के मुताबिक, जब किसी सदन में किसी जज को हटाने का प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है, तो अध्यक्ष या उपाध्यक्ष तीन सदस्यों की समिति बनाएंगे जो आरोपों की जांच करेगी। इस समिति में सीजेआई या सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित कानूनी जानकार शामिल होंगे। समिति की रिपोर्ट सदन में पेश की जाएगी और उसके बाद बहस होगी।
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घर पर आग लगने बाद मिली थी जली हुई नकदी
इस साल मार्च में दिल्ली हाईकोर्ट के जज रहते हुए वर्मा के घर में आग लगने की घटना हुई थी। इस दौरान उनके घर से नकदी के जले हुए बंडल बरामद हुए थे। जज ने नकदी की जानकारी न होने का दावा किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई समिति ने गवाहों से पूछताछ और उनके बयान के आधार पर उन्हें दोषी पाया था। इसके बाद वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेज दिया गया, जहां उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया है।
पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के जज वी रामास्वामी और कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन भी महाभियोग की प्रक्रिया का सामना कर चुके हैं, लेकिन उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। जज वर्मा के खिलाफ यह पहली महाभियोग प्रक्रिया होगी, जो नए संसद भवन में होगी।