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Report: अनुसूचित जातियों पर अत्याचार के 98% मामले 13 राज्यों में, सजा की दर भी गिरी
Mon, 23 Sep 2024 05:29 AM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Mon, 23 Sep 2024 05:29 AM IST
सार
सरकारी रिपोर्ट में खुलासा, यूपी में सर्वाधिक मामले...14 राज्यों के आधे जिलों में नहीं बनीं विशेष अदालतें
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arrested, arrest demo
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
वर्ष 2022 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में से करीब 97.7 फीसदी मामले 13 राज्यों से सामने आए। इनमें उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में ऐसे अपराधों की सबसे अधिक संख्या दर्ज की गई। ये आंकड़े एक सरकारी रिपोर्ट से सामने आए हैं। चिंता की बात यह है कि सजा की दर में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं 14 राज्यों के आधे से अधिक जिलों में मामलों के निपटारे में तेजी लाने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना भी नहीं की गई।
इन 13 राज्यों में सबसे ज्यादा मामले
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के तहत सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के खिलाफ ज्यादातर अत्याचार भी 13 राज्यों में केंद्रित थे, जहां 2022 में सभी मामलों के 98.91 फीसदी मामले दर्ज किए गए। अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए कानून के तहत दर्ज 51,656 मामलों में से उत्तर प्रदेश में 12,287 दर्ज हुए। यह आंकड़ा कुल मामलों का 23.78 फीसदी था। इसके बाद राजस्थान में 8,651 (16.75 फीसदी) और मध्य प्रदेश में 7,732 (14.97 फीसदी) मामले दर्ज किए गए। अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अत्याचार के अहम मामलों वाले अन्य राज्य बिहार 6,799 (13.16 फीसदी), ओडिशा 3,576 (6.93 फीसदी) और महाराष्ट्र 2,706 (5.24 फीसदी) थे। इन छह राज्यों में कुल मामलों का लगभग 81 फीसदी हिस्सा था। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 के दौरान भारतीय दंड संहिता के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अनुसूचित जातियों के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार के अपराधों से संबंधित कुल मामलों 52,866 में से 51,656 (97.7 फीसदी) का पंजीकरण 13 राज्यों में हुआ है।
एसटी के खिलाफ अपराध सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में
रिपोर्ट के मुताबिक, अनुसूचित जनजातियों के लिए कानून के तहत दर्ज 9,735 मामलों में से सर्वाधिक 2,979 मामले (30.61 फीसदी) मध्य प्रदेश में सामने आए। इसके बाद राजस्थान में 2,498 (25.66 फीसदी) मामले दर्ज हुए जो दूसरे स्थान पर है, जबकि ओडिशा में 773 (7.94 फीसदी) मामले सामने आए। इनके अलावा महाराष्ट्र में 691मामले (7.10 फीसदी) और आंध्र प्रदेश में 499 मामले (5.13 फीसदी) दर्ज किए गए।
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60 फीसदी में ही आरोपपत्र 17 हजार की जांच लंबित
आंकड़ों से कानून के तहत जांच और आरोपपत्र की स्थिति की भी जानकारी मिली। सुप्रीम कोर्ट से संबंधित मामलों में से 60.38 फीसदी में आरोपपत्र दायर किए गए, जबकि 14.78 फीसदी मामलों में झूठे दावों या साक्ष्यों के अभाव जैसे कारणों से अंतिम रिपोर्ट दी गई। 2022 के अंत तक 17,166 मामलों में जांच लंबित थी। अनुसूचित जनजाति से संबंधित मामलों में 63.32 फीसदी मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए गए, जबकि 14.71 फीसदी मामलों में अंतिम रिपोर्ट दी गई। समीक्षाधीन अवधि के अंत में अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध अत्याचार से संबंधित 2,702 मामले अभी भी जांच के अधीन थे।
सात फीसदी गिरी सजा की दर
रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंताजनक बात इस कानून के तहत मामलों में सजा की दर में आई गिरावट है। 2022 में सजा की दर 2020 के 39.2 फीसदी से गिरकर 32.4 फीसदी हो गई। इसके अलावा, रिपोर्ट में इस कानून के तहत मामलों को निपटारे के लिए स्थापित विशेष अदालतों की अपर्याप्त संख्या की ओर भी ध्यान दिलाया गया। 14 राज्यों के 498 जिलों में से केवल 194 ने ही इन मामलों के निपटारे में तेजी लाने के लिए विशेष अदालतें स्थापित की थीं।
कमजोर समुदायों के लिए मजबूत सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत
रिपोर्ट में विशेष रूप से अत्याचारों से ग्रस्त जिलों की भी पहचान की गई है, जिनमें से केवल 10 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने ऐसे जिलों की घोषणा की है। बाकी राज्यों ने कहा कि अत्याचारों के ऐसे मामलों से ग्रस्त कोई जिला नहीं है। उत्तर प्रदेश उन राज्यों में से एक था, जिसने कहा कि राज्य में अत्याचार संभावित कोई क्षेत्र चिह्नत नहीं किया गया है। रिपोर्ट में पहचाने गए जिलों में जाति आधारित हिंसा की घटनाओं पर अंकुश लगाने और कमजोर समुदायों के लिए मजबूत सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लक्षित दखल की आवश्यकता पर बल दिया गया।
इन राज्यों में एससी-एसटी संरक्षण प्रकोष्ठ
रिपोर्ट के मुताबिक, आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, मिजोरम, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, चंडीगढ़, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पुडुचेरी में एससी/एसटी संरक्षण प्रकोष्ठ स्थापित किए गए हैं। इन पांच राज्यों में विशेष पुलिस थाने भी...पांच राज्यों बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, केरल और मध्य प्रदेश ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध अपराधों की शिकायत दर्ज करने के लिए विशेष पुलिस स्टेशन स्थापित किए हैं।
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इन 13 राज्यों में सबसे ज्यादा मामले
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के तहत सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के खिलाफ ज्यादातर अत्याचार भी 13 राज्यों में केंद्रित थे, जहां 2022 में सभी मामलों के 98.91 फीसदी मामले दर्ज किए गए। अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए कानून के तहत दर्ज 51,656 मामलों में से उत्तर प्रदेश में 12,287 दर्ज हुए। यह आंकड़ा कुल मामलों का 23.78 फीसदी था। इसके बाद राजस्थान में 8,651 (16.75 फीसदी) और मध्य प्रदेश में 7,732 (14.97 फीसदी) मामले दर्ज किए गए। अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अत्याचार के अहम मामलों वाले अन्य राज्य बिहार 6,799 (13.16 फीसदी), ओडिशा 3,576 (6.93 फीसदी) और महाराष्ट्र 2,706 (5.24 फीसदी) थे। इन छह राज्यों में कुल मामलों का लगभग 81 फीसदी हिस्सा था। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 के दौरान भारतीय दंड संहिता के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अनुसूचित जातियों के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार के अपराधों से संबंधित कुल मामलों 52,866 में से 51,656 (97.7 फीसदी) का पंजीकरण 13 राज्यों में हुआ है।
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एसटी के खिलाफ अपराध सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में
रिपोर्ट के मुताबिक, अनुसूचित जनजातियों के लिए कानून के तहत दर्ज 9,735 मामलों में से सर्वाधिक 2,979 मामले (30.61 फीसदी) मध्य प्रदेश में सामने आए। इसके बाद राजस्थान में 2,498 (25.66 फीसदी) मामले दर्ज हुए जो दूसरे स्थान पर है, जबकि ओडिशा में 773 (7.94 फीसदी) मामले सामने आए। इनके अलावा महाराष्ट्र में 691मामले (7.10 फीसदी) और आंध्र प्रदेश में 499 मामले (5.13 फीसदी) दर्ज किए गए।
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60 फीसदी में ही आरोपपत्र 17 हजार की जांच लंबित
आंकड़ों से कानून के तहत जांच और आरोपपत्र की स्थिति की भी जानकारी मिली। सुप्रीम कोर्ट से संबंधित मामलों में से 60.38 फीसदी में आरोपपत्र दायर किए गए, जबकि 14.78 फीसदी मामलों में झूठे दावों या साक्ष्यों के अभाव जैसे कारणों से अंतिम रिपोर्ट दी गई। 2022 के अंत तक 17,166 मामलों में जांच लंबित थी। अनुसूचित जनजाति से संबंधित मामलों में 63.32 फीसदी मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए गए, जबकि 14.71 फीसदी मामलों में अंतिम रिपोर्ट दी गई। समीक्षाधीन अवधि के अंत में अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध अत्याचार से संबंधित 2,702 मामले अभी भी जांच के अधीन थे।
सात फीसदी गिरी सजा की दर
रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंताजनक बात इस कानून के तहत मामलों में सजा की दर में आई गिरावट है। 2022 में सजा की दर 2020 के 39.2 फीसदी से गिरकर 32.4 फीसदी हो गई। इसके अलावा, रिपोर्ट में इस कानून के तहत मामलों को निपटारे के लिए स्थापित विशेष अदालतों की अपर्याप्त संख्या की ओर भी ध्यान दिलाया गया। 14 राज्यों के 498 जिलों में से केवल 194 ने ही इन मामलों के निपटारे में तेजी लाने के लिए विशेष अदालतें स्थापित की थीं।
कमजोर समुदायों के लिए मजबूत सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत
रिपोर्ट में विशेष रूप से अत्याचारों से ग्रस्त जिलों की भी पहचान की गई है, जिनमें से केवल 10 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने ऐसे जिलों की घोषणा की है। बाकी राज्यों ने कहा कि अत्याचारों के ऐसे मामलों से ग्रस्त कोई जिला नहीं है। उत्तर प्रदेश उन राज्यों में से एक था, जिसने कहा कि राज्य में अत्याचार संभावित कोई क्षेत्र चिह्नत नहीं किया गया है। रिपोर्ट में पहचाने गए जिलों में जाति आधारित हिंसा की घटनाओं पर अंकुश लगाने और कमजोर समुदायों के लिए मजबूत सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लक्षित दखल की आवश्यकता पर बल दिया गया।
इन राज्यों में एससी-एसटी संरक्षण प्रकोष्ठ
रिपोर्ट के मुताबिक, आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, मिजोरम, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, चंडीगढ़, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पुडुचेरी में एससी/एसटी संरक्षण प्रकोष्ठ स्थापित किए गए हैं। इन पांच राज्यों में विशेष पुलिस थाने भी...पांच राज्यों बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, केरल और मध्य प्रदेश ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध अपराधों की शिकायत दर्ज करने के लिए विशेष पुलिस स्टेशन स्थापित किए हैं।