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17वीं लोकसभा में रिकॉर्ड 30 फीसदी सांसद हैं वंशवादी राजनीति का चेहरा

Mon, 27 May 2019 11:17 PM IST
अमर शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Mon, 27 May 2019 11:17 PM IST
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Record 30 percent MP in 17th Lok Sabha are dynasts, face of dynastic politics
राहुल गांधी - फोटो : twitter@congress
नवनिर्वाचित 17वीं लोकसभा में रिकॉर्ड 30 फीसदी सांसद राजनीतिक परिवारों से हैं। राज्यों में, पंजाब और बिहार में वंशवादी सांसदों का अनुपात सबसे ज्यादा है। पार्टियों में, कांग्रेस सबसे अधिक वंशवादी है, लेकिन भाजपा भी पीछे नहीं रही है, जबकि सीपीएम सबसे कम वंशवादी है। दो राजनीतिक वैज्ञानिक ने राजनीतिक रुझानों और कारणों की जांच की है, जिसमें यह बात निकलकर सामने आई है।
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हालांकि कांग्रेस पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों के प्रमुख राजवंश उम्मीदारों को जनता ने धूल चटाई है - बेशक इसमें अमेठी की अपनी जागीर से खुद राहुल गांधी भी शामिल हैं - वंशवादी कारक इस चुनाव में नजर आया है। साफ देखा जा सकता है कि वंशवादी राजनीति का चलन बढ़ गया है।
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इंडियन एक्सप्रेस में छपे इस विशलेषण के मुताबिक 'राजवंश' उपाधि से उस उम्मीदवार या सांसद को परिभाषित किया गया है जिनका कोई रिश्तेदार, पहले या मौजूदा समय में प्रतिनिधित्व के किसी भी स्तर पर चुनावी जनादेश की सेवा में लगा है। इसमें ऐसे रिश्तेदार भी शामिल हैं जो पार्टी संगठनों में प्रमुख पदों पर आसीन हैं या सेवा कर चुके हैं। 
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2016 में कंचन चंद्रा द्वारा संपादित एक पुस्तक में दिखाया गया है कि "भारतीय सांसदों का एक चौथाई वंशवाद, औसतन 2004 और 2014 के बीच था...।" भारत के राष्ट्रीय और प्रांतीय निर्वाचित प्रतिनिधियों के सामाजिक प्रोफाइल के बारे में सीएनआरएस द्वारा प्रायोजित एसपीआईएनपीईआर (SPINPER) परियोजना के तहत, त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा (अशोक विश्वविद्यालय) और सीईआरआई (विज्ञान पीओ) के लिए शोधकर्ताओं की एक टीम द्वारा इकट्ठा किए गए आंकड़ों से और ज्यादा बड़ी संख्या उभर कर सामने आती है। आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 में, सभी लोकसभा सांसदों में से 30 फीसदी राजनीतिक परिवारों से संबंधित हैं, जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

बड़े राज्यों में, जहां राजवंशों का अनुपात राष्ट्रीय औसत से ऊपर है, बढ़ते क्रम में इस प्रकार है - राजस्थान (32 फीसदी), उड़ीसा (33 फीसदी), तेलंगाना (35 फीसदी), आंध्र प्रदेश (36 फीसदी), तमिलनाडु (37 फीसदी), कर्नाटक (39 फीसदी), महाराष्ट्र (42 फीसदी), बिहार (43 फीसदी) और पंजाब (62 फीसदी)। जाहिर तौर पर यह घटना भौगोलिक रूप से हर जगह फैली हुई है। 

राजनीतिक दलों की सच्चाई जानकर चौंक जाएंगे

Record 30 percent MP in 17th Lok Sabha are dynasts, face of dynastic politics
भाजपा - फोटो : amar ujala
आश्चर्यजनक रूप से यह सभी पक्षों को भी प्रभावित करता है - और जरूरी नहीं कि यह सिर्फ सामान्य तौर पर संदिग्ध समझे जानेवाले लोगों की बात है। कोई यह मान लेगा कि राज्य-आधारित पार्टियां, जो निजी परिवारिक संपत्ति के रूप में काम करती हैं, अधिक वंशवादी होंगी। जबकि असलियत में ऐसा नहीं है। सभी राज्यों में राष्ट्रीय दल इस घटना में सबसे आगे हैं।

यह अंतर बिहार में विशेष रूप से चौंकानेवाला है (राष्ट्रीय दलों के 58 फीसदी राजवंशीय उम्मीदवारों के बीच, क्षेत्रीय दलों के 14 फीसदी राजवंशीय उम्मीदवार), हरियाणा में (50 फीसदी की तुलना में 5 फीसदी), कर्नाटक में (35 फीसदी के मुकाबले 13 फीसदी), महाराष्ट्र में (35 फीसदी के मुकाबले 19 फीसदी), ओडिशा में (33 फीसदी के मुकाबले 15 फीसदी), तेलंगाना में (32 फीसदी की तुलना में 22 फीसदी) और यहां तक कि उत्तर प्रदेश में (28 फीसदी की तुलना में 18 फीसदी)। हालांकि राज्य की कुछ पार्टियां वंशवादी उम्मीदवारों के औसत अनुपात से ऊपर स्थित हैं: जद (एस) (66 फीसदी), शिरोमणि अकाली दल (60 फीसदी), टीडीपी (52 फीसदी), राजद (38 फीसदी), बीजेडी (38 फीसदी), सपा (30 फीसदी)। इनमें से अधिकांश दलों का नेतृत्व राजनीतिक परिवार करते हैं, जो अक्सर बड़े होते हैं, जैसे समाजवादी पार्टी। 

वह पार्टियां जो वंशवादी राजनीति में शामिल नहीं हैं, वे सीपीआई और सीपीआई (एम) हैं, जहां 5 फीसदी से कम उम्मीदवार राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। वे आज बहुत पीछे नजर आती हैं। इसके वंशवादी राजनीति में शामिल नहीं होने के अलावा निश्चित तौर पर कई अन्य कारण होंगे। 

राष्ट्रीय दलों में, कांग्रेस सबसे अधिक वंशवादी बनी हुई है, जिसमें उसके 31 फीसदी उम्मीदवार राजनीतिक परिवार से हैं। लेकिन भाजपा 22 फीसदी राजवंश उम्मीदवारों के साथ ज्यादा पीछे नहीं रह गई है। 

भाजपा के बारे में यह आंकड़ा दो कारणों से आदर्श से उलट नजर आता है। सबसे पहले, भाजपा सभी विरोधियों की वंशवादी राजनीति के लिए आलोचना करती है और उन पर अलोकतांत्रिक संस्थान बनाने का आरोप लगाती है। दूसरा, भाजपा ने अपने 282 निवर्तमान सांसदों में से 100 को टिकट देने से इनकार कर नए उम्मीदवारों को मौका देने की विशेष कोशिश की। लेकिन इस बड़े पैमाने पर बदलाव के बावजूद, वंशवादी राजनीति से ताल्लुक रखनेवाले भाजपा उम्मीदवारों का प्रतिशत अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है। 
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