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'Sarna' Religion For Tribals: पांच राज्यों के आदिवासी संगठनों की केंद्र से मांग- सरना धर्म को दी जाए मान्यता, हम हिंदू नहीं
Thu, 30 Jun 2022 08:48 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amit Mandal
Updated Thu, 30 Jun 2022 08:48 PM IST
सार
इनका कहना था कि हम आदिवासी न तो हिंदू हैं और न ही ईसाई। हमारी अपनी जीवन शैली, धार्मिक प्रथाएं, रीति-रिवाज, संस्कृति और धार्मिक विचार हैं, जो किसी भी अन्य धर्म से अलग हैं।
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आदिवासी महिलाएं (file photo)
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
झारखंड, ओडिशा और असम सहित पांच राज्यों के विभिन्न आदिवासी समुदायों के लोगों ने गुरुवार को दिल्ली में प्रदर्शन करते हुए केंद्र से उनके धर्म को 'सरना' के रूप में मान्यता देने और आगामी जनगणना के दौरान इस श्रेणी के तहत उनकी गणना सुनिश्चित करने की मांग की। आंदोलनकारियों ने 'सरना धर्म संहिता' को सरकार की मान्यता दिलाने के लिए अपने संघर्ष को तेज करने का भी संकल्प लिया और जंतर-मंतर पर सामूहिक प्रार्थना की और अपने देवताओं और श्रद्धेय नेताओं का आशीर्वाद लिया। 30 जून, 1855 को अंग्रेजों के खिलाफ संथाल विद्रोह की शुरुआत की वर्षगांठ को चिह्नित करने के लिए आंदोलन का आयोजन किया गया था।
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इसमें अधिकांश संथाल जनजाति के सदस्य थे और इन्होंने झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम के 50 जिलों के 250 अनुसूचित जनजाति बहुल ब्लॉकों से आदिवासी सेंगल अभियान (आदिवासी सशक्तिकरण अभियान) के तत्वावधान में अपनी मांगों को उठाया। झारखंड के एक प्रमुख आदिवासी नेता सलखान मुर्मू ने कहा कि हम यहां यह मांग करने के लिए आए हैं कि सरकार हमारे धर्म को 'सरना' के रूप में मान्यता दे और इस श्रेणी के तहत आदिवासियों की गणना के लिए आगामी जनगणना में एक प्रावधान शामिल करे। हम राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद से अपनी भावनाओं को व्यक्त करना चाहते थे और उनसे सरना के रूप में हमारे धर्म को मान्यता देने का आग्रह करना चाहते थे, लेकिन उनसे मिलने का समय नहीं मिल सका। इसलिए हमने पुलिस के माध्यम से राष्ट्रपति को अपनी मांगों का एक ज्ञापन सौंपा।
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1998-2004 से लगातार दो बार ओडिशा के मयूरभंज लोकसभा क्षेत्र से भाजपा सांसद रहे मुर्मू ने कहा कि देश में आदिवासियों का अपना धर्म, धार्मिक प्रथाएं और रीति-रिवाज हैं, लेकिन इसे अभी तक सरकार द्वारा मान्यता नहीं मिली है। हम आदिवासी न तो हिंदू हैं और न ही ईसाई। हमारी अपनी जीवन शैली, धार्मिक प्रथाएं, रीति-रिवाज, संस्कृति और धार्मिक विचार हैं, जो किसी भी अन्य धर्म से अलग हैं। हम प्रकृति की पूजा करते हैं न कि मूर्तियों की। हमारे समाज में न तो वर्ण व्यवस्था है और न ही कोई असमानता। उन्होंने दावा किया कि आदिवासियों के धर्म को सरकार की मान्यता के अभाव में देश में अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों को अन्य धर्मों को अपनाने के लिए गुमराह किया जाता है।
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