अब राम मंदिर टाइम कैप्सूल को लेकर आया खंडन, ट्रस्ट के सदस्य ने बताया अफवाह
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अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की घड़ी अब नजदीक आती जा रही है। भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण का रास्ता अदालत की चौखट से होकर निकला। करीब 500 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी गई। विवाद इस बात को लेकर था कि यहां मंदिर था या नहीं। दोनों पक्षों की ओर से दलीलें दी गईं। हजारों सबूत पेश किए गए।
भविष्य में फिर से ऐसा कोई सवाल या विवाद न खड़ा हो, इसके लिए एक अहम कदम भी उठाने की चर्चा है। राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने कहा था कि राम मंदिर की नींव में 200 फीट नीचे टाइम कैप्सूल डाला जाएगा, जिसमें राम मंदिर से जुड़े साक्ष्य होंगे। ऐसा इसलिए किया जाएगा ताकि आने वाली पीढ़ियों में कभी इस तरह का विवाद हो तो सच्चाई का पता लग सके।हालांकि मंगलवार को ट्रस्ट के ही एक अन्य सदस्य चंपत राय ने दावा किया है कि टाइम कैप्सूल की खबरें निराधार हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
All reports about placing of a time capsule under the ground at Ram Temple construction site on 5th August are false. Do not believe in any such rumour: Champat Rai, General Secretary, Ram Janmabhoomi Teerth Kshetra Trust https://t.co/tAaZWsuJWn pic.twitter.com/HQ4CkZ9Ob9
— ANI (@ANI) July 28, 2020
यह पहला मामला नहीं
हालांकि ऐसा नहीं है कि टाइम कैप्सूल को जमीन के भीतर रखने का यह पहला मामला होगा। भारत के इतिहास में ऐसा पहले भी हो चुका है। भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ऐसा कर चुकी हैं। जेएनयू के प्रोफेसर आनंद रंगनाथन ने एक तस्वीर ट्वीट कर यह जानकारी दी। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त, 1973 को लालकिले के पास एक टाइम कैप्सूल जमीन में दबाया था। हालांकि यह पता नहीं चल सका है कि उसमें क्या साक्ष्य थे और क्या जानकारियां थीं, जिसे सहेजा गया था।
On August 15, 1973, amid great fanfare, Indira Gandhi buried a vacuum-sealed, copper- and steel-encased time capsule in front of the Red Fort. Set to last 5000 years, its contents have never been made public.
— Anand Ranganathan (@ARanganathan72) July 26, 2020
What was in it that was so secretive? pic.twitter.com/Z7gm05cOKR
टाइम कैप्सूल का नाम 'कालपात्र'
मीडिया खबरों के मुताबिक उस टाइम कैप्सूल का नाम 'कालपात्र' दिया गया था। कहा जाता है कि 1970 के दशक में जब इंदिरा गांधी की लोकप्रियता काफी ज्यादा थी, जब उन्होंने लालकिले के परिसर में इस टाइम कैप्सूल को रखवाया था। यह भी दावा किया गया कि इस टाइम कैप्सूल में आजादी मिलने के बाद के 25 सालों के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का जिक्र है और उससे जुड़े साक्ष्य हैं। हालांकि विपक्ष ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि वह गांधी परिवार का महिमामंडन करने के लिए ऐसा कर रही हैं।
सत्ता बदली तो खोदकर निकाला गया टाइम कैप्सूल
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का यह कदम पहले से ही विपक्षी नेताओं को खटक रहा था। मोरारजी देसाई ने चुनावों में वादा किया कि अगर उनकी सरकार बनी तो इसे खोदकर निकाला जाएगा। 1977 में कांग्रेस ने सत्ता गंवाई और उनकी सरकार बनी।
तत्कालीन पीएम मोरारजी देसाई ने वादा निभाते हुए इसे खोदकर निकलवाया भी। मगर इसका कभी खुलासा नहीं हुआ कि इस कालपत्र में क्या लिखा हुआ था। इतने साल बीत जाने के बाद भी इस राज से अभी तक परदा नहीं हटा है।