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Rajya Sabha Election: भाजपा ने इन उम्मीदवारों से एक साथ साधे कई निशाने, जातिगत समीकरणों के साथ फोकस में मिशन 2024

Tue, 31 May 2022 04:14 PM IST
Rahul Sampal राहुल संपाल
Updated Tue, 31 May 2022 04:14 PM IST
सार

भाजपा ने राजस्थान से घनश्याम तिवाड़ी को प्रत्याशी बनाकर यह साफ कर दिया है कि पार्टी में व्यक्ति नहीं संगठन महत्वपूर्ण है। प्रदेश में 2013 से लेकर 2018 तक वसुंधरा राजे की सरकार थी। तब राजे और तिवाड़ी दोनों में खींचतान चलती रहती थी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अब तिवाडी को राज्यसभा चुनाव का प्रत्याशी बनाकर वसुंधरा राजे को पार्टी ने आइना दिखाया गया है...

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Rajya Sabha Election: BJP release the list of its candidates, mission 2024 in focus with caste equations
राज्यसभा चुनाव 2022 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारतीय जनता पार्टी ने अपने राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इनमें कई दिग्गज केंद्रीय मंत्रियों से लेकर कई साधारण नेताओं के नाम भी शामिल हैं। पार्टी ने इस बार महिलाओं को ज्यादा टिकट दिए हैं। इसमें चार चेहरे बिल्कुल नए हैं। हालांकि इस बार उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक समीकरणों का भी पूरा ध्यान रखा गया है।

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यूपी से आखिर क्यों मिथिलेश कुमार और के.लक्ष्मण

भाजपा की लिस्ट में ब्राह्मण, निषाद, वैश्य, ओबीसी और दलित समेत सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व है। मिथिलेश कुमार भले ही राष्ट्रीय राजनीति में चर्चित नहीं रहे हैं, लेकिन शाहजहांपुर में उनका अच्छा खासा दखल माना जाता है। उनकी पत्नी शकुंतला देवी भी समाजवादी पार्टी से दो बार विधायक चुनी जात चुकी हैं। वह 2019 के आम चुनाव के दौरान भाजपा में शामिल हो गए थे। तब पार्टी ने उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं दिया था, लेकिन अब राज्यसभा भेजकर मिथिलेश कुमार को सब्र का मीठा फल दिया है। वहीं जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साध लिया है। मिथिलेश कुमार के अलावा दूसरा चौंकाने वाला नाम के. लक्ष्मण का है, जो तेलंगाना से आते हैं। केसीआर की सत्ता वाले इस राज्य में भाजपा खुद को मुकाबले में लाने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि राज्य के नेता को यूपी से राज्यसभा भेज रही है। वह तेलंगाना में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। फिलहाल भाजपा के ओबीसी मोर्चे की कमान उनके ही पास है। लक्ष्मण को गृहमंत्री अमित शाह का करीबी माना जाता है। इसके अलावा तेलंगाना में वह दो बार विधायक भी रह चुके हैं। ऐसे में उन्हें यूपी से राज्यसभा भेजना भले ही चौंकाने वाला है, लेकिन पार्टी के समीकरणों में जरूर फिट बैठता है।

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मध्यप्रदेश में पंचायत-विधानसभा चुनाव पर नजर

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने मध्यप्रदेश की दोनों सीटों पर महिला उम्मीदवार उतार कर सभी को चौंका दिया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की करीबी मानी जाने वाली सुमित्रा वाल्मीकि भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और अनुसूचित जाति वर्ग से आती हैं। इससे पहले कविता पाटीदार को राज्यसभा भेजने का एलान पार्टी पहले ही कर चुकी है, जो ओबीसी समुदाय की हैं। दोनों ही नाम ज्यादा चर्चा में नहीं थे, लेकिन उन्हें उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने पंचायत चुनाव और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी अपनी रणनीति की ओर इशारा कर दिया है।

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राजस्थान में तिवाड़ी के जरिए राजे को जवाब

भाजपा ने राजस्थान से घनश्याम तिवाड़ी को प्रत्याशी बनाकर यह साफ कर दिया है कि पार्टी में व्यक्ति नहीं संगठन महत्वपूर्ण है। घनश्याम तिवाड़ी जनसंघ के समय से संगठन से जुड़े हैं। 45 साल तक वे भाजपा में सक्रिय नेता के रूप में रहे। जयपुर के सांगानेर से लगातार तीन बार विधायक का चुनाव जीता। 75 वर्षीय घनश्याम तिवाड़ी को राज्यसभा भेजने का निर्णय लेकर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी वरिष्ठता को तवज्जो दी है। प्रदेश में 2013 से लेकर 2018 तक वसुंधरा राजे की सरकार थी। तब राजे और तिवाड़ी दोनों में खींचतान चलती रहती थी। पार्टी के नेता होने के बावजूद घनश्याम तिवाड़ी तत्कालीन मुख्यमंत्री राजे के खिलाफ सड़क से लेकर सदन तक खुलकर विरोध करते थे। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अब तिवाडी को राज्यसभा चुनाव का प्रत्याशी बनाकर वसुंधरा राजे को पार्टी ने आइना दिखाया गया है।

बिहार-झारखंड में एक तीर से दो निशाने

झारखंड में भाजपा ने आदित्य साहू को उम्मीदवार बनाया है। साहू लगभग दो वर्ष से झारखंड प्रदेश भाजपा के महामंत्री हैं। उन्हें अब तक चुनाव लड़ने का कोई अनुभव नहीं है। भाजपा ने उन्हें उम्मीदवार बनाकर एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है। पहला संदेश यह कि नेतृत्व की निगाह उन साधारण कार्यकर्ताओं पर भी है, जो निष्ठा के साथ लंबे समय से पार्टी का झंडा ढो रहे हैं। किसी नेता-कार्यकर्ता का प्रोफाइल बड़ा न भी हो तो उसे उसकी निष्ठा के एवज में उच्च पद से नवाजा जा सकता है। दूसरा यह की प्रदेश की सियासत में वैश्य समाज अहम भूमिका अदा करता है। 81 में से लगभग 60 विधानसभा सीटों पर वैश्य समाज की खासी आबादी है और हर चुनाव में यह तबका एक प्रभावी फैक्टर होता है। झारखंड भाजपा में वैश्य समाज का सबसे बड़ा चेहरा पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास माने जाते रहे हैं। आदित्य साहू उनके बेहद करीबी रहे हैं। इसी तरह बिहार से शंभू शरण पटेल का नाम भी चौंकाने वाला है। पटेल पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में से एक हैं। इससे पहले वह पिछड़ा मोर्चा में सहसंयोजक थे। जातीय समीकरणों की बात करें तो भाजपा ने शंभू शरण पटेल के जरिए कुर्मी कार्ड खेला है। पटेल अवधिया कुर्मी समाज से आते हैं।

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