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New Delhi: 'अनुशासनहीनता विट्ठलभाई पटेल की विरासत को कमजोर कर रही', सदन की गरिमा पर बोले राज्यसभा के उपसभापति
Sun, 24 Aug 2025 08:30 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Sun, 24 Aug 2025 08:30 PM IST
सार
राज्यसभा उपसभापति हरिवंश ने दिल्ली विधानसभा में आयोजित ऑल इंडिया स्पीकर्स कांफ्रेंस में चेताया कि सदनों में बढ़ती अनुशासनहीनता और नारेबाजी लोकतंत्र और विट्ठलभाई पटेल की विरासत को कमजोर कर रही है। उन्होंने याद दिलाया कि पटेल का नेतृत्व भारतीय लोकतांत्रिक यात्रा का ऐतिहासिक क्षण था।
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राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश
- फोटो : X-@harivansh1956
विस्तार
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने रविवार को कहा कि संसद और विधानसभाओं में बढ़ती अनुशासनहीनता और नारेबाजी लोकतंत्र की मूल भावना को कमजोर कर रही है। उन्होंने चेताया कि इस तरह का व्यवहार देश के पहले भारतीय सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के अध्यक्ष बने विट्ठलभाई पटेल की ऐतिहासिक विरासत को नुकसान पहुंचा रहा है। हरिवंश दिल्ली विधानसभा की ओर से आयोजित पहले ऑल इंडिया स्पीकर्स कांफ्रेंस के उद्घाटन सत्र में बोल रहे थे। यह आयोजन पटेल के ऐतिहासिक निर्वाचन की 100वीं वर्षगांठ पर किया गया।
अपने संबोधन में हरिवंश ने कहा कि 100 साल पहले जब विट्ठलभाई पटेल ने केंद्रीय विधान परिषद के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली, तब यह भारतीयों के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था। उन्होंने कहा कि उस समय पहली बार किसी भारतीय ने संवैधानिक पद पर आसीन होकर देश की उम्मीदों को नई दिशा दी। उन्होंने याद दिलाया कि इसी सदन में गोपालकृष्ण गोखले, पंडित मदन मोहन मालवीय और तेज बहादुर सप्रू जैसे नेताओं ने रोलेट एक्ट जैसे काले कानूनों का विरोध किया था।
लोकतांत्रिक परंपरा की जड़ें प्राचीन समाज में
राज्यसभा उपसभापति ने कहा कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्य बहुत प्राचीन परंपराओं में निहित हैं। उन्होंने कहा कि राजशाही के दौर में भी राजा का सिंहासन जनता की सीट माना जाता था। आदिवासी समाज में भी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं बिना किसी लिंगभेद के चलती थीं। हरिवंश ने यह भी कहा कि हमारी संस्कृति को अक्सर कमतर दिखाया गया, लेकिन लिखित प्रमाण मौजूद हैं कि लोकतंत्र हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है।
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पश्चिमी संदेहों पर भारत की जीत
हरिवंश ने आगे कहा कि पश्चिमी विचारकों को बार-बार भारत के लोकतंत्र पर संदेह रहा, लेकिन देश ने बार-बार यह साबित किया कि उसकी लोकतांत्रिक जड़ें बेहद मजबूत हैं। उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि हम आत्ममंथन करें कि क्या हम अपने पूर्वजों की दी हुई परंपराओं के साथ न्याय कर पा रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि सदनों में बढ़ती अव्यवस्था और अनावश्यक नारेबाज़ी से जनता का समय और संसदीय सत्र बेकार होते हैं।
ये भी पढ़ें- मंत्रियों की गिरफ्तारी वाले बिल पर टीएमसी-सपा के बाद AAP भी JPC से बाहर, सरकार पर लगाए ये आरोप
कांफ्रेंस और प्रदर्शनी में लोकतांत्रिक धरोहर
दिल्ली विधानसभा की ओर से आयोजित इस दो दिवसीय सम्मेलन में देशभर की विधानसभाओं और परिषदों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष शामिल हुए। इस मौके पर एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई जिसमें विट्ठलभाई पटेल और संसदीय संस्थानों के विकास से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज, फोटोग्राफ और अभिलेख प्रस्तुत किए गए। साथ ही सहयोगी संघवाद की भावना को दर्शाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
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अपने संबोधन में हरिवंश ने कहा कि 100 साल पहले जब विट्ठलभाई पटेल ने केंद्रीय विधान परिषद के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली, तब यह भारतीयों के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था। उन्होंने कहा कि उस समय पहली बार किसी भारतीय ने संवैधानिक पद पर आसीन होकर देश की उम्मीदों को नई दिशा दी। उन्होंने याद दिलाया कि इसी सदन में गोपालकृष्ण गोखले, पंडित मदन मोहन मालवीय और तेज बहादुर सप्रू जैसे नेताओं ने रोलेट एक्ट जैसे काले कानूनों का विरोध किया था।
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लोकतांत्रिक परंपरा की जड़ें प्राचीन समाज में
राज्यसभा उपसभापति ने कहा कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्य बहुत प्राचीन परंपराओं में निहित हैं। उन्होंने कहा कि राजशाही के दौर में भी राजा का सिंहासन जनता की सीट माना जाता था। आदिवासी समाज में भी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं बिना किसी लिंगभेद के चलती थीं। हरिवंश ने यह भी कहा कि हमारी संस्कृति को अक्सर कमतर दिखाया गया, लेकिन लिखित प्रमाण मौजूद हैं कि लोकतंत्र हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है।
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पश्चिमी संदेहों पर भारत की जीत
हरिवंश ने आगे कहा कि पश्चिमी विचारकों को बार-बार भारत के लोकतंत्र पर संदेह रहा, लेकिन देश ने बार-बार यह साबित किया कि उसकी लोकतांत्रिक जड़ें बेहद मजबूत हैं। उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि हम आत्ममंथन करें कि क्या हम अपने पूर्वजों की दी हुई परंपराओं के साथ न्याय कर पा रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि सदनों में बढ़ती अव्यवस्था और अनावश्यक नारेबाज़ी से जनता का समय और संसदीय सत्र बेकार होते हैं।
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कांफ्रेंस और प्रदर्शनी में लोकतांत्रिक धरोहर
दिल्ली विधानसभा की ओर से आयोजित इस दो दिवसीय सम्मेलन में देशभर की विधानसभाओं और परिषदों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष शामिल हुए। इस मौके पर एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई जिसमें विट्ठलभाई पटेल और संसदीय संस्थानों के विकास से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज, फोटोग्राफ और अभिलेख प्रस्तुत किए गए। साथ ही सहयोगी संघवाद की भावना को दर्शाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
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