राजस्थान में फिर युवा बनाम वरिष्ठ की लड़ाई, 66 साल पुरानी कहानी याद आई
राजस्थान में कांग्रेस के मौजूदा सियासी संकट ने लगभग छह दशक पुरानी ऐसी ही एक कहानी को फिर ताजा कर दिया है। उस समय मुख्यमंत्री थे जयनारायण व्यास। उन्होंने भी मुख्यमंत्री रहते हुए कई सियासी झंझावत झेले थे। व्यास को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का समर्थन हासिल था। बावजूद इसके, जब उनके खिलाफ पार्टी के भीतर ही बगावत हुई तो उन्हें राज्य की राजनीति से ओझल होना पड़ा। वह भी एक युवा विधायक की वजह से। आइए इसे और सरल भाषा में समझते हैं।
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विस्तार
साल 1954 में राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर जयनारायण व्यास आसीन थे। ठीक वैसे ही जैसे इस समय अशोक गहलोत। व्यास जोधपुर से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। उन्हें तत्कालीन युवा नेता मोहनलाल सुखाड़िया ने चुनौती दी थी। सुखाड़िया उस समय 38 वर्ष के थे और विधायक भी थे।
जयनारायण व्यास 26 अप्रैल 1951 को पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि इस पद पर वो ज्यादा समय तक नहीं रह पाए। वजह थी चुनाव में पराजय। लेकिन इस पराजय की कहानी भी ऐतिहासिक है।
1951 के अंत में देश के पहले चुनावों की प्रक्रिया शुरू हुई थी। ज्यादातर जगहों पर कांग्रेस को बढ़त हासिल थी। मगर राजस्थान में मुकाबला जोरदार था। वजह थी यहां के राजघराने, जो कांग्रेस विरोधी थे। यहां के जागीरदार और राजा जनसंघ और रामराज्य परिषद के टिकट पर या फिर निर्दलीय चुनाव में उतर आए थे। इनका नेतृत्व कर रहे थे जोधपुर के राजा हनवंत उर्फ हणूत सिंह। इन चुनावों में जयनारायण व्यास दो सीटों से लड़े थे। एक जालौर-ए और दूसरी जोधपुर शहर-बी।
राजा हनवंत उर्फ हणूत सिंह ने व्यास के लिए जबरदस्त तैयारी की थी। वो जोधपुर से खुद लड़े और जालौर से जागीरदार माधो सिंह को लड़वाया था। नतीजा यह रहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास दोनों सीटों से हार गए। हालांकि राज्य में बहुमत कांग्रेस को मिला।
कांग्रेस में उस समय व्यास खेमा हावी था। इस वजह से व्यास समर्थक हारने के बावजूद उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाने पर अड़े थे। लेकिन उस समय राजनीति में नैतिकता हुआ करती थी, इसलिए व्यास पर्दे के पीछे चले गए। पिछली सरकार में उनके डिप्टी रहे टीकाराम पालीवाल को मुख्यमंत्री बनाया गया। कुछ महीनों बाद ही किशनगढ़ से विधायक चांदमल मेहता ने इस्तीफा देते हुए जयनारायण व्यास को वहां से उपचुनाव लड़ने का न्योता दिया। व्यास इस उपचुनाव में जीत गए और फिर से राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गए।
हालांकि इस बार भी सत्तासुख उनकी किस्मत में बहुत दिन नहीं रहा। व्यास के मुख्यंत्री बनने के दो साल के अंदर 1953 में विधायक बगावती हो गए। बागी विधायक एक 38 साल साल के युवा विधायक मोहन लाल सुखाड़िया के पीछे जुट गए थे। विरोध बढ़ा तो हाईकमान ने दखल दिया। विधायक दल की मीटिंग हुई और करीबी मुकाबले में व्यास हार गए।
सवाईमानसिंह टाउन हॉल स्थित पुरानी विधानसभा में 13 नवंबर, 1954 को हुई विधायक दल की बैठक में मत विभाजन हुआ था। जिसमें सुखाड़िया के पक्ष में 59 और व्यास के समर्थन में 51 मत पड़े थे। व्यास इस्तीफा देकर तांगे में अपना सामान भरकर पोलोविक्ट्री के पास अपने मित्र की एक होटल में आ गए थे। इसके बाद जयनारायण व्यास एक बार राज्यसभा सदस्य भी बने थे। इसके अलावा दो साल तक राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। मार्च 1963 में दिल्ली में उनका निधन हो गया था।
जोधपुर से राजस्थान तक
जयनारायण व्यास 1948 में जोधपुर राज्य की लोकप्रिय सरकार के मुख्यमंत्री बने थे। पर यह सरकार एक साल ही चली थी, क्योंकि 30 मार्च 1949 को 18 रियासतों को मिलाकर राजस्थान राज्य बना दिया गया था।
व्यास की लिखी कविता
मैंने तो अपने हाथों से अपनी चिता जलाई,
देख-देख लपटें मैं हंसता तू क्यों रोता भाई।
कलह-बगावत और आलाकमान के ‘खास’ की रवानगी
तो अब आप यह तो समझ ही गए हैं कि राजस्थान में कांग्रेस पार्टी में आपसी कलह और बगावत पहली बार नहीं हुई है। जयनारायण व्यास को गुटबाजी व खेमाबंदी की वजह से केंद्रीय नेतृत्व ने मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था। 1954 के बाद से अब तक गाहे-बगाहे ऐसी घटनाएं आती ही रही हैं। पिछले 23 साल में कांग्रेस तीन बार राजस्थान की सत्ता में आई तथा दिग्गज नेताओं में कलह भी हुुआ। लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अब तक अपनी सत्ता बचाने में सफल होते रहे हैं।
40 साल में 10 साल कांग्रेस की सरकार: पांच मुख्यमंत्री
मार्च 1980 से मार्च 1990 तक राजस्थान में कांग्रेस की सरकार रही और सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री भी इसी दौरान बदले गए थे। राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद मार्च 1990 में राज्य में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस को सत्ता मिली और जगन्नाथ पहाड़िया को मुख्यमंत्री बनाया था। उनकी कार्यप्रणाली व नौकरशाही के फीडबैक के बाद आलाकमान ने जुलाई 1981 में उन्हें हटाकर शिवचरण माथुर को इस पद पर आसीन किया।
फरवरी 1985 में भरतपुर में राजा मानसिंह एनकाउंटर की घटना हुई। इससे प्रदेश के जाट समाज के आक्रोश भड़क गया जिसे शांत करने के लिए आलाकमान ने शिवचरण माथुर को हटा दिया। हीरालाल देवपुरा को कार्यवाहक मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद मार्च 1985 में हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन पार्टी का विरोधी गुट लगातार जोशी के खिलाफ सक्रिय रहा जिससे आजिज आकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जोशी को बुलाकर उनसे इस्तीफा ले लिया तथा असम का राज्यपाल बनाकर भेज दिया।
जनवरी 1988 में शिवचरण माथुर को फिर से राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन लोकसभा चुनावों में हुई हार के बाद शिवचरण माथुर से इस्तीफा ले लिया गया। दिसंबर 1989 में हरिदेव जोशी को फिर से मुख्यमंत्री बनाया।
आलाकमान का आशीर्वाद भी जब काम न आया
11 अक्टूबर 1973 को राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री बरकतुल्लाह खान की हृदयघात से मौत हो गई। जिसके बाद हरिदेव जोशी को सीएम बनाया। जाट नेता रामनिवास मिर्धा के विरोध के बाद विधायक दल के नेता के लिए मत विभाजन हुआ और मिर्धा को हरिदेव जोशी से कम वोट मिले। इस वजह से जोशी मुख्यमंत्री बने रहे और आलाकमान का साथ होने के बावजूद मिर्धा को उस समय सीएम की कुर्सी नहीं मिली।