Rahul Gandhi: मुस्लिम लीग पर बयान से राहुल का मुस्लिम-दलितों को इशारा, इस दांव से क्यों घबराए क्षेत्रीय दल
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विस्तार
कांग्रेस नेता राहुल गांधी इन दिनों विदेश दौरे पर हैं। इस दौरान उनके एक के बाद एक बयान जारी हो रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने गुरुवार को वॉशिंगटन डीसी में पत्रकारों से बात करते हुए मुस्लिम लीग को लेकर बयान दिया है। राहुल ने दावा किया कि 'मुस्लिम लीग एक 'पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष पार्टी' है। कांग्रेस नेता के इस बयान को आगामी राज्यों के विधानसभा चुनाव और मिशन 2024 के लिए मुस्लिम-दलित समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। क्योंकि पार्टी ने इसी परंपरागत वोट बैंक को साधने के बाद कर्नाटक में जबरदस्त प्रदर्शन किया है। इसलिए कांग्रेस आगामी चुनावी राज्यों में इसी फॉर्मूले के साथ आगे बढ़ती हुई नजर आएगी।
ताकि वर्षों से पहले छिटका यह वोट बैंक फिर से उनके पाले में आ जाए। लेकिन उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, केरल, तेलंगाना, जम्मू कश्मीर, बिहार, महाराष्ट्र में क्षेत्रीय दल राह में बड़ा रोड़ा बने हुए हैं। क्योंकि यह वोट कांग्रेस से छिटक इन दलों की तरफ शिफ्ट हो गया है। ऐसे में पार्टी फिर से इन्हें साधने की जुगत में लगी हुई है। हालांकि कर्नाटक में मुसलमानों का झुकाव कांग्रेस की तरफ देखते हुए क्षेत्रीय पार्टियों की चिंता बढ़ गई है। यही वजह है कि नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव समेत तमाम क्षेत्रीय दलों के प्रमुख नेता खुलकर तुष्टिकरण की राजनीति करने लगे हैं।
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भारत जोड़ो यात्रा से ही कर दी मुस्लिमों को जोड़ने की शुरुआत
हाल ही में कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी के नेतृत्व में भारत जोड़ो यात्रा शुरू की थी। दक्षिण भारत से शुरू हुई इस यात्रा ने जम्मू कश्मीर तक काफी सुर्खियां बटोरी। पूरी यात्रा के दौरान राहुल का बयान 'नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने आया हूं' चर्चा में रहा। इस नारे से माना गया कि पार्टी इसी के जरिए पुराने अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधने की रणनीति बना रही है। जो राज्यों में क्षेत्रीय दलों के दबदबे के कारण बंटा हुआ है। कर्नाटक में क्षेत्रीय दल जेडीएस की तुलना में कांग्रेस को मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में अच्छा समर्थन मिला। अब कांग्रेस राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी इसी फॉर्मूले पर आगे बढ़ती हुई नजर आएगी।
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की यह यात्रा भारत जोड़ो नहीं, बल्कि अपने पुराने वोट बैंक जोड़ने की यात्रा थी। इसमें दलित, आदिवासी और मुस्लिम सभी शामिल हैं। राहुल की यह यात्रा उन्हीं जगह से गुजरी यहां ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के अलावा दलित और आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं। इसलिए निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि राहुल की यह यात्रा अल्पसंख्यकों को जोड़ने की यात्रा थी। क्योंकि कांग्रेस को पता है कि 1990 के पहले जो मुस्लिम समुदाय एकमुश्त कांग्रेस को वोट देता था। वह धीरे-धीरे क्षेत्रीय पार्टियों में शिफ्ट हो चुका है। कांग्रेस की यह यात्रा उन्हीं मुसलमानों को फिर से साथ जोड़ने के लिए थी। जिसमें कांग्रेस काफी हद तक सफल भी रही है।
अमर उजाला से बातचीत में कांग्रेस नेता राशिद अल्वी कहते हैं कि भाजपा को पहले अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए। आज विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के नेता सुबह से लेकर शाम तक आग उगलते हुए दिखाई देते हैं। आरएसएस पूरे देश में नफरत फैलाने का काम करती है। राहुल गांधी की बात बिल्कुल सही है कि भाजपा की सरकार मुस्लिम समुदाय को डराने की राजनीति करती है। यूपी के सीएम योगी बोलते हैं कि चुनाव के बाद गर्मी निकाल देंगे वो बयान किसके लिए था। जिस तरह से अतीक अहमद पुलिस की कस्टडी में मारा गया इसका क्या मतलब निकलता है। राहुल गांधी ने ठीक कहा कि भाजपा की पॉलिसी है कि मुस्लिम को डराओ और समाज का ध्रुवीकरण करो।
तीन राज्यों में क्या काम करेगा राहुल का ये फार्मूला
अमर उजाला से बातचीत में कांग्रेस नेता कहते हैं कि कांग्रेस केवल मुस्लिम वोट बैंक के दम पर 2024 में वापसी नहीं कर सकती है। क्योंकि आज मुस्लिम वोट बैंक कई क्षेत्रीय दलों में बटा हुआ है। मुस्लिम समुदाय यूपी में समाजवादी पार्टी, पश्चिम बंगाल में टीएमसी, जम्मू कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी, बिहार में जेडीयू-आरजेडी, महाराष्ट्र में एनसीपी और दिल्ली में आप की तरफ झुका हुआ नजर आता हैं। यही कारण है कि राहुल गांधी ने अमेरिका में मुसलमानों के साथ-साथ दलितों और सिखों का मुद्दा भी उठाना शुरू कर दिया है। दलितों के साथ साथ आदिवासी और सिख भी कांग्रेस के कोर वोट बैंक रहे हैं। लेकिन यह अब भाजपा की तरफ शिफ्ट कर गए है। कांग्रेस ने मल्लिकार्जुन खरगे को अध्यक्ष बनाकर दलितों को साधने की कोशिश की है। इसका फायदा पार्टी को दक्षिण के साथ साथ उत्तर भारत में भी मिलेगा। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। यदि इन तीनों राज्यों में राहुल गांधी को मुस्लिमों के साथ साथ आदिवासी और दलितों को साधने में सफल रहते हैं, तो पार्टी को बड़ी सफलता मिलेगी।
मुस्लिमों के सहारे आसान हो सकती है 2024 की राह
राजनीतिक और चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि केंद्र सरकार दावा करती है कि हम बिना किसी भेदभाव के देश की जनता के साथ मुसलमानों को भी योजना का लाभ देते रहे हैं। लेकिन देश के 98 फीसदी मुसलमान आज भी भारतीय जनता पार्टी के विरोध में मतदान करते हैं। इसी मुसलमान वोट बैंक को हासिल करने के लिए भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों के बीच होड़ मची है। 2024 के लोकसभा चुनाव तक मुसलमान पूरी तरह से कांग्रेस के साथ जुड़ चुके होंगे। ऐसे में अगर कांग्रेस पूरे देश में अपने दम पर लोकसभा चुनाव लड़ती है, तो निश्चित तौर पर उसे पिछले चुनाव से ज्यादा फायदा मिलने के आसार है। लेकिन अगर पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर चुनाव के मैदान में उतरती है, तो उसे नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। क्योंकि सभी पार्टियां दलित, मुस्लिम और आदिवासी के साथ साथ महिलाओं को साधने में जुटे हुए हैं।
भाजपा का प्लान, राहुल को उनके हर बयान पर घेरा जाए
एकाएक बदलती परिस्थितियों से भाजपा भी वाकिफ हो रही है। इसलिए पार्टी भी राहुल गांधी के हर बयान पर आक्रामक तरीके से जवाब दे रही है। यही कारण है कि राहुल गांधी को घेरने के लिए पार्टी ने अपने नेताओं की फौज उतार दी है। पार्टी के प्रवक्ता हो या फिर केंद्रीय मंत्री हर कोई राहुल को घेरते हुए दिखाई दे रहा है।