'राफेल' को यूं ही नहीं उड़ने देगी कांग्रेस, मोदी सरकार पर दागे 11 'सवाल'
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कांग्रेस पार्टी के लिए 'राफेल' अब केवल एक लड़ाकू हवाई जहाज नहीं रहा, बल्कि 2019 के लिए पार्टी इसे अपना प्रमुख सारथी मानकर आगे बढ़ रही है। कांग्रेस 'राफेल' को यूं ही नहीं उड़ने देगी। सोमवार को एक बार फिर दोनों पार्टियां राफेल को लेकर आमने-सामने आ गईं। भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को केंद्र में रखकर 70 जगहों पर प्रेसवार्ता कर दी। मोदी सरकार के मंत्रियों और पार्टी पदाधिकारियों ने कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि वह राफेल पर झूठ बोल रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाकर भाजपा पर न केवल हमला बोला बल्कि पार्टी ने मोदी सरकार की प्रेसवार्ताओं को 'झूठ की फैक्ट्री' करार दे दिया और उस पर 11 सवाल भी दाग दिए।
कांग्रेस पार्टी के नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, हम शुरु से ही कह रहे हैं कि मोदी सरकार राफेल के मामले में फंस चुकी है। अब वह राफेल को लेकर झूठ पर झूठ बोले जा रही है। मोदी सरकार ने खुद को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष गलत तथ्य पेश कर दिए। पीएसी की कहीं कोई बैठक ही नहीं हुई, लेकिन कोर्ट के फैसले में लिखा है कि मामला पीएसी की टेबल से होकर गुजरा है। कोर्ट को ये सब किसने बताया। सामान्य सी बात है कि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ये सब जवाब दिए हैं। कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास किया गया।
सुरजेवाला ने कहा, क्या ये अपने आप में एक जुर्म नहीं है। इससे पहले कांग्रेस पार्टी के नेता कपिल सिब्बल ने भी कहा था कि मोदी सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया हलफनामा झूठ का पुलिंदा था और यह एक संगीन मामला बनता है। रणदीप सुरजेवाला ने मोदी सरकार से इन सवालों का जवाब मांगा है।
पहला सवाल:
राफेल पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का आधार सीएजी रिपोर्ट है (पैरा-25), लेकिन सीएजी ने तो कोई रिपोर्ट दी ही नहीं। खास बात है कि यह सीएजी रिपोर्ट न तो संसद में पेश हुई और न ही पीएसी के सामने प्रस्तुत की गई। फिर सुप्रीम कोर्ट के साथ इतना बड़ा धोखा क्यों?
दूसरा सवाल:
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का आधार रिलायंस कंपनी का साल 2012 से ही दसॉल्ट एविएशन से चला आ रहा समझौता है (पैरा-32)। खास बात रिलायंस डिफेंस लिमिटेड का गठन तो 28 मार्च 2015 को हुआ था फिर सुप्रीम कोर्ट को ये गलत तथ्य देकर क्यों बरगलाया गया?
तीसरा सवाल:
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का आधार फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद का खुलासा कि मोदी सरकार ने राफेल का ठेका रिलायंस को दिलाया, जबकि इसे दोनों पक्षों ने नकार दिया। ओलांद ने 21 सितंबर को अपना बयान फिर दोहराया। 27 सितंबर को मैक्रान ने कहा- वो ओलांद की बात खारिज नहीं कर सकते। फिर सुप्रीम कोर्ट से छल क्यों किया गया?
चौथा सवाल:
सरकारी कंपनी का राफेल ठेके से कोई सरोकार नहीं (पैरा-32), लेकिन एचएएल व दसॉल्ट का समझौता 13 मार्च 2014 को हो चुका था। 25 मार्च को दसॉल्ट के सीईओ ने बेंगलुरु में इसकी पुष्टि भी कर दी। 8 अप्रैल 2015 को विदेश सचिव ने एचएएल-दसॉल्ट के समझौते को माना फिर कोर्ट से धोखा क्यों?
पांचवां सवाल:
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का पांचवा आधार, वादी ने कहा कि फ्रांस द्वारा सोवरेन गारंटी न देकर मात्र एक लेटर ऑफ कम्फर्ट दिया गया। (पैरा-20) सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कोई फ़ैसला नहीं दिया। इसके बाद 12 सितंबर 2015 और 23 अगस्त 2016 को कानून मंत्रालय द्वारा किए गए विरोध के प्रति भी सुप्रीम कोर्ट को नहीं दिखाई गई। कोर्ट से यह छिपाव क्यों?
छठा सवाल:
रक्षा खरीद समिति (डीएसी) की अनुमति के साथ 10 अप्रैल 2015 को 36 राफ़ेल खरीद की घोषणा हुई (पैरा-3), लेकिन डीएसी की बैठक तो 13 अप्रैल 2015 को हुई जहां 36 राफ़ेल खरीदने का निर्णय हुआ। फिर मोदी ने एक महीना पहले यह फैसला कैसे ले लिया। यहां पर भी सुप्रीम कोर्ट को गुमराह कर दिया गया।
सातवां सवाल:
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सातवां आधार 36 राफेल खरीद सौदा 23/9/2016 को हुआ, लेकिन ओलांद के 21/9/2018 के खुलासे से पहले किसी ने विरोध नहीं किया (पैरा-23)। कांग्रेस ने इस घोटाले का भंडाफोड़ 23/5/2015 को ही कर दिया था। फिर सरकार ने सर्वोच्च अदालत को सच क्यों नहीं बताया?
आठवां सवाल:
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का आठवां आधार-वायुसेना प्रमुख ने राफेल की कीमत बताने पर ऐतराज जताया (पैरा-25)। वायुसेना प्रमुख न तो कोर्ट आए और न ही कोई शपथ पत्र दाख़िल किया। वायुसेना के अधिकारियों से कीमत बारे कोई सवाल अदालत में नहीं पूछा गया। फिर सर्वोच्च अदालत को क्यों भटकाया गया?
नौंवा सवाल:
126 राफेल की बजाय मात्र 36 राफेल खरीदने का निर्णय मोदी सरकार का नीतिगत फैसला है (पैरा-22), लेकिन वायुसेना की 126 जहाजों की जरुरत खारिज कर मनमर्जी से 36 जहाज खरीदना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट के समक्ष औचित्य क्यों नहीं बताया गया?
दसवां सवाल:
रक्षा खरीद प्रणाली DPP-2013 के मुताबिक, बगैर सरकारी हस्तक्षेप के डसॉल्ट ऑफसेट पार्टनर चुन सकती थी (पैरा-33), मगर DPP-2013 में यह शर्त 5/8/2015 को ही जोड़ी गई है, जबकि राफेल खरीद की घोषणा 10/4/2015 को हुई थी। सुप्रीम कोर्ट से यह विश्वासघात क्यों?
ग्यारहवां सवाल:
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का ग्यारहवां आधार-मोदी सरकार ने कहा कि 36 राफेल की कीमत फायदेमंद सौदा है (Para-26), लेकिन कांग्रेस जो एक राफेल 526 करोड़ में खरीद रही थी, वो मोदी ने 1670 करोड़ में क्यों खरीदा। इससे देश को 41,205 करोड़ का चूना लगा है, यह सच कोर्ट को क्यों नहीं बताया गया?