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Pahalgam Attack: 'मां को बचाने के लिए वही किया, जो पिता करते', पहलगाम आतंकी हमले में बचे शख्स ने सुनाई आपबीती
Sat, 26 Apr 2025 10:34 AM IST
अभिषेक दीक्षित
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Sat, 26 Apr 2025 10:34 AM IST
सार
जम्मू-कश्मीर की छुट्टियां हर्षल लेले और उनके परिवार के लिए दुखद साबित हुईं। हर्षल के पिता संजय लेले (52), चाचा हेमंत जोशी (45) और अतुल मोने (43) 22 अप्रैल के हमले में मारे गए।
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Pahalgam Attack
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पहलगाम में आतंकवादियों ने पिता को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। पिता की हत्या करने के बाद हर्षल लेले के पास एक ही विकल्प था। उन्हें एक ही काम करना था और वो था अपनी मां को बचाना और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना। ठीक वैसा ही जैसा उसके पिता करते। जम्मू-कश्मीर में हुए जघन्य हमले के पांच दिन बाद पड़ोसी ठाणे जिले के डोंबिवली के 20 वर्षीय शख्स के दिल में उस पल की भयावह याद आज भी ताजा है, जिसके कुछ ही मिनट बाद ही उनके जीवन में सबसे बुरा मोड़ आ गया। हमले में 26 लोग मारे गए थे, जिनमें से अधिकांश पर्यटक थे।
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पिता और चाचा हमले में मारे गए
जम्मू-कश्मीर की छुट्टियां लेले और उनके परिवार के लिए दुखद साबित हुईं। हर्षल के पिता संजय लेले (52), चाचा हेमंत जोशी (45) और अतुल मोने (43) 22 अप्रैल के हमले में मारे गए।
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'मां को बचाना मेरी जिम्मेदारी थी'
हर्षल ने याद करते हुए कहा, 'हमने अभी दोपहर का खाना खत्म किया था, तभी हमने गोलियों की आवाज सुनी। हमले के दौरान हर्षल को गोली लगी और एक गोली उसके पास से निकलकर उसके पिता को जा लगी। मेरी मां को बचाना मेरी जिम्मेदारी थी। मैंने खुद को अपने पिता की जगह पर रखकर सोचा। उनका पहला विचार मां को बचाना होता, इसलिए मैंने वही किया।'
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बंदूकधारियों ने पुरुषों को उनके परिवारों के सामने गोली मारी
उन्होंने कहा कि बंदूकधारियों ने पुरुषों को उनके परिवारों के सामने गोली मारी। महिलाएं और बच्चे असहाय हो गए। मेरी मां को हल्का लकवा है, इसलिए उन्हें चलने में दिक्कत हो रही थी। मेरे चचेरे भाई ध्रुव जोशी और मैंने उन्हें उबड़-खाबड़ इलाके में ले जाने का फैसला किया। वह कई जगहों पर फिसल गईं और चोटिल हो गईं, लेकिन हमारे पास कोई विकल्प नहीं था।'
सुरक्षित जगह पर पहुंचने में उन्हें तीन घंटे से ज्यादा का समय लगा
उन्होंने कहा कि आखिरकार उन्हें घुड़सवार मिल गया, जो परिवारों को घास के मैदान में लेकर आया था और वह अपनी मां को अपनी पीठ पर लादकर उन्हें बाहर ले आया। उन्होंने आगे कहा कि सुरक्षित जगह पर पहुंचने में उन्हें तीन घंटे से ज्यादा का समय लगा।
'पिता और चाचा को जिंदा बाहर निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ'
उन्होंने कहा, 'जब हम बेस पर पहुंचे और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों को घास के मैदान की ओर जाते देखा, तो हमें उम्मीद थी कि मेरे पिता और चाचा को जिंदा बाहर निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।'
'किसी भी स्थिति में शांत रहो और विनम्रता से बोलो'
अपने पिता संजय को खोने से हर्षल अब अकेले हो गए। उन्होंने कहा, 'वह हमेशा मुझसे कहते थे कि कुछ भी करने से पहले 10 बार सोचो। वह अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करते थे, चाहे कुछ भी हो। जब हमला मेरी आंखों के सामने हो रहा था, तो मैं केवल यही सोचता था कि मेरे पिता उस स्थिति में क्या करते और मैंने वैसा ही किया। वह मुझसे कहते थे कि किसी भी स्थिति में शांत रहो और विनम्रता से बोलो।'
अकाउंटेंट पिता क्रिकेट के शौकीन थे और रविवार को मैच खेलते थे
हर्षल ने कहा कि उनके अकाउंटेंट पिता क्रिकेट के शौकीन थे और रविवार को मैच खेलते थे। वह मुझे खेल से उदाहरण देकर समस्याओं और स्थितियों को समझाते थे। यही हमारा बंधन था। संजय लेले के बहनोई राजेश कदम उन्हें एक पूर्ण पारिवारिक व्यक्ति के रूप में याद करते हैं। वह अपने प्रियजनों के प्रति समर्पित थे। कदम ने कहा, 'उन्होंने 14 साल बाद परिवार के साथ इस छुट्टी की योजना बनाई थी। उन्होंने अपनी पत्नी की बीमारी को अकेले ही संभाला।'