कठपुतलियों का खेल भी हो सकता है लाखों की कमाई का जरिया, बड़ी फिल्मों में भी मिल रहा मौका
सिनेमा और मोबाइल के स्क्रीन की चमक ने न जाने कितनी लोकविधाओं को लील लिया है। ऐसे में कठपुतली का खेल अब उन गांव वालों की आंखों से भी ओझल हो गया है जो कभी मेले में उनके बच्चों के मनोरंजन का विशेष साधन हुआ करता था। लेकिन ऐसे दौर में भी अगर कोई आपसे कहे कि कठपुतली के खेल से भी लाखों रुपये की कमाई की जा सकती है तो शायद आपको इसका विश्वास नहीं आएगा। लेकिन यह बात पूरी तरह सच है और आज के दौर में अनेक लोग ऐसे हैं जो इस विधा से अच्छी कमाई कर रहे हैं।
दरअसल, बड़े बजट की बॉलीवुड फिल्मों, ऐड फिल्मों और अनेक सरकारी विभागों और स्वयंसेवी संगठनों के प्रचार से मिल रहे काम ने इस कला को एक नया जीवनदान दिया है और इसकी वजह से पारंपरिक कला कठपुतली या पपेटरी एक बार फिर मजबूत हो रही है। पपेटरी कलाकार कपिल देव ने अमर उजाला को बताया कि सीरियल गली-गली सिम-सिम में उन्हें अपनी कला दिखाने का शानदार अवसर मिला था। इसके अलावा फिल्म द्रोण, वक्रतुंड महाकाय में भी उन्होंने काम किया है।
सबसे ज्यादा काम ऐड फिल्मों के माध्यम से मिलता है। कपिल देव ने मैगी, अल्पेन्लीबी और एशियन पेंट जैसी अनेक नामी कंपनियों के ऐड फिल्मों में अपनी कठपुतली कला का हुनर दिखाया है। उन्होंने कॉमवेल्थ गेम्स में कई बड़े स्कल्पचर बनाए थे जो काफी मशहूर हुए थे। बुधवार को भी वे संगीत नाटक अकादमी में बच्चों के जरिए पपेटरी कला का एक विशेष प्रदर्शन करने जा रहे हैं।
कठपुतली और पपेटरी
कठपुतली कला विशेषकर काठ की बनी आकृतियों से प्रदर्शित की जाती थी। लेकिन देश के अलग-अलग हिस्से में इसके भी अलग-अलग रुप विकसित हुए। पपेटरी भी कठपुतली कला का ही एक अलग रूप है। जगह के हिसाब से इसका नाम भी अलग-अलग पड़ा।
आंध्र प्रदेश में इसे तोलू बोम्मा लाटा (शैडो पपेट) तो ओडीशा में रावण छाया बोलते हैं। पश्चिम बंगाल में बेनिर पुतुल तो केरल में पावाकथकली कहा जाता है। प्रदर्शन और सामग्री के हिसाब से इसे मुख्य रूप से रॉड पपेटरी, शैडो पपेटरी, ग्लव्ज पपेटरी या स्ट्रिंग पपेटरी कहा जाता है।
प्राचीन भारत से लेकर आधुनिक समय में भी
विद्वानों का मानना है कि हड़प्पा काल की खुदाई में मिली कुछ आकृतियां उस काल में भी कठपुतली या पपेटरी कला के होने का अकाट्य प्रमाण देती हैं। मध्यकाल में राजस्थानी रजवाड़े अपने मेहमानों के सामने अपनी वीरता की गाथाएं, परंपरागत लोक कथाएं, इतिहास और धर्म की जानकारी देने के लिए कठपुतली कला का सहारा लिया करते थे।
आज के समय में विभिन्न संगठन अपना संदेश जनता तक पहुंचाने के लिए इसका उपयोग करते हैं। यह आज भी अपनी बात कहने का एक सशक्त माध्यम है। नई तकनीक आने की वजह से इसकी चमक कुछ फीकी जरूर पड़ी है लेकिन आधुनिक तकनीक का उपयोग करके इसे नई ऊंचाई तक ले जाया जा सकता है।
भारत में नहीं कोई ट्रेनिंग सेंटर
हिंदुस्तान के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वह अपनी प्रतिभा का सम्मान नहीं करना जानता। वह अपनी कलाओं की कीमत पश्चिमी ठप्पे के बिना समझ नहीं पाता। कठपुतली कला के बारे में भी यह बात लागू होती है।
जिस कठपुतली कला को हमारे बुजुर्गों ने पीढ़ी दर पीढ़ी देखा है, उसका प्रशिक्षण देने के लिए भारत में कोई स्कूल नहीं है। कपिल देव बताते हैं कि पपेटरी की ट्रेनिंग लेने के लिए 1991 में उन्हें दादी पदम जी के पास जाना पड़ा जो भारत में पपेटरी के पितामह के रूप में जाने जाते हैं।
लेकिन परंपरागत पपेटरी को आधुनिक तरीके से कैसे जोड़ा जाए, यह कला सीखने के लिए उन्हें 2002 में स्वीडेन के डीआई ड्रैमटिस्का इंस्टीट्यूट, स्टाकहोम जाना पड़ा। वहां सीखने के बाद उनके काम में निखार आया और उन्हें तेजी से काम मिलने लगा।
मुंबई के रचना कालेज और दिल्ली के जामिया मिल्लिया में एक माध्यम के रूप में इसका परिचय कराया जाता है, लेकिन वहां पपेटरी सिखाने के लिए कोई प्रोफेशनल ढांचा नहीं है।
बनाने का काम और कीमत
कपिल देव के मुताबिक, पपेट्स को बनाने के लिए एक घंटे से लेकर हफ्तों का समय भी लग सकता है। यह पपेट की आकृति से लेकर उसको बनाने में लगने वाली सामग्री (लकड़ी, क्ले मिट्टी या थर्माकौल और सजावट की सामग्री) के ऊपर निर्भर करता है।
बाजार में तैयार पपेट्स की कीमत हजार-बारह सौ रुपये भी हो सकती है। लेकिन जब किसी विशेष जरूरत के मुताबिक किसी कलाकार से विशिष्ट कलाकृति बनवानी होती है तब वह उसकी कीमत लगने वाले समय के मुताबिक लेता है। यह कीमत सामान्य तौर पर बीस से पचीस हजार रुपये से शुरू होकर लाखों रुपये भी हो सकती है।
कितनी है कमाई, क्या है चैलेंज
कपिल देव कहते हैं कि किसी भी कला की कोई कीमत नहीं होती। यह कलाकार के ऊपर होता है कि वह अपनी कला को किस स्तर तक पहुंचा देता है और उसकी क्या कीमत वसूल करता है। गाना हो या अभिनय, कलाकारों को मासिक आय के बजाय उसको मिलने वाले काम की आय पर निर्भर रहना पड़ता है।
अगर कलाकार नामी हो जाता है तो उसके पास काम चलकर आता है और वह कमाई भी खूब करता है, लेकिन शुरुआती दौर में संघर्ष करना पड़ता है। यही बात पपेटरी या कठपुतली कला में भी होती है। कपिल देव बताते हैं कि एक फिल्म में कुछ देर का सीन देने के लिए लगभग एक हफ्ते का समय लगता है, लेकिन इसके बदले में चार से पांच लाख रुपये तक मिल जाते हैं।