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पंजाब: क्या होगा अमरिंदर सिंह का राजनीतिक भविष्य, राष्ट्रवादी कैप्टन का किस ‘विकल्प’ की ओर है इशारा
Sat, 18 Sep 2021 07:08 PM IST
प्रतिभा ज्योति
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Sat, 18 Sep 2021 07:08 PM IST
सार
मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद अब क्या करेंगे अमरिंदर सिंह? क्या वे भाजपा में अपने राजनीतिक भविष्य तलाशेंगे या अपनी अलग जमीन तैयार करेंगे? राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अमरिंदर सिंह अब नए तेवर के साथ पंजाब की राजनीति में उतरेंगे और कांग्रेस से दो-दो हाथ करेंगे।
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पंजाब के कार्यवाहक सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद अब यह सवाल खड़ा हो रहा है कि राज्य की राजनीति में उनका भविष्य क्या है? वैसे इस्तीफे के बाद अमरिंदर सिंह ने जो बयान दिया उसमें ही कैप्टन ने अपने भविष्य को लेकर संकेत दे दिए हैं। कैप्टन ने कहा कि राजनीति में विकल्प हमेशा होते हैं। साथियों से बात करके फैसला करूंगा। आखिर अमरिंदर सिंह किस विकल्प की बात कर रहे हैं। कहीं उनका इशारा कांग्रेस से अलग राजनीतिक भविष्य तलाशने की तो नहीं है।
कयास इस बात के लगाए जा रहे हैं कि वे अलग पार्टी बनाकर आगामी विधानसभा चुनाव में उतर सकते हैं और वे भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से पंजाब में अपनी सरकार बना सकते हैं। भाजपा नेता सैयद जफर इस्लाम ने पंजाब के आज के घटनाक्रम पर कहा,“ कैप्टन अमरिन्दर सिंह राष्ट्रवादी नेता हैं और आगे-आगे देखिये होता है क्या? मौका देखकर अमरिंदर सिंह ने अभी अपने राष्ट्रवादी विचारों को आगे रख दिया है और उन्होंने सिद्धू को मुख्यमंत्री पद दिए जाने की बात पर इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना दिया है। इस्तीफे के बाद कैप्टन ने सिद्धू पर निशाना साधते हुए कहा सिद्धू के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा से संबंध हैं और यदि पार्टी उन्हें चेहरा बनाती है तो देश हित में उनका विरोध करूंगा।
भाजपा में जाने के कयास क्यों
अमरिंदर के इस्तीफे के बाद भाजपा की चर्चा इसलिए होने लगी है क्योंकि इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कैप्टन के लिए भाजपा के दरवाजे भी खुले हुए हैं। पंजाब के कार्यवाहक मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह के सिद्धू की कलह पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा दोनों नजर बनाए हुए थी और उन्हें अपने पाले में करने की कोशिशें चल रही थीं। सूत्रों के मुताबिक भाजपा कैप्टन को अपने खेमे में करने को पूरी तरह तैयार थी, लेकिन यह फैसला कैप्टन पर छोड़ दिया गया था। इस मसले पर काफी समय से विचार चल रहा था और कई नेता कैप्टन के साथ लगातार संपर्क में अभी भी है।
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सूत्रों ने बताया कि भाजपा ने यह पहले ही भांप लिया था कि कांग्रेस नेतृत्व ने दोनों नेताओं के बीच सुलह कराने की कोशिश तो की लेकिन यह सुलह लंबी नहीं चलने वाली। क्योंकि कैप्टन इस सुलह को अपने लिए सम्मानजनक समझौता नहीं मान रहे थे। इसलिए पार्टी की कोशिश रही कि यदि अमरिंदर सिंह को उनके कद और प्रतिष्ठा के मुताबिक सम्मान देने की बात की जाए तो वो कांग्रेस छोड़ सकते हैं।
कैप्टन भाजपा की राष्ट्रवादी छवि की मापदंड पर फिट बैठते हैं और उन्हें अपने साथ लेने से पार्टी की ताकत बढ़ सकती है। हालांकि अमरिंदर ने कांग्रेस आलाकमान को समय देते हुए इस पर फैसला लेने में जल्दीबाजी नहीं की। सूत्रों का कहना है कि अमरिंदर भाजपा में जाने के बजाए अलग पार्टी बनाने का रास्ता खोल सकते हैं जिसके बाद वे सत्ता में आने के लिए भाजपा का सहयोग ले सकते हैं।
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कयास इस बात के लगाए जा रहे हैं कि वे अलग पार्टी बनाकर आगामी विधानसभा चुनाव में उतर सकते हैं और वे भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से पंजाब में अपनी सरकार बना सकते हैं। भाजपा नेता सैयद जफर इस्लाम ने पंजाब के आज के घटनाक्रम पर कहा,“ कैप्टन अमरिन्दर सिंह राष्ट्रवादी नेता हैं और आगे-आगे देखिये होता है क्या? मौका देखकर अमरिंदर सिंह ने अभी अपने राष्ट्रवादी विचारों को आगे रख दिया है और उन्होंने सिद्धू को मुख्यमंत्री पद दिए जाने की बात पर इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना दिया है। इस्तीफे के बाद कैप्टन ने सिद्धू पर निशाना साधते हुए कहा सिद्धू के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा से संबंध हैं और यदि पार्टी उन्हें चेहरा बनाती है तो देश हित में उनका विरोध करूंगा।
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भाजपा में जाने के कयास क्यों
अमरिंदर के इस्तीफे के बाद भाजपा की चर्चा इसलिए होने लगी है क्योंकि इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कैप्टन के लिए भाजपा के दरवाजे भी खुले हुए हैं। पंजाब के कार्यवाहक मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह के सिद्धू की कलह पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा दोनों नजर बनाए हुए थी और उन्हें अपने पाले में करने की कोशिशें चल रही थीं। सूत्रों के मुताबिक भाजपा कैप्टन को अपने खेमे में करने को पूरी तरह तैयार थी, लेकिन यह फैसला कैप्टन पर छोड़ दिया गया था। इस मसले पर काफी समय से विचार चल रहा था और कई नेता कैप्टन के साथ लगातार संपर्क में अभी भी है।
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सूत्रों ने बताया कि भाजपा ने यह पहले ही भांप लिया था कि कांग्रेस नेतृत्व ने दोनों नेताओं के बीच सुलह कराने की कोशिश तो की लेकिन यह सुलह लंबी नहीं चलने वाली। क्योंकि कैप्टन इस सुलह को अपने लिए सम्मानजनक समझौता नहीं मान रहे थे। इसलिए पार्टी की कोशिश रही कि यदि अमरिंदर सिंह को उनके कद और प्रतिष्ठा के मुताबिक सम्मान देने की बात की जाए तो वो कांग्रेस छोड़ सकते हैं।
कैप्टन भाजपा की राष्ट्रवादी छवि की मापदंड पर फिट बैठते हैं और उन्हें अपने साथ लेने से पार्टी की ताकत बढ़ सकती है। हालांकि अमरिंदर ने कांग्रेस आलाकमान को समय देते हुए इस पर फैसला लेने में जल्दीबाजी नहीं की। सूत्रों का कहना है कि अमरिंदर भाजपा में जाने के बजाए अलग पार्टी बनाने का रास्ता खोल सकते हैं जिसके बाद वे सत्ता में आने के लिए भाजपा का सहयोग ले सकते हैं।
कैप्टन अमरिंदर सिंह-अरविंद केजरीवाल
- फोटो : अमर उजाला
कैप्टन की राष्ट्रवादी पृष्ठभूमि
सूत्रों के मुताबिक किसान आंदोलन के मुद्दे पर अकाली दल के भाजपा के अलग हो जाने और कांग्रेस में सिद्धू बनाम कैप्टन की राजनीतिक जंग के बाद से ही भाजपा की नजर अमरिंदर सिंह पर है। भाजपा कैप्टन अमरिंदर सिंह के फौजी इतिहास और उनके पटियाला राजघराने से रिश्ते को अहम मानती है। भाजपा और कैप्टन अमरिंदर सिंह दोनों में एक समानता यह भी रही है कि दोनों राष्ट्रवाद और देशभक्ति की बात करते हैं।
इसलिए भी अमरिंदर सिंह का भाजपा में वैसा ही सम्मान है जैसा मध्यप्रदेश के ग्वालियर में सिंधिया घराने का। सिंधिया घराने में राजमाता विजयाराजे सिंधिया से लेकर माधव राव और ज्योतिरआदित्य सिंधिया तक कभी ना कभी कांग्रेस के साथ जुड़े रहे फिर भी उन्हें भाजपा में साथ लाने की कोशिशें होती रही। अब ज्योतिरादित्य सिंधिया तो भाजपा में शामिल होकर मंत्री भी बन गए हैं। अमरिंदर को भाजपा अपने खेमे में लाने की कोशिश इसलिए भी कर रही थी क्योंकि पंजाब में उसका कोई राजनीतिक अस्तित्व फिलहाल नहीं है। भाजपा ने इस राज्य में अकाली दल पर निर्भर रही है और वह अमरिंदर सिंह जैसे किसी मजबूत और जमीनी आधार वाले नेता की तलाश में है।
अमरिंदर के जुड़ जाने से भाजपा को पैर जमाने में मदद मिलेगी
साल 2017 के विधानसभा चुनावों और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में भी अकाली दल के खराब प्रदर्शन के बावजूद भाजपा ने उससे रिश्ता नहीं तोड़ा। था लेकिन जब कृषि कानूनों के विरोध में अकाली नेता और सुखविंदर सिंह की पत्नी हरसिमरत कौर ने मोदी सरकार से इस्तीफ़ा दे दिया और समर्थन वापस ले लिया तो फिर दोनों के रास्ते अलग हो गए। भाजपा को लगता है कि अमरिंदर के जुड़ जाने से पार्टी को पंजाब में अपने पांव मजबूत करने मे मदद तो मिलेगी ही,इससे कांग्रेस भी को वहां कमजोर करना आसान होगा। क्योंकि अमरिंदर सिंह पंजाब में कांग्रेस का मुख्य चेहरा रहे हैं और पार्टी ने पिछला विधानसभा चुनाव उन्हीं के चेहरे पर लड़ा था।
सूत्रों के मुताबिक किसान आंदोलन के मुद्दे पर अकाली दल के भाजपा के अलग हो जाने और कांग्रेस में सिद्धू बनाम कैप्टन की राजनीतिक जंग के बाद से ही भाजपा की नजर अमरिंदर सिंह पर है। भाजपा कैप्टन अमरिंदर सिंह के फौजी इतिहास और उनके पटियाला राजघराने से रिश्ते को अहम मानती है। भाजपा और कैप्टन अमरिंदर सिंह दोनों में एक समानता यह भी रही है कि दोनों राष्ट्रवाद और देशभक्ति की बात करते हैं।
इसलिए भी अमरिंदर सिंह का भाजपा में वैसा ही सम्मान है जैसा मध्यप्रदेश के ग्वालियर में सिंधिया घराने का। सिंधिया घराने में राजमाता विजयाराजे सिंधिया से लेकर माधव राव और ज्योतिरआदित्य सिंधिया तक कभी ना कभी कांग्रेस के साथ जुड़े रहे फिर भी उन्हें भाजपा में साथ लाने की कोशिशें होती रही। अब ज्योतिरादित्य सिंधिया तो भाजपा में शामिल होकर मंत्री भी बन गए हैं। अमरिंदर को भाजपा अपने खेमे में लाने की कोशिश इसलिए भी कर रही थी क्योंकि पंजाब में उसका कोई राजनीतिक अस्तित्व फिलहाल नहीं है। भाजपा ने इस राज्य में अकाली दल पर निर्भर रही है और वह अमरिंदर सिंह जैसे किसी मजबूत और जमीनी आधार वाले नेता की तलाश में है।
अमरिंदर के जुड़ जाने से भाजपा को पैर जमाने में मदद मिलेगी
साल 2017 के विधानसभा चुनावों और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में भी अकाली दल के खराब प्रदर्शन के बावजूद भाजपा ने उससे रिश्ता नहीं तोड़ा। था लेकिन जब कृषि कानूनों के विरोध में अकाली नेता और सुखविंदर सिंह की पत्नी हरसिमरत कौर ने मोदी सरकार से इस्तीफ़ा दे दिया और समर्थन वापस ले लिया तो फिर दोनों के रास्ते अलग हो गए। भाजपा को लगता है कि अमरिंदर के जुड़ जाने से पार्टी को पंजाब में अपने पांव मजबूत करने मे मदद तो मिलेगी ही,इससे कांग्रेस भी को वहां कमजोर करना आसान होगा। क्योंकि अमरिंदर सिंह पंजाब में कांग्रेस का मुख्य चेहरा रहे हैं और पार्टी ने पिछला विधानसभा चुनाव उन्हीं के चेहरे पर लड़ा था।
कैप्टन अमरिंदर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
भाजपा को अमरिंदर जैसे मजबूत चेहरे की जरूरत
भाजपा को पार्टी को पंजाब में अपने पैर जमाने के लिए एक मजबूत चेहरे की सख्त जरूरत है और अमरिंदर सिंह इस काम में पार्टी की मदद कर सकते हैं। लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह भी कृषि कानूनों के कारण भाजपा के कड़े आलोचक रहे हैं और उन्होंने मांग की है कि भाजपा को कानूनों को वापस लेना चाहिए। इसलिए सूत्र बताते हैं कि भाजपा में अमरिंदर सिंह के भाजपा में जाने की संभावना तीनों कृषि कानूनों के भविष्य पर भी निर्भर करता है। दूसरी तरफ कैप्टन अकाली दल और आम आदमी पार्टी में अपना कोई भविष्य नहीं देखते हैं क्योंकि कैप्टन व्यक्तिगत रूप से इन पार्टियों की विचारधार से इत्तिफाक नहीं रखते हैं।
अमरिंदर का सब्र जवाब देने लगा था
कुछ समय से अमरिंदर सिंह का सब्र जवाब देने लगा था। सिंह अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी नवजोत सिंह सिद्धू को राज्य इकाई का अध्यक्ष पद दिए जाने से बहुत नाराज थे। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के व्यवहार से वे आहात महसूस करने लगे थे। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक नाराजगी भरा पत्र लिखकर चेताया था कि पंजाब सरकार के कामकाज में "जबरन हस्तक्षेप" करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसलिए ऐसी अटकलें लगने लगी है कि वे कांग्रेस छोड़ सकते हैं। पार्टी से बाहर निकलने से राज्य में कांग्रेस को बहुत नुकसान पहुंच सकता है क्योंकि अमरिंदर पंजाब में बड़ी हैसियत वाले नेता माने जाते हैं।
भाजपा को पार्टी को पंजाब में अपने पैर जमाने के लिए एक मजबूत चेहरे की सख्त जरूरत है और अमरिंदर सिंह इस काम में पार्टी की मदद कर सकते हैं। लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह भी कृषि कानूनों के कारण भाजपा के कड़े आलोचक रहे हैं और उन्होंने मांग की है कि भाजपा को कानूनों को वापस लेना चाहिए। इसलिए सूत्र बताते हैं कि भाजपा में अमरिंदर सिंह के भाजपा में जाने की संभावना तीनों कृषि कानूनों के भविष्य पर भी निर्भर करता है। दूसरी तरफ कैप्टन अकाली दल और आम आदमी पार्टी में अपना कोई भविष्य नहीं देखते हैं क्योंकि कैप्टन व्यक्तिगत रूप से इन पार्टियों की विचारधार से इत्तिफाक नहीं रखते हैं।
अमरिंदर का सब्र जवाब देने लगा था
कुछ समय से अमरिंदर सिंह का सब्र जवाब देने लगा था। सिंह अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी नवजोत सिंह सिद्धू को राज्य इकाई का अध्यक्ष पद दिए जाने से बहुत नाराज थे। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के व्यवहार से वे आहात महसूस करने लगे थे। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक नाराजगी भरा पत्र लिखकर चेताया था कि पंजाब सरकार के कामकाज में "जबरन हस्तक्षेप" करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसलिए ऐसी अटकलें लगने लगी है कि वे कांग्रेस छोड़ सकते हैं। पार्टी से बाहर निकलने से राज्य में कांग्रेस को बहुत नुकसान पहुंच सकता है क्योंकि अमरिंदर पंजाब में बड़ी हैसियत वाले नेता माने जाते हैं।