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जरूरी नहीं कि वरिष्ठ सदस्य बने प्रोटेम स्पीकर, मोदी सरकार में इसी साल टूटी यह परंपरा

Tue, 26 Nov 2019 12:34 PM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Tue, 26 Nov 2019 12:34 PM IST
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protem speaker will be senior MP or MLA It is Not necessarily PM Modi broke this tradition this year
प्रतीकात्मक तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपना फैसला सुनाते हुए महराष्ट्र की नई सरकार को 27 नवंबर को बहुमत साबित करने को कहा है। साथ ही इसके लिए प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करने का आदेश दिया है। भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा में अमूमन वरिष्ठ सांसद या विधायक को प्रोटेम स्पीकर चुना जाता है, हालांकि ऐसा जरूरी नहीं है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इस परंपरा को इसी साल तोड़ दिया था। आइए जानते हैं पूरा मामला...



दरअसल, कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दाखिल कर महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत परीक्षण (Floor Test) कराने की मांग की थी। इन दलों ने फडणवीस सरकार को 30 नवंबर तक बहुमत परीक्षण कराने का समय दिए जाने के महाराष्ट्र के राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी थी। इस याचिका पर फैसला देते हुए ही सुप्रीम कोर्ट ने नई सरकार को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करने का आदेश दिया है।

क्यों होती है प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति

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बता दें कि विधानसभा में बहुमत परीक्षण के लिए प्रदेश के राज्यपाल को संक्षिप्त सत्र बुलाना होता है। इसके लिए प्रोटेम स्पीकर (सामयिक अध्यक्ष) की नियुक्ति करनी होती है। प्रोटेम स्पीकर पर सदन में बहुमत साबित कराने की प्रक्रिया पूरी कराने और नए विधायकों को शपथ दिलाने की दायित्व होता है।  इसके बाद, सत्तारूढ़ दल विधानसभा के अध्यक्ष की नियुक्ति करता है।

कैसे होती है प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति

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भारत में लोकतांत्रिक परंपरा के अनुसार, संसद में वरिष्ठ सांसद और विधानसभा में वरिष्ठ विधायक को प्रोटेम स्पीकर चुना जाता रहा है। हालांकि, यह राज्यपाल के लिए कोई जरूरी शर्त नहीं है। चूंकि राज्यपाल इसके लिए बाध्यकारी नहीं है, इसलिए किसी भी नाम को आगे बढ़ाया जा सकता है। महाराष्ट्र की बात करें तो वहां कांग्रेस के बालासाहेब थोराट सबसे वरिष्ठ विधायक हैं, वह आठ बार चुनकर विधानसभा पहुंचे हैं। 

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संविधान के इस अनुच्छेद में है उल्लेख

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संविधान का अनुच्छेद 180 (1) राज्यपाल को प्रोटेम स्पीकर (सामयिक अध्यक्ष) नियुक्त करने की शक्ति देता है। यह अनुच्छेद कहता है कि यदि अध्यक्ष की कुर्सी खाली हो जाती है और पद भरने के लिए कोई उपसभापति नहीं होता है, तो कार्यालय के कर्तव्यों को ''विधानसभा के ऐसे सदस्य द्वारा निष्पादित किया जाएगा, जिसे राज्यपाल ने इस प्रयोजन के लिए नियुक्त किया है।''

लैटिन भाषा का शब्द है प्रोटेम

प्रोटेम शब्द एक लैटिन वाक्यांश है। यह प्रो और टेम्पोर शब्दों से मिलकर बना उसका छोटा शब्द (शॉर्ट फॉर्म) है। तात्कालिक समय के लिए, अस्थायी या अस्थायी तौर पर उपयोग में लाए जाने से इसका अर्थ या आशय समझा जाता है।

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प्रधानमंत्री मोदी ने तोड़ी परंपरा

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  • इसी साल केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के दौरान मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ से बीजेपी सांसद डॉ. वीरेंद्र कुमार खटीक को 17वीं लोकसभा का प्रोटेम स्पीकर चुना गया था। जबकि उनसे वरिष्ठ सदस्य बरेली से सांसद संतोष गंगवार थे।
  • सागर जिले के रहने वाले और दलित समुदाय से आने वाले लो प्रोफाइल नेता डॉ. वीरेंद्र कुमार  सात बार चुनाव जीत चुके हैं। वहीं सांसद संतोष गंगवार ने आठ बार चुनावी जीत दर्ज की है।
  • गौरतलब है कि कर्नाटक में भी इस परंपरा को साल 2018 में तोड़ा गया था। वहां राज्यपाल वजुभाई वाला ने भाजपा नेता केजी बोपैया को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया, जबकि उस दौरान कांग्रेस आरवी देशपांडे सबसे वरिष्ठ विधायक थे। 
  • साल 2016 में उत्तराखंड में बहुमत परीक्षण के दौरान कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बहुमत साबित किया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को एक पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित रहने का निर्देश दिया था।
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