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संपत्ति विवाद में अहम फैसला: बॉम्बे हाई कोर्ट ने सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी को दी राहत, बेटे को फटकार

Sat, 29 Aug 2026 10:11 AM IST
Jyoti Bhaskar ज्योति भास्कर
Updated Sat, 29 Aug 2026 10:11 AM IST
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property dispute Bombay High Court relief to retired IAS officer reprimands son justice as gadkari kamal khata
बंबई उच्च न्यायालय - फोटो : एएनआई (फाइल)

78 वर्षीय पिता (सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी) को मानसिक रूप से बीमार बता फ्लैट पर कब्जे की कोशिश बेटे पर भारी पड़ गई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने पिता की मानसिक स्थिति की जांच कराने की बेटे की मांग को खारिज करते हुए उसे ही पिता के फ्लैट से बेदखल कर दिया। साथ ही 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

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अदालत ने बेटे की कार्यवाही को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा कि कानून ढाल है, तलवार नहीं। बेटे ने बुजुर्ग पिता को अनावश्यक मुकदमेबाजी में उलझाने की कोशिश की है। न्यायमूर्ति एएस गडकरी और कमल खाता की पीठ ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य कानून का इस्तेमाल मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों की सुरक्षा के लिए होना चाहिए, न कि किसी विरोधी पक्ष के खिलाफ दबाव बनाने के लिए। अदालत ने इसे कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला माना।
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संपत्ति विवाद से शुरू हुई लड़ाई
अंधेरी में रहने वाले 54 वर्षीय बेटे ने 2015 में पैतृक संपत्ति के बंटवारे को लेकर पिता के खिलाफ मुकदमा दायर किया था, जो अभी लंबित है। दिसंबर 2025 में उसने हाई कोर्ट में आवेदन देकर पिता की मानसिक स्थिति की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग की। उसका दावा था कि पिता मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं। साथ ही पिता के फ्लैट परअपना दावा भी ठोक रहा था। बेटे ने इसके लिए जुलाई 2024 की एक मेडिकल रिपोर्ट का सहारा लिया। रिपोर्ट में पिता को मधुमेह और इंसुलिन लेने के बाद होने वाली हाइपोग्लाइसीमिया की समस्या का उल्लेख था।  कोर्ट ने बेटे की इस हरकत को बेहद दुर्भावनापूर्ण और घटिया करार दिया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बुजुर्ग पिता को परेशान करने के लिए मेंटल हेल्थ कानून को हथियार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने बेटे की याचिका खारिज करते हुए उस पर 5 लाख का भारी जुर्माना लगाया जो उसे अपने पिता को देना होगा।
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पिता भी चाहते थे बेटे की बेदखली
इसी संपत्ति विवाद में पिता ने भी बेटे को अपनी संपत्ति से हटाने के लिए माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत कार्यवाही की थी। हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक पिता ने बेटे पर मानसिक उत्पीड़न का आरोप भी लगाया था।

  • अदालत ने माना कि मानसिक जांच की मांग उस समय की गई, जब पिता को संपत्ति से जुड़े विवाद में राहत मिलने की कार्यवाही चल रही थी। पीठ ने इसे पिता पर दबाव बनाने की कोशिश माना और बेटे को 5 लाख रुपये की लागत पिता को देने का आदेश दिया।

पिता सिर्फ डायबिटीज के मरीज
सुनवाई के दौरान 54 वर्षीय बेटे ने खुद अदालत में अपनी ओर से दलीलें रखीं। कोर्ट ने कहा कि जिस मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर बेटे ने अपनी बात रखी थी, उससे सिर्फ यह पता चलता था कि उसके पिता डायबिटीज के मरीज थे। उन्हें इंसुलिन लेने के बाद हाइपोग्लाइसीमिया (ब्लड शुगर का स्तर बहुत कम हो जाना) की समस्या होती थी, जिसके कारण भ्रम, उलझन, भूलने की आदत और पसीना आने जैसे लक्षण कुछ समय के लिए दिखाई देते थे। अहम बात यह है कि जजों ने कहा कि मेडिकल सर्टिफिकेट में खुद यह माना गया था कि ये लक्षण कुछ समय के लिए ही होते थे।



सौतेली मां पर भी लगाए थे आरोप
सुनवाई के दौरान बेटे ने पिता की मानसिक स्थिति पर सवाल उठाने के साथ यह आरोप भी लगाया था कि उसके पिता अपनी डॉक्टर सौतेली मां के साथ अलग रहते हैं और उसे पिता से मिलने नहीं दिया जाता। बेटे ने पिता की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाते हुए दावा किया था कि वह उनके खिलाफ चल रहे अलग-अलग दीवानी और आपराधिक मामलों में प्रभावी ढंग से पैरवी करने की स्थिति में नहीं हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने इन दावों को मानसिक बीमारी साबित करने का पर्याप्त आधार नहीं माना।

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