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प्रियंका के बैग पर राजनीति: फलस्तीन पर सियासी दलों की क्या स्थिति, कांग्रेस के साथ कौन? BJP का कैसा रुख, जानें
Tue, 17 Dec 2024 05:05 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 17 Dec 2024 05:05 PM IST
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फलस्तीन विवाद पर सियासी दलों का रुख।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
कांग्रेस महासचिव और सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा अब संसदीय राजनीति के स्तर पर कितनी सक्रिय हो चुकी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके एक कदम ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी। दरअसल, प्रियंका सोमवार को फलस्तीन के लोगों के प्रति एकजुटता दिखाते हुए सोमवार को एक ऐसा हैंडबैग लेकर संसद पहुंचीं जिस पर ‘फलस्तीन’ लिखा हुआ था। उनके इस कदम को लेकर देश में सियासत भी शुरू हो गई। खासकर केंद्र की भाजपा सरकार ने उनके इस कदम को राजनीतिक स्टंट करार दिया और उनसे बांग्लादेश का मुद्दा उठाने के लिए कहा।मजेदार बात यह है कि भाजपा नेताओं के इन बयानों के बाद प्रियंका मंगलवार को 'बांग्लादेश' लिखा एक बैग लेकर भी संसद पहुंचीं। उनका यह बैग बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के लिए उनके समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है। इस लिहाज से जहां बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पर सत्तापक्ष और विपक्ष काफी हद तक एक साथ दिखाई दे रहे हैं, वहीं फलस्तीन के मुद्दे पर कई राजनीतिक दलों की राय काफी बंटी हुई है।
ऐसे में यह जानना जरूरी है कि फलस्तीन को लेकर भारत का आधिकारिक पक्ष क्या रहा है? इस मुद्दे पर भारत की राजनीति कितनी बंटी हुई है? राजनीतिक दलों की फलस्तीन के मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया है? आइये जानते हैं...
फलस्तीन पर क्या रहा है भारत का आधिकारिक पक्ष?
भारत ने ऐतिहासिक तौर पर फलस्तीन को लेकर आधिकारिक तौर पर समर्थन जताया है। फिर चाहे भारत की आजादी के बाद पहली सरकार की तरफ से रखा गया पक्ष हो या नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ से बार-बार अलग-अलग मंचों पर दिए जा रहे जवाब। भारत ने इस्राइल और फलस्तीन के मुद्दे पर हमेशा से टू स्टेट सॉल्यूशन यानी 'दो राष्ट्रों के समाधान' का समर्थन किया है। इसके तहत भारत सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फलिस्तीन राज्य की स्थापना, जो इस्राइल के साथ शांति से रह सके, का समर्थक है। भारत संयुक्त राष्ट्र में फलिस्तीन की सदस्यता का भी समर्थन करता है।
इस्राइल और फलस्तीन के बीच संघर्ष को लेकर भी भारत कई बार अपनी स्थिति साफ कर चुका है। 13 दिसंबर 2024 को लोकसभा में डीएमके सांसद ए. राजा के सवालों पर विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने जवाब में कहा था कि भारत पश्चिम एशिया में उभरती स्थिति और गाजा में मानवीय संकट को लेकर चिंतित है। सरकार ने फलिस्तीन के लोगों को मानवीय सहायता की सुरक्षित, समय पर और निरंतर वितरण की आवश्यकता पर जोर दिया है। संघर्ष की शुरुआत से, भारत ने दो किस्तों में 16.5 मीट्रिक टन दवाओं और चिकित्सा आपूर्ति सहित लगभग 70 मीट्रिक टन मानवीय सहायता प्रदान की है। इसने पिछले साल 5 मिलियन डॉलर जारी किए और इस साल निकट पूर्व में फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए) को 5 मिलियन डॉलर का वितरण किया। हाल ही में, अक्तूबर और नवंबर 2024 में यूएनआरडब्ल्यूए और फलिस्तीन स्वास्थ्य मंत्रालय को 65 टन दवाएं भी भेजी गईं।
भारत ने ऐतिहासिक तौर पर फलस्तीन को लेकर आधिकारिक तौर पर समर्थन जताया है। फिर चाहे भारत की आजादी के बाद पहली सरकार की तरफ से रखा गया पक्ष हो या नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ से बार-बार अलग-अलग मंचों पर दिए जा रहे जवाब। भारत ने इस्राइल और फलस्तीन के मुद्दे पर हमेशा से टू स्टेट सॉल्यूशन यानी 'दो राष्ट्रों के समाधान' का समर्थन किया है। इसके तहत भारत सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फलिस्तीन राज्य की स्थापना, जो इस्राइल के साथ शांति से रह सके, का समर्थक है। भारत संयुक्त राष्ट्र में फलिस्तीन की सदस्यता का भी समर्थन करता है।
इस्राइल और फलस्तीन के बीच संघर्ष को लेकर भी भारत कई बार अपनी स्थिति साफ कर चुका है। 13 दिसंबर 2024 को लोकसभा में डीएमके सांसद ए. राजा के सवालों पर विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने जवाब में कहा था कि भारत पश्चिम एशिया में उभरती स्थिति और गाजा में मानवीय संकट को लेकर चिंतित है। सरकार ने फलिस्तीन के लोगों को मानवीय सहायता की सुरक्षित, समय पर और निरंतर वितरण की आवश्यकता पर जोर दिया है। संघर्ष की शुरुआत से, भारत ने दो किस्तों में 16.5 मीट्रिक टन दवाओं और चिकित्सा आपूर्ति सहित लगभग 70 मीट्रिक टन मानवीय सहायता प्रदान की है। इसने पिछले साल 5 मिलियन डॉलर जारी किए और इस साल निकट पूर्व में फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए) को 5 मिलियन डॉलर का वितरण किया। हाल ही में, अक्तूबर और नवंबर 2024 में यूएनआरडब्ल्यूए और फलिस्तीन स्वास्थ्य मंत्रालय को 65 टन दवाएं भी भेजी गईं।
इस्राइल पर हमास के हमले का भी किया विरोध
हालांकि, भारत की तरफ से इस्राइल पर हमास की तरफ से किए गए हमलों को भी आतंकी हमले बताया गया है। कीर्तिवर्धन सिंह ने लोकसभा में दिए जवाब में कहा, "भारत ने 7 अक्टूबर 2023 को इस्राइल पर हुए आतंकी हमलों और इस्राइल-हमास संघर्ष में नागरिकों की जान जाने की कड़ी निंदा की है। भारत ने युद्ध विराम, सभी बंधकों की रिहाई और बातचीत और कूटनीति के माध्यम से संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान का आह्वान किया है।
फलस्तीन पर राजनीतिक दलों का क्या रहा है पक्ष?
आधिकारिक तौर पर भारत ने फलस्तीन के अलग राष्ट्र के तौर पर मान्यता और उसकी क्षेत्रीय अखंडता का हमेशा से समर्थन किया है। इस्राइल की तरफ से फलस्तीन पर किए जा रहे हमलों और उसके क्षेत्र पर कब्जा करने की कोशिशों की भी भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आलोचना की है। यानी मोदी सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही फलस्तीन विवाद पर निरंतरता जारी रखी है।
हालांकि, भारत की तरफ से इस्राइल पर हमास की तरफ से किए गए हमलों को भी आतंकी हमले बताया गया है। कीर्तिवर्धन सिंह ने लोकसभा में दिए जवाब में कहा, "भारत ने 7 अक्टूबर 2023 को इस्राइल पर हुए आतंकी हमलों और इस्राइल-हमास संघर्ष में नागरिकों की जान जाने की कड़ी निंदा की है। भारत ने युद्ध विराम, सभी बंधकों की रिहाई और बातचीत और कूटनीति के माध्यम से संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान का आह्वान किया है।
फलस्तीन पर राजनीतिक दलों का क्या रहा है पक्ष?
आधिकारिक तौर पर भारत ने फलस्तीन के अलग राष्ट्र के तौर पर मान्यता और उसकी क्षेत्रीय अखंडता का हमेशा से समर्थन किया है। इस्राइल की तरफ से फलस्तीन पर किए जा रहे हमलों और उसके क्षेत्र पर कब्जा करने की कोशिशों की भी भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आलोचना की है। यानी मोदी सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही फलस्तीन विवाद पर निरंतरता जारी रखी है।
आधिकारिक रुख से कैसे टकरा रहा नेतृत्व वाली पार्टी का रुख?
1. भाजपा और उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार
यह मोदी सरकार ही है, जिसने अपने कार्यकाल में फलस्तीन के साथ-साथ इस्राइल के साथ भी रिश्ते प्रगाढ़ किए हैं। 2020 में नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जो कि सिर्फ इस्राइल के दौरे पर गए थे, जबकि इससे पहले के सभी प्रधानमंत्री (कांग्रेस और अन्य सरकारों के) बिना फलस्तीन जाए इस्राइल का दौरा नहीं करते थे। माना जाता है कि मोदी का यह कदम उनकी पार्टी भाजपा के बदलते रुख को भी दर्शाता है, जो कि इस्राइल के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते बढ़ाने का समर्थक रहा है।
हालांकि, भाजपा और उसके नेतृत्व वाली सरकार के लिए 7 अक्तूबर 2023 के घटनाक्रम काफी अहम साबित हुए। इस्राइल पर हमास के हमले की जहां भारत ने हर स्तर पर आलोचना की, वहीं फलस्तीन के समर्थन के मुद्दे पर भी कई बार उसने चुप्पी साधे रखी। भारत की तरफ से संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में भी कुछ प्रस्तावों पर इस्राइल के विरोध या फलस्तीन के समर्थन में वोटिंग करने से परहेज किया गया। विदेश मंत्री जयशंकर ने संसद को हाल ही में बताया कि भारत ने यूएन में गाजा पर पेश हुए 13 प्रस्तावों में से 10 पर समर्थन में मतदान किया। हालांकि, तीन प्रस्तावों पर उसने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया।
भाजपा नेताओं ने भी कई मौकों पर इस्राइल के समर्थन में बयान दिए। इनमें सबसे प्रमुख नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का रहा, जिन्होंने राजस्थान के अलवर में एक रैली के दौरान कहा था कि इस्राइल की सेना गाजा में तालिबान की मानसिकता वाले लोगों को कुचलने का काम कर रही है।
यह मोदी सरकार ही है, जिसने अपने कार्यकाल में फलस्तीन के साथ-साथ इस्राइल के साथ भी रिश्ते प्रगाढ़ किए हैं। 2020 में नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जो कि सिर्फ इस्राइल के दौरे पर गए थे, जबकि इससे पहले के सभी प्रधानमंत्री (कांग्रेस और अन्य सरकारों के) बिना फलस्तीन जाए इस्राइल का दौरा नहीं करते थे। माना जाता है कि मोदी का यह कदम उनकी पार्टी भाजपा के बदलते रुख को भी दर्शाता है, जो कि इस्राइल के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते बढ़ाने का समर्थक रहा है।
हालांकि, भाजपा और उसके नेतृत्व वाली सरकार के लिए 7 अक्तूबर 2023 के घटनाक्रम काफी अहम साबित हुए। इस्राइल पर हमास के हमले की जहां भारत ने हर स्तर पर आलोचना की, वहीं फलस्तीन के समर्थन के मुद्दे पर भी कई बार उसने चुप्पी साधे रखी। भारत की तरफ से संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में भी कुछ प्रस्तावों पर इस्राइल के विरोध या फलस्तीन के समर्थन में वोटिंग करने से परहेज किया गया। विदेश मंत्री जयशंकर ने संसद को हाल ही में बताया कि भारत ने यूएन में गाजा पर पेश हुए 13 प्रस्तावों में से 10 पर समर्थन में मतदान किया। हालांकि, तीन प्रस्तावों पर उसने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया।
भाजपा नेताओं ने भी कई मौकों पर इस्राइल के समर्थन में बयान दिए। इनमें सबसे प्रमुख नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का रहा, जिन्होंने राजस्थान के अलवर में एक रैली के दौरान कहा था कि इस्राइल की सेना गाजा में तालिबान की मानसिकता वाले लोगों को कुचलने का काम कर रही है।
2. कांग्रेस और अन्य राष्ट्रीय दल
I). कांग्रेस
7 अक्तूबर 2023 को हमास के इस्राइल पर हमले की भारत ने आधिकारिक तौर पर आलोचना की थी। हालांकि, इसके बाद इस्राइल की तरफ से गाजा पर हुए इस्राइली हमलों पर विपक्षी दल काफी मुखर रहे हैं। खासकर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा कई मौकों पर गाजा में इस्राइल की सैन्य कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाती और फलस्तीनियों के साथ एकजुटता व्यक्त करती रही हैं। फिर चाहे एक्स पर अपने पोस्ट्स के जरिए या वायनाड समेत अलग-अलग जगह रैलियों के जरिए। अब उन्होंने फलस्तीन लिखे हैंडबैग के जरिए भी फलस्तीन के समर्थन को दर्शाया है। उन्होंने जो हैंडबैग लिया हुआ था उस पर अंग्रेजी में Palestine (फलस्तीन) लिखे होने के साथ फलस्तीन से जुड़े कई प्रतीक भी बने हुए थे।
इतना ही नहीं जहां हमास के इस्राइल पर किए गए हमलों का पहले 8 अक्तूबर 2023 को कांग्रेस ने विरोध किया, वहीं अगले दिन यानी 9 अक्तूबर को ही कांग्रेस कार्य समिति (CWC) में एक प्रस्ताव पारित हुआ। इस प्रस्ताव में फिलिस्तीनियों की जमीन, स्वशासन और आत्म सम्मान के साथ जीवन के अधिकारों का समर्थन किया गया। खास बात यह है कि प्रस्ताव में इजरायल और उस पर हमले को जिक्र नहीं था। कांग्रेस का तब का रुख भारत सरकार से भी अलग था, जिसने हमलों के विरोध में इस्राइल के साथ खड़े होने की बात कही थी। इस्राइल पर हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर हमास के हमलों की कड़े शब्दों में आलोचना की थी।
7 अक्तूबर 2023 को हमास के इस्राइल पर हमले की भारत ने आधिकारिक तौर पर आलोचना की थी। हालांकि, इसके बाद इस्राइल की तरफ से गाजा पर हुए इस्राइली हमलों पर विपक्षी दल काफी मुखर रहे हैं। खासकर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा कई मौकों पर गाजा में इस्राइल की सैन्य कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाती और फलस्तीनियों के साथ एकजुटता व्यक्त करती रही हैं। फिर चाहे एक्स पर अपने पोस्ट्स के जरिए या वायनाड समेत अलग-अलग जगह रैलियों के जरिए। अब उन्होंने फलस्तीन लिखे हैंडबैग के जरिए भी फलस्तीन के समर्थन को दर्शाया है। उन्होंने जो हैंडबैग लिया हुआ था उस पर अंग्रेजी में Palestine (फलस्तीन) लिखे होने के साथ फलस्तीन से जुड़े कई प्रतीक भी बने हुए थे।
इतना ही नहीं जहां हमास के इस्राइल पर किए गए हमलों का पहले 8 अक्तूबर 2023 को कांग्रेस ने विरोध किया, वहीं अगले दिन यानी 9 अक्तूबर को ही कांग्रेस कार्य समिति (CWC) में एक प्रस्ताव पारित हुआ। इस प्रस्ताव में फिलिस्तीनियों की जमीन, स्वशासन और आत्म सम्मान के साथ जीवन के अधिकारों का समर्थन किया गया। खास बात यह है कि प्रस्ताव में इजरायल और उस पर हमले को जिक्र नहीं था। कांग्रेस का तब का रुख भारत सरकार से भी अलग था, जिसने हमलों के विरोध में इस्राइल के साथ खड़े होने की बात कही थी। इस्राइल पर हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर हमास के हमलों की कड़े शब्दों में आलोचना की थी।
II). अन्य राष्ट्रीय दल
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता और राज्यसभा सांसद जावेद अली ने कहा कि भारत पारंपरिक रूप से फलिस्तीन का समर्थन करता आया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी फलिस्तीन के हक में खड़े हुए थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई भी फलिस्तीन के समर्थन में खड़े थे। राज्यसभा सांसद ने पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि पीएम मोदी ने विदेश नीति में परिवर्तन कर दिया है। अब वह इस्राइल की गोदी में जाकर बैठ गए हैं।
इसके अलावा इसी साल फलस्तीन के मुद्दे पर 25 अगस्त को विपक्षी दलों की एक बैठक हुई थी। इनमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी के अलावा आम आदमी पार्टी और केंद्र में भाजपा की गठबंधन की साथी जदयू के नेता भी शामिल हुए थे। जहां आप से इस बैठक में राज्यसभा सांसद संजय सिंह पहुंचे थे, वहीं जदयू से इस बैठक में केसी त्यागी ने हिस्सा लिया था।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता और राज्यसभा सांसद जावेद अली ने कहा कि भारत पारंपरिक रूप से फलिस्तीन का समर्थन करता आया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी फलिस्तीन के हक में खड़े हुए थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई भी फलिस्तीन के समर्थन में खड़े थे। राज्यसभा सांसद ने पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि पीएम मोदी ने विदेश नीति में परिवर्तन कर दिया है। अब वह इस्राइल की गोदी में जाकर बैठ गए हैं।
इसके अलावा इसी साल फलस्तीन के मुद्दे पर 25 अगस्त को विपक्षी दलों की एक बैठक हुई थी। इनमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी के अलावा आम आदमी पार्टी और केंद्र में भाजपा की गठबंधन की साथी जदयू के नेता भी शामिल हुए थे। जहां आप से इस बैठक में राज्यसभा सांसद संजय सिंह पहुंचे थे, वहीं जदयू से इस बैठक में केसी त्यागी ने हिस्सा लिया था।
III). क्षेत्रीय दल
इतना ही नहीं वाम दल और इस्लामिक आधार पर बनी कई पार्टियों ने भी फलस्तीन के मुद्दे का मुखर होकर समर्थन किया है। 7 अक्तूबर के हमले के बाद फलस्तीन पर इस्राइल के हमले का सबसे कड़ा विरोध केरल में देखा गया। यहां फलस्तीन के समर्थन में कई रैलियां हुईं, जिन्हें राज्य की सत्तासीन लेफ्ट सरकार का भी समर्थन हासिल रहा। खुद सीपीआई-एम और उसके नेताओं ने फलस्तीन के मुद्दे पर कोझिकोड में एक रैली का आयोजन किया था, जिसमें 50,000 से ज्यादा लोग जुटे थे। इस रैली का उद्घाटन केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन की तरफ से किया गया था।
इसके अलावा राजनीतिक दल- इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और संगठन जमात-ए-इस्लामी ने भी फलस्तीन मुद्दे पर कई रैलियां आयोजित की गईं। जमात-ए-इस्लामी की ऐसी ही एक रैली पर विवाद हो गया था, जिसमें हमास के बड़े नेताओं में शुमार रहे खालेद मशाल ने रैली को वर्चुअल तौर पर संबोधित किया था। हमास नेता के केरल रैली में दिए भाषण का वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर सामने आया, इसे लेकर विवाद हो गया। दरअसल, रैली में जो पोस्टर लिखे थे, उन पर लिखा था 'बुलडोजर हिंदुत्व और रंगभेदी यहूदीवाद को को उखाड़ फेंको।' इसे लेकर भाजपा ने नाराजगी जताई थी।
इतना ही नहीं वाम दल और इस्लामिक आधार पर बनी कई पार्टियों ने भी फलस्तीन के मुद्दे का मुखर होकर समर्थन किया है। 7 अक्तूबर के हमले के बाद फलस्तीन पर इस्राइल के हमले का सबसे कड़ा विरोध केरल में देखा गया। यहां फलस्तीन के समर्थन में कई रैलियां हुईं, जिन्हें राज्य की सत्तासीन लेफ्ट सरकार का भी समर्थन हासिल रहा। खुद सीपीआई-एम और उसके नेताओं ने फलस्तीन के मुद्दे पर कोझिकोड में एक रैली का आयोजन किया था, जिसमें 50,000 से ज्यादा लोग जुटे थे। इस रैली का उद्घाटन केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन की तरफ से किया गया था।
इसके अलावा राजनीतिक दल- इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और संगठन जमात-ए-इस्लामी ने भी फलस्तीन मुद्दे पर कई रैलियां आयोजित की गईं। जमात-ए-इस्लामी की ऐसी ही एक रैली पर विवाद हो गया था, जिसमें हमास के बड़े नेताओं में शुमार रहे खालेद मशाल ने रैली को वर्चुअल तौर पर संबोधित किया था। हमास नेता के केरल रैली में दिए भाषण का वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर सामने आया, इसे लेकर विवाद हो गया। दरअसल, रैली में जो पोस्टर लिखे थे, उन पर लिखा था 'बुलडोजर हिंदुत्व और रंगभेदी यहूदीवाद को को उखाड़ फेंको।' इसे लेकर भाजपा ने नाराजगी जताई थी।