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कूटनीति: भारत के इस दांव के बाद साथ आएंगे अमेरिका, रूस, ईरान और ताजिकिस्तान

Fri, 17 Sep 2021 07:43 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Fri, 17 Sep 2021 07:43 PM IST
सार

कूटनीति के जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने परोक्ष रूप से उन देशों को निशाने पर लिया जो अफगानिस्तान में तालिबान की अंतरिम सरकार का खुलकर समर्थन कर रहे हैं और वहां बढ़ रही अस्थिरता के लिए जिम्मेदार भी हैं। यह ईशारा साफ तौर पर क्षेत्रीय असुरक्षा की चिंताओं से जुड़ा है...

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Prime Minister Narendra Modi addressed the Shanghai Cooperation Organization summit and expressed concern about Afghanistan
पीएम मोदी - फोटो : Twitter@bjp4india

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन की शिखर बैठक को संबोधित किया और दूसरी तरफ विदेश मंत्री एस जयशंकर दुशांबे में कूटनीति की पारी खेल रहे हैं। इस दौरान भारत ने कई देशों की चिताओं को समझते हुए तटस्थता की नीति को अपनाया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में जहां परोक्ष रूप से कई देशों को आगाह किया, वहीं कई देश की चिंताओं के साथ भारत की चिंता को भी साझा किया। प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती शांति, सुरक्षा और भरोसा है। कट्टरपंथ तेजी से दुनिया में बढ़ रहा है और हाल में अफगानिस्तान में हुई घटनाओं ने इस चुनौती को बढ़ा दिया है।

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कूटनीति के जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने परोक्ष रूप से उन देशों को निशाने पर लिया जो अफगानिस्तान में तालिबान की अंतरिम सरकार का खुलकर समर्थन कर रहे हैं और वहां बढ़ रही अस्थिरता के लिए जिम्मेदार भी हैं। यह ईशारा साफ तौर पर क्षेत्रीय असुरक्षा की चिंताओं से जुड़ा है। शिखर नेता के संबोधन के समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी मौजूद थे। राष्ट्रपति जिनपिंग भी बीजिंग में तालिबान के नेताओं से मिल चुके हैं। काबुल में चीन का दूतावास यथावत काम कर रहा है और पाकिस्तान और अफगानिस्तान को चीन का समर्थन है। इसलिए इसे भारत का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है।

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शांतिपूर्ण, आतंकवाद मुक्त स्थायी अफगानिस्तान चाहिए

एससीओ नेताओं की बैठक में भारत ने अपने पक्ष को रखा। नई दिल्ली ने निष्पक्ष, स्वतंत्र, लोकतांत्रिक, एकजुट, शांतिपूर्ण और स्थायी अफगानिस्तान की आवश्यकता बताई। जहां न युद्ध जैसे हालात हों और न ड्रग, मानव तस्करी, आतंकवाद में लिपटा अफगानिस्तान हो। दरसल यही चिंता ताजिकिस्तान, ईरान समेत अन्य देशों की भी है। पंजशीर में तालिबान की हाल में कार्रवाई का ईरान ने भी कड़ा प्रतिवाद किया था। दूसरे, पाकिस्तान के अफगानिस्तान में बढ़ रहे दखल से काबुल, कंधार, मजार-ए-शरीफ, जलालाबाद, हेरात समेत सभी प्रांतों की दूरियां बढ़ रही हैं। टकराव की स्थिति भी बढ़ती जा रही है। भारत का साफ कहना है कि इससे किसी का भी भला नहीं होने वाला है। भारत ने साफ कहा कि किसी भी देश को किसी भी तरह के आतंकवाद का समर्थन नहीं करना चाहिए। समझा जा रहा है कि अफगानिस्तान में जो हो रहा है, ईरान समेत कई देशों की पीड़ा बढ़ा रहा है। अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन अल-कायदा भी सक्रिय हो रहा है। आतंकवाद के इस मुद्दे पर रूस की भी चिंताएं हैं।

अमेरिका से भी साधेंगे संतुलन

प्रधानमंत्री मोदी 22-27 सितंबर के बीच अमेरिका जा सकते हैं। प्रधानमंत्री की अमेरिकी यात्रा को लेकर उनका कार्यालय लगातार सक्रिय है। प्रधानमंत्री की इस यात्रा में उनकी मुलाकात अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से होनी तय मानी जा रही है। यह प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बाइडन की पहली आमने-सामने की भेंट होगी। इससे पहले दोनों शिखर नेता तीन बार वर्चुअली मिल चुके हैं। समझा जा रहा है कि इस मुलाकात में अफगानिस्तान के लगातार बदलते हालात, बढ़ती अस्थिरता और आतंकवाद का खतरा मुख्य विषय रहेगा। भारत-प्रशांत क्षेत्र के मुद्दे पर भी अहम चर्चा हो सकती है। क्वैड (भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया) के संगठन को मजबूत बनाने, सूचनाओं की साझेदारी बढ़ाने, आपसी सहयोग को नया आयाम देने पर चर्चा के पूरे आसार हैं। इस यात्रा पर चीन, पाकिस्तान समेत अन्य देशों की निगाहें भी लगी हैं। भारत का मानना है कि अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देश अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का समर्थन करने में हिचकेंगे। यह जितना भारत के पक्ष में रहेगा, उतना ही पाकिस्तान और चीन के लिए सबक लेने जैसा रहेगा।

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