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राष्ट्रपति ने खुद को ऐसे रखा चुनावी विवादों से दूर, विपक्ष ने भी की सराहना
Wed, 12 Jun 2019 07:00 AM IST
संदीप भट्ट
शरद गुप्ता, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, नई दिल्ली
Published by: संदीप भट्ट
Updated Wed, 12 Jun 2019 07:00 AM IST
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तीन महीने तक चले लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग और सीएजी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सभी संवैधानिक संस्थाओं को प्रचार का हिस्सा बना दिया गया था। ऐसे ही प्रयास राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को लेकर भी हुए लेकिन यदि वे विवाद से बच पाए तो उसके पीछे उनकी सोची समझी रणनीति थी - मीडिया और राजनीतिक दलों से दूर रहने की।
मार्च से मई तक तीन महीनों के दौरान वे किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिले, न किसी ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लिया जहां विवाद की संभावना हो और किसी भी आरोप का जवाब नहीं दिया। राष्ट्रपति भवन के सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने इतनी सावधानी इसलिए बरती क्योंकि वे लंबे समय तक एक राजनीतिक दल से संबद्ध रहे और नहीं चाहते थे कि उनके किसी कदम पर, बयान पर या फैसले पर कोई उंगली उठाए।
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मार्च से मई तक तीन महीनों के दौरान वे किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिले, न किसी ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लिया जहां विवाद की संभावना हो और किसी भी आरोप का जवाब नहीं दिया। राष्ट्रपति भवन के सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने इतनी सावधानी इसलिए बरती क्योंकि वे लंबे समय तक एक राजनीतिक दल से संबद्ध रहे और नहीं चाहते थे कि उनके किसी कदम पर, बयान पर या फैसले पर कोई उंगली उठाए।
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सेनाधिकारियों का गुमशुदगी पत्र
चुनाव के दौरान कुछ पूर्व सेनाधिकारियों द्वारा राष्ट्रपति को लिखा एक पत्र चर्चा का विषय रहा जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा बालाकोट की घटना का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की आलोचना की थी। हालांकि पत्र में उल्लेखित सेना के कई अधिकारियों ने ऐसे किसी पत्र पर दस्तखत करने से इंकार कर एक नए विवाद के जन्म दे दिया था। मजे की बात यह थी कि राष्ट्रपति भवन को ऐसा कोई पत्र मिला ही नहीं था। लेकिन उन्होंने पत्र का न तो खंडन किया और न ही पुष्टि। किसी विवाद में पड़ने के बजाए उन्होंने चुप्पी साधे रखी।राष्ट्रपति भवन के सूत्रों के मुताबिक टीवी पर खबर दिखाए जाने के एक सप्ताह बाद उन्हें स्पीड पोस्ट से कुछ कागजात मिले। ये कई लोगों को भेजे गए एक मेल की प्रतिलिपि थी। इस मेल पर लोगों ने अपने अपने विचार प्रकट किए थे। लेकिन किसी के दस्तखत नहीं थे। यह वैसा ही था जैसा एक व्हाट्सएप ग्रुप में डाली गई कोई पोस्ट। यही वजह थी कि राष्ट्रपति भवन ने इसका संज्ञान ही नहीं लिया।
नौकरशाहों का पत्र भा गायब
इसी तरह का पत्र पूर्व नौकरशाहों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए राष्ट्रपति को लिखा था। यह पत्र कई दिनों तक मीडिया में चर्चा का विषय रहा। लेकिन यह पत्र राष्ट्रपति भवन को आज तक नहीं मिला है। फिर भी राष्ट्रपति भवन की ओर से इस पर विषय पर कोई टिप्पणी नहीं की गई।
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