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President Election: एक उम्मीदवार ऐसा जिसने चार बार पेश की उम्मीदवारी, दो बार दूसरे नंबर पर रहे, 1967 में तो...

Thu, 21 Jul 2022 03:51 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 21 Jul 2022 03:51 PM IST
सार

एक दौर वह भी था, जब राष्ट्रपति पद के लिए एक-दो नहीं, बल्कि 10, 20 और 30 लोग तक उम्मीदवारी पेश करते थे और चुनाव लड़ते थे। इसी दौर में एक उम्मीदवार ऐसे भी थे, जिन्होंने चार बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ा। 

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President Election candidate who fought 4 times remained on second spot twice Chaudhary Hari Ram news in hindi
चौधरी हरिराम। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे थोड़ी देर में आ जाएंगे। इसके साथ ही ये स्पष्ट हो जाएगा कि देश के 16वें राष्ट्रपति कौन होंगे। बीते कुछ सालों का इतिहास देखा जाए तो दूसरे नंबर पर रहने वाला उम्मीदवार भी दूसरी बार दावेदारी पेश नहीं करता। हालांकि, राष्ट्रपति चुनाव में हमेशा ऐसा नहीं था। एक दौर वह भी था, जब राष्ट्रपति पद के लिए एक-दो नहीं, बल्कि 10, 20 और 30 लोग तक उम्मीदवारी पेश करते थे और चुनाव लड़ते थे। इसी दौर में एक उम्मीदवार ऐसे भी थे, जिन्होंने चार बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ा। 
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कौन थे वह प्रत्याशी?
हम जिस प्रत्याशी के बारे में आपको बता रहे हैं, उनका नाम था चौधरी हरिराम और जिस अवधि में उन्होंने चुनाव लड़ा, वह समय था 1952 से लेकर 1967 तक का। इस पूरे दौर में हरिराम ने चार बार राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी पेश की। जहां 1952 और 1957 में वे देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को चुनौती दे रहे थे, वहीं 1962 में उन्होंने सर्वपल्ली राधाकृष्णन और 1967 में जाकिर हुसैन के खिलाफ चुनाव लड़ा। हालांकि, उन्हें हर बार हार मिली। 

चौधरी हरिराम दो बार- 1957 और 1962 में दूसरे स्थान पर जरूर रहे, लेकिन हालत यह थी कि उन्हें किसी भी चुनाव (1952 से 1967 तक) में विजेता उम्मीदवार के खिलाफ एक फीसदी से ज्यादा वोट नहीं मिले। इसके बावजूद राष्ट्रपति पद के लिए उनका जुनून कई वर्षों तक जारी रहा। 
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स्वतंत्रता सेनानी के परिवार से आते थे चौधरी हरिराम
हरियाणा के रहने वाले चौधरी हरिराम स्वतंत्रता सेनानी श्रीरामजी लाल के परिवार से आते हैं। उनके राजनीति में आने की कहानी भी काफी दिलचस्प है। दरअसल, रोहतक के सर छोटूराम ने ब्रिटिश राज के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई और हरियाणा के किसानों को एकजुट किया। 1923 में उन्होंने जमींदार पार्टी बनाई। रोहतक उनकी राजनीतिक का केंद्र रहा और इस दौरान उन्हें पास के गांव के लोगों का भी जबरदस्त समर्थन मिला था। 

सर छोटूराम के इस आंदोलन को समर्थन देने वालों में एक नाम श्रीरामजी लाल का भी था, जो कि रोहतक के करीब खेदवाली गांव से थे। रामजी लाल के चार बेटों में से सबसे बड़े बेटे चौधरी टीकाराम सर छोटूराम के युवा दल का हिस्सा थे। ब्रिटिश हुकूमत से लड़ाई के दौरान छोटूराम ने सीधा जंग छेड़ने के बजाय ब्रिटिश सरकार में बराबर प्रतिनिधित्व की मांग की। उनकी कोशिशों के बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने टीकाराम को लाहौर विधान परिषद में नेता के तौर पर स्थापित कर दिया। हालांकि, इस दौरान उनके छोटे भाई देवकराम की हत्या हो गई। कुछ वर्ष बाद टीकाराम की भी हत्या कर दी गई। 

रामजी लाल के बाकी दो बेटों में से एक रामस्वरूप थे, जो कि जमींदार पार्टी में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। रामस्वरूप ने कुछ समय बाद कांग्रेस पार्टी जॉइन कर ली और संपाला से जीतकर आजाद भारत के पहले विधायकों में से एक बने थे। 1966 में हरियाणा के पंजाब से अलग होने के बाद रामस्वरूप का राजनीतिक करियर खत्म हो गया। 
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परिवार में सबसे आखिर में राजनीति शुरू करने वाले सदस्य थे हरिराम
हरिराम ने राजनीति से दूर रहते हुए शिक्षा के क्षेत्र में करियर बनाया। हालांकि, बाद में उन्होंने वकालत की पढ़ाई की। हरिराम ने राजनीति की शुरुआत आजाद भारत में की और 1952 में लोकसभा चुनाव में हाथ आजमाया। उन्हें जमींदार पार्टी की तरफ से टिकट मिला। उनके खिलाफ कांग्रेस ने चौधरी रणबीर सिंह को उतारा। चुनाव में चौधरी हरिराम कुछ खास कमाल नहीं कर पाए और उन्हें महज 81 हजार वोट मिले। दूसरी तरफ चौधरी रणबीर सिंह को 1.5 लाख वोट मिले। चौधरी रणबीर सिंह के बेटे भूपिंदर सिंह हुड्डा बाद में हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। 

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राजेंद्र प्रसाद - फोटो : अमर उजाला
लोकसभा चुनाव के बाद राष्ट्रपति चुनाव में आजमाया हाथ
1952: लोकसभा चुनाव के कुछ महीने बाद 1952 में ही हुए राष्ट्रति चुनाव में भी हरिराम ने किस्मत आजमाने का पैसला किया। जहां कांग्रेस ने इस पद के लिए राजेंद्र प्रसाद को उम्मीदवार बनाया तो वहीं बाकि विपक्षी दल अपने प्रत्याशी को उतारने में देरी कर रहे थे। यह लगभग तय था कि डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद चुनाव में निर्विरोध ही जीत जाएंगे। हालांकि, चौधरी हरिराम ने उन्हें चुनौती देने की ठानी। उनका कहना था कि एक लोकतंत्र में कोई भी पद बिना प्रतियोगिता के नहीं दिया जाना चाहिए। 

उनके नामांकन के कुछ दिन बाद लेफ्ट ने केटी शाह को उम्मीदवार बना दिया। राजेंद्र प्रसाद को इस चुनाव में 5,07,400 वैल्यू के वोट मिले, केटी शाह इसमें 92,827 वोट ही पा सके। वहीं, चौधरी हरिराम सिर्फ 1954 वोट ही जुटा सके। 

1957: चौधरी हरिराम ने 1957 में एक बार फिर लोकसभा चुनाव लड़ा और उन्हें फिर हार मिली। इसी साल एक बार फिर उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव भी लड़ा। एक बार फिर राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति बने। किसी अन्य पार्टी ने उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा था। इसके चलते प्रसाद ने एकतरफा मुकाबले में 4,59,698 वोट हासिल किए। वहीं चौधरी हरिराम को 2672 वोट मिले। वह दूसरे नंबर पर रहे। 

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डॉ. सर्वेपल्ली राधाकृष्णन
1962: राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपति कार्यकाल खत्म होने के बाद भारत के तीसरे राष्ट्रपति चुनाव 1962 में हुए। कांग्रेस ने इस चुनाव में उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उतारा। उन्हें 5,53,067 वोट मिले। विपक्ष ने इस बार भी कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया और हरिराम को 6,341 वोट मिले। वे इतने कम वोट पाकर भी राष्ट्रपति चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे। वहीं, तीसरे उम्मीदवार यमुना प्रसाद त्रिसुलिया को 3,537 वोट मिले।

1967: चौथे राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस की ओर से उपराष्ट्रपति जाकिर हुसैन को उम्मीदवार बनाया गया। विपक्ष ने दो चुनाव खाली छोड़ने के बाद इस चुनाव में रिटायर्ड चीफ जस्टिस कोका सुब्बाराव को उम्मीदवार बनाया। हालांकि, इन चुनावों में सिर्फ यही दो प्रत्याशी नहीं थे, बल्कि कुल 17 लोग खड़े हुए थे। जहां जाकिर हुसैन को 4,71,244 वोट पाकर जितने में सफल रहे। सुब्बाराव को 3,63,971 वोट मिले। उधर 17 में से नौ उम्मीदवार तो इन चुनाव में खाता तक नहीं खोल पाए थे। कोई वोट न पाने वालों में चौधरी हरिराम का नाम भी शामिल रहा था। इसके बाद ही उन्होंने आगे कभी चुनाव न लड़ने का फैसला किया। 

राष्ट्रपति नहीं रहे फिर भी पहुंचे राष्ट्रपति भवन
चौधरी हरिराम अपने राजनीतिक करियर में कभी राष्ट्रपति चुनाव नहीं जीत पाए। लेकिन उन्हें 1962 में राष्ट्रपति भवन जाने का मौका जरूर मिला। दरअसल, 1962 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद उन्होंने देश के नए राष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्णन को चिट्ठी लिखी थी। इसके बाद राधाकृष्णन ने उन्हें राष्ट्रपति भवन आने का न्योता दिया। चौधरी हरिराम अपने पूरे परिवार के साथ राष्ट्रपति भवन पहुंचे और डॉक्टर राधाकृष्णन को बधाई दी।
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