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Droupadi Murmu: दार्जिलिंग में गूंजा संथाल समाज का इतिहास, राष्ट्रपति बोलीं- प्रकृति-विकास का संतुलन बनाए रखें
Sat, 07 Mar 2026 11:28 PM IST
Himanshu Singh Chandel
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
Published by: Himanshu Singh Chandel
Updated Sat, 07 Mar 2026 11:28 PM IST
सार
पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संथाल समाज से प्रकृति और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की अपील की। उन्होंने तिलका माझी, सिदो-कान्हू और फूलो-झानो जैसे क्रांतिकारियों के बलिदान को याद किया।
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
- फोटो : एक्स/राष्ट्रपति भवन
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विस्तार
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शनिवार को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन को संबोधित करते हुए संथाल समाज से प्रकृति और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदायों ने सदियों से प्रकृति, संस्कृति और परंपराओं को सहेज कर रखा है। अब समय है कि इन मूल्यों को बचाते हुए आधुनिक विकास को भी अपनाया जाए। राष्ट्रपति ने संथाल समाज के गौरवशाली इतिहास और उनके महान क्रांतिकारियों के बलिदान को भी याद किया।
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क्या कहा राष्ट्रपति ने सम्मेलन में?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि संथाल समुदाय का इतिहास संघर्ष और साहस से भरा हुआ है। उन्होंने कहा कि लगभग 240 वर्ष पहले तिलका माझी ने शोषण के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाया था। इसके करीब 60 वर्ष बाद वीर भाई सिदो-कान्हू और चांद-भैरव ने वीर बहनों फूलो-झानो के साथ मिलकर 1855 में संथाल हुल का नेतृत्व किया था। राष्ट्रपति ने कहा कि इन महान योद्धाओं का संघर्ष आज भी समाज को प्रेरणा देता है और हमें अपने इतिहास पर गर्व होना चाहिए।
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संथाली भाषा और ओल चिकी लिपि का क्या महत्व है?
राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 2003 संथाली समुदाय के इतिहास में एक महत्वपूर्ण साल था। उसी वर्ष संथाली भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। उन्होंने बताया कि हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर ओल चिकी लिपि में संथाली भाषा में लिखित भारत का संविधान भी जारी किया गया था। उन्होंने कहा कि इससे संथाली भाषा और संस्कृति को नई पहचान मिली है।
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पंडित रघुनाथ मुर्मू का योगदान क्यों खास है?
राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया था। इस लिपि ने संथाली भाषा को एक नई दिशा दी। उन्होंने बिदु चंदन, खेरवाल वीर, दलगे धन और सिदो कान्हू-संथाल हुल जैसे नाटकों की रचना की। इन रचनाओं के जरिए संथाल समाज में साहित्य और सामाजिक चेतना का विस्तार हुआ। राष्ट्रपति ने युवाओं से कहा कि वे अन्य भाषाओं का अध्ययन जरूर करें, लेकिन अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहना भी जरूरी है।
प्रकृति और परंपरा के संरक्षण पर क्या कहा?
राष्ट्रपति ने कहा कि आदिवासी समाज ने सदियों से अपने लोक संगीत, नृत्य और परंपराओं को संभाल कर रखा है। उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता आदिवासी संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है। यह जरूरी है कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रकृति के संरक्षण का महत्व समझाया जाए। उन्होंने कहा कि लोक संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा करते हुए आदिवासी समाज को आधुनिक विकास की राह पर भी आगे बढ़ना चाहिए।
युवाओं के लिए राष्ट्रपति का क्या संदेश रहा?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि इस समय शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि आदिवासी युवाओं को शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही अपनी जड़ों, भाषा और संस्कृति को भी नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया कि संथाल समाज प्रगति और प्रकृति के बीच संतुलन का एक मजबूत उदाहरण पेश करेगा और देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।