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उपराष्ट्रपति की देशवासियों को सलाह: वेंकैया नायडू बोले- अपने धर्म को मानिए, पर नफरती भाषणों में मत पड़िए

Mon, 03 Jan 2022 03:42 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, तिरुवनंतपुरम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, तिरुवनंतपुरम Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 03 Jan 2022 03:42 PM IST
सार

नायडू ने केरल में कैथोलिक समुदाय के एक आध्यात्मिक नेता और समाज सुधारक संत कुरियाकोस इलियास चावरा की 150वीं पुण्यतिथि के अवसर पर निकटवर्ती मन्नानम में आयोजित एक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया।

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Practice your religion but don't indulge in hate speech advises Vice President M Venkaiah Naidu news and updates
कार्यक्रम में उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने सोमवार को धर्म पर की जा रही राजनीति को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने स्पष्ट लहजे में देशवासियों को संदेश देते हुए कहा कि किसी और के धर्म की आलोचना करना और समाज में मतभेद पैदा करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। नायडू ने कहा कि इस देश में हर एक व्यक्ति को अपने विश्वास के आधार पर धर्म को मानने की इजाजत है। 
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नायडू ने केरल में कैथोलिक समुदाय के एक आध्यात्मिक नेता और समाज सुधारक संत कुरियाकोस इलियास चावरा की 150वीं पुण्यतिथि के अवसर पर निकटवर्ती मन्नानम में आयोजित एक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। यहां उन्होंने संबोधन के दौरान कहा, "अपने धर्म को मानिए, लेकिन नफरती भाषणों में मत पड़िए।" उन्होंने कहा कि इस तरह के काम हमारी संस्कृति, विरासत, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता हर भारतीय के खून में है और पूरी दुनिया में भारत का सम्मान उसकी संस्कृति और विरासत की वजह से ही है। 
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उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने सोमवार को कहा कि सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ रहे छात्रों के लिए सामुदायिक सेवा अनिवार्य बनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘आज, इस देश के युवाओं में युवावस्था से सेवा की भावना पैदा करना बेहद जरूरी है। मेरी सलाह है कि जब कोरोना वैश्विक महामारी खत्म हो जाएगी और स्थितियां सामान्य होंगी, तब सरकारी और निजी स्कूलों को कम से कम दो से तीन सप्ताह के लिए छात्रों के लिए सामुदायिक सेवा अनिवार्य बना देनी चाहिए।’’
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उन्होंने कहा कि स्कूली स्तर पर युवाओं में सेवा की भावना पैदा करने से उनमें वस्तुओं को साझा करने और दूसरों की देखभाल करने की भावना पैदा होगी। नायडू ने कहा, ‘‘वास्तव में, वस्तुओं को साझा करने और दूसरों की देखभाल का दर्शन भारत की सदियों पुरानी संस्कृति के मूल में है और इसका व्यापक प्रसार किया जाना चाहिए। हमारे लिए पूरा विश्व एक परिवार है और यही हमारे कालातीत आदर्श 'वसुधैव कुटुम्बकम' का अर्थ है। इसी भावना के साथ हमें एक साथ आगे बढ़ना चाहिए।’’
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