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मानव मल भी आएगा चिकित्सा के काम, ट्रांसप्लांट में आती है ये कठिनाई

Tue, 24 Apr 2018 10:39 PM IST
जेम्स गैलाघर, बीबीसी
जेम्स गैलाघर, बीबीसी Updated Tue, 24 Apr 2018 10:39 PM IST
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Potty of Others can save your live, transplant is hard

मल ट्रांसप्लांट यानी एक व्यक्ति का मल (पॉटी) दूसरे व्यक्ति के शरीर में डालना शायद मेडिकल प्रक्रियाओं में सबसे बदबूदार और अजीब प्रक्रिया होगी। जाहिर है इसे अंजाम देना भी उतना ही मुश्किल होता होगा। लेकिन सवाल है कि ऐसा किया ही क्यों जाता है? क्या इससे हमारे पाचन तंत्र को कोई फायदा हो सकता है? क्या इससे किसी की जिंदगी बचाई जा सकती है?

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ये प्रक्रिया सबित करती है कि जीवाणुओं की हमारे शरीर में बड़ी अहम भूमिका होती है। इनसे हमारी सेहत की दशा और दिशा जुड़ी होती है। हमारी आंत की दुनिया में अलग-अलग प्रजातियों के जीवाणु पाए जाते हैं और ये सभी एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इनका संपर्क हमारे ऊतकों से भी होता है। जिस तरह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को दुरुस्त रखने में जंगल और बारिश की भूमिका होती है वैसे ही हमारी अंतड़ियों में भी एक पारिस्थितिकी तंत्र काम करता है जिससे चीजें नियंत्रण में रहती हैं।
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लेकिन कोलस्ट्रिडियम डिफिसाइल (सी डिफिसाइल) एक ऐसा जीवाणु है जो हमारी आंत पर अपना नियंत्रण कर लेता है। ये बैक्टीरिया एंटिबायटिक दवाई लेने वाले व्यक्ति पर हमला करता है और पेट की समस्याएं पैदा कर सकता है। आधुनिक समय में एंटिबायटिक दवाइयां किसी चमत्कार से कम नहीं है लेकिन ये जंगल की आग की तरह अच्छे और बुरे दोनों जीवाणुओं को नष्ट कर देती हैं नतीजतन पेट के भीतर सी। डिफिसाइल के पनपने के लिए जमीन तैयार हो जाती है।

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अपने शरीर को समझें

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आप एक मानव से ज्यादा जीवाणु हैं। अगर अपने शरीर में कोशिकाओं की गिनती करेंगे तो पाएंगे कि आप 43 फीसदी ही मनुष्य हैं।

इसके अलावा हमारे शरीर में जीवाणु, विषाणु, कवक और कोषीय जीवाणु हैं।

इंसान की अनुवांशिकता का सीधा संबंध जीन से होता है और जीन्स डीएनए से बनता है। हमारे शरीर में 20 हजार जीन्स होते हैं।

लेकिन अगर इसमें हमारे शरीर में मिलने वाले जीवाणुओं के जीन्स भी मिला दिए जाएं तो ये आंकड़ा करीब 20 लाख से ले कर 200 लाख तक हो सकता है और इसे सेकंड जीनोम कहते हैं।

सी डिफिसाइल का संक्रमण होने पर व्यक्ति को हर दिन में कई बार पतले दस्त हो सकते हैं और कभी-कभी मल में खून भी आ सकता है। साथ ही घातक संक्रमण होने पर पेट में दर्द और बुखार हो सकता है।


इसके इलाज के लिए जो विकल्प मौजूद हैं उनमें सबसे बेहतर है एंटीबायटिक जो फिर से सी। डिफिसाइल संक्रमण के लिए रास्ता बनाती है। यानी एक कुचक्र है। मल का ट्रांसप्लांट या फिर कहें 'मल में मौजूद बैक्टीरिया के ट्रांसप्लांट' के जरिए मरीज की आंतों में फिर से अच्छे बैक्टीरिया डाले जा सकते हैं जिनसे स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है। इस काम के लिए आम तौर पर व्यक्ति के रिश्तेदार के मल का इस्तेमाल किया जाता है।

ये माना जाता है कि उनके पेट में समान बैक्टीरिया होंगे। इसके लिए एक "नमूना" तैयार किया जाता है जिसे पानी में मिलाया जाता है। कुछ अन्य तकनीक में मल को हाथ से मिलाया जाता है जबकि कुछ मामलों में एक ब्लेंडर का इस्तेमाल किया जाता है। इसे दो तरीकों से मरीज के शरीर के भीतर पहुंचाया जाता है, एक मुंह के जरिए या फिर मलद्वार के जरिए।
 

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अमरीका के वॉशिंगटन में पेसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेटरी में माइक्रोबियल इकोलॉजिस्ट डॉ जेनट जेनसन उस टीम का हिस्सा थीं जो ये साबित करने की कोशिश कर रही थीं कि मल ट्रांसप्लंट काम कर सकता है। उनकी 61 साल की मरीज लगातार आठ महीनों तक पेट की समस्या और दस्त से परेशान रहीं और इस कारण उनका 27 किलो वजन कम हो गया।

डॉ जेनसन कहती हैं, "वो सी। डिफिसाइल के संक्रमण से परेशान हो चुकी थीं और वो मौत की कगार पर पहुंच गई थीं। उन पर कोई एंटीबायटिक असर नहीं कर रहा था।" उनके शरीर में उनके पति से लिया गय स्वस्थ मल ट्रांसप्लांट किया गया। डॉ जेनसन ने बीबीसी को बताया कि उन्हें अपनी सफलता पर हैरानी हुई। वे कहती हैं, "आश्चर्यजनक तौर पर दो दिन के बाद वे सामान्य हो गई और उनका पेट भी सही हो गया। वे ठीक हो गई थीं।"

परीक्षणों में पता चला है कि ये प्रक्रिया लगभग 90 फ़ीसदी तक असरदार हो सकती है। इस तकनीक में सकारात्मक नतीजे आने से कुछ लोगों को ख़ुद से अपने शरीर पर ये प्रक्रिया आजमाने का उत्साह मिला है। अमरीका में ओपनबायोम जैसे समूहों का गठन किया गया है जो मल रखने और ट्रांसप्लांट के लिए बांटने का एक सार्वजनिक बैंक है।

खुद मल ट्रांसप्लांट कैसे करें

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लेकिन क्या सी। डिफिसाइल के इलाज के अलावा मल ट्रांसप्लांट का कोई और मेडिकल उपयोग भी है? लगभग सभी बीमारियों में हमारे इंसानी शरीर और शरीर में मौजूद जीवाणु के बीच के संबंध को जांचा जाता है। सी। डिफिसाइल के कारण आंत में सूजन, पेट की बीमारी, मधुमेह और पार्किन्संस की बीमारी हो सकती है। इस कारण कैंसर की दवा का असर भी कम हो सकता है और व्यक्ति को डिप्रेशन और ऑटिज्म हो सकता है। लेकिन इसका मतलब ये भी है कि मल के ट्रांसप्लांट के नतीजे हमेशा सकारात्मक ही होंगे।

साल 2015 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार एक महिला में उनकी बेटी के मल का ट्रांसप्लांट किया गया जिसके बाद उनका वजन 16 किलो तक बढ़ गया और उन्हें मोटा करार दिया गया। एक मोटे इंसान का मल किसी चूहे में ट्रंसप्लांट करके उसे मोटा या पतला बनाया जा सकता है। हालांकि अभी भी इस बात को लेकर सहमति नहीं बन पाई है कि ऐसा ही नतीजा इंसानों में आएगा या नहीं।

साथ ही इस ट्रांसप्लांट के साथ खतरनाक बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु के ट्रांसप्लांट होने का अधिक जोखिम भी होता है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों की कोशिश है कि सीधे मल ट्रांसप्लांट करने की बजाय बैक्टीरिया का कॉम्बिनेशन ट्रांसप्लांट किया जा सके।

वेलकम सेंगर इंस्टीट्यूट के डॉ ट्रेवोर लॉली कहते हैं आने वाले समय के लिए ऐसे इलाज को और अधिक परिष्कृत किया जाना चाहिए। वो कहते हैं, "मल का ट्रांसप्लांट किया जाना एक नए तरह की प्रक्रिया है और जब आप पहली बार कोई दवा तैयार करते हैं तो ये जरूरी है कि मरीज की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता दी जाए।" 

"हमें अब पता है कि इसके जरिए किस तरह के जीवाणु शरीर में डाले जाते हैं और इसलिए यदि आपके पास कोई ऐसा मिश्रण है जो सुरक्षित साबित हो चुका है तो इस समस्या से निपटा जा सकता है।"

हो सकता है कि ये जीवाणुओं के लिए दवाओं का भविष्य हो यानी इंसान के शरीर में जीवाणु के कारण होने वाली समस्या पहचानना और फिर उसका इलाज करना।
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