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कोरोना वायरस: अधूरे इलाज या पूरी तरह ठीक न होने से दोबारा संक्रमण की आशंका
Mon, 27 Jul 2020 12:22 PM IST
अवधेश कुमार
अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली
अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली
Published by: अवधेश कुमार
Updated Mon, 27 Jul 2020 12:22 PM IST
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सार
- एंटीबॉडीज का स्तर घटने का मतलब ये नहीं है कि संक्रमण दोबारा हो जाए
- वैज्ञानिकों का तर्क ऐसा संभव नहीं लेकिन चूक के कारण ऐसा हो सकता है
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कोरोना वायरस का इलाज
- फोटो :
Pixabay
विस्तार
स्वस्थ मरीजों को दोबारा संक्रमण से चिकित्सक हैरान हैं। दिल्ली समेत अन्य राज्यों में ऐसे दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अधूरा इलाज या पूरी तरह ठीक न होने से कोरोना की वापसी के मामले आ रहे हैं। कम से कम दो स्वाब रिपोर्ट निगेटिव आने, लक्षण पूरी तरह खत्म होने के बाद ही रोगी को छुट्टी देनी होगी। दिल्ली पुलिस का 50 वर्षीय जवान 15 से 22 मई तक भर्ती रहा और ठीक हो गया। ड्यूटी जॉइन करने के बाद 10 जुलाई को संक्रमण की पुष्टि हुई।यूएई से केरल लौटे दो लोगों में ठीक होने के बाद वायरस की फिर पुष्टि हुई। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के इम्युनोलॉजिस्ट डॉ. माइकल मीना के मुताबिक, दोबारा संक्रमण मुश्किल है। अगर ऐसा है तो मरीज पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। संक्रमितों के भीतर एंटीबॉडीज बनती हैं। एंटीबॉडीज का स्तर दो से तीन महीने में घट जाता है पर इसका मतलब ये नहीं कि व्यक्ति दोबारा चपेट में आए। इसकी संभावना कम रहती है।
वायरल लोड बढ़ने के साथ दोबारा लक्षण
डॉ. माइकल के अनुसार मरीज के इलाज के दौरान शरीर में वायरल लोड पहले से कम हो सकता है। इस आधार पर उसे स्वस्थ मानना तार्किक नहीं है। वायरस की मौजूदगी स्वस्थ घोषित होने के बाद भी रही होगी। इससी वायरल लोड बढ़ने के साथ उसमें दोबारा लक्षण दिख सकते हैं।
मेमोरी सेल्स इम्युन सिस्टम को करतीं सक्रिय...
येल यूनिवर्सिटी के इम्युनोलॉजिस्ट डॉ. अकिको इवासाकी का कहना है कि एंटीबॉडीज केवल वायरस से बचातीं। एंटीबॉडीज इम्युन सिस्टम को इस तरह से सक्रिय करती हैं जिससे कोई वायरस दोबारा अटैक करता है तो वो उससे लड़ती है जिसे टी-सेल्स या मेमोरी सेल्स कहते हैं। मेमोरी सेल्स का काम वायरस को पहचान इम्युन सिस्टम को सक्रिय कर उसे खत्म करना होता है।
वायरस से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ हो शरीर
बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के नेशनल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉ. पीटर होटेज कहते हैं ‘मैं नहीं मानता कि ऐसा नहीं हो सकता है लेकिन मैंने अभी तक ऐसा नहीं देखा है’। हो सकता है जिन मरीजों में ऐसे मामले देखने को मिले हैं वो पहली बार जब संक्रमण की चपेट में आए तो उनका शरीर पूरी तरह से वायरस मुक्त नहीं हुआ हो। समय के साथ शरीर में वायरल लोड के दोबारा बढ़ने से तकलीफ बढ़ सकती है।
येल यूनिवर्सिटी के इम्युनोलॉजिस्ट डॉ. अकिको इवासाकी का कहना है कि एंटीबॉडीज केवल वायरस से बचातीं। एंटीबॉडीज इम्युन सिस्टम को इस तरह से सक्रिय करती हैं जिससे कोई वायरस दोबारा अटैक करता है तो वो उससे लड़ती है जिसे टी-सेल्स या मेमोरी सेल्स कहते हैं। मेमोरी सेल्स का काम वायरस को पहचान इम्युन सिस्टम को सक्रिय कर उसे खत्म करना होता है।
वायरस से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ हो शरीर
बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के नेशनल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉ. पीटर होटेज कहते हैं ‘मैं नहीं मानता कि ऐसा नहीं हो सकता है लेकिन मैंने अभी तक ऐसा नहीं देखा है’। हो सकता है जिन मरीजों में ऐसे मामले देखने को मिले हैं वो पहली बार जब संक्रमण की चपेट में आए तो उनका शरीर पूरी तरह से वायरस मुक्त नहीं हुआ हो। समय के साथ शरीर में वायरल लोड के दोबारा बढ़ने से तकलीफ बढ़ सकती है।