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जलसंकट के सबसे खराब दौर से गुजर रहा हमारा देश, प्रदूषित है 70 फीसदी पानी

Thu, 04 Jul 2019 04:26 PM IST
अनिल पांडेय अनिल पांडेय, नई दिल्ली
अनिल पांडेय, नई दिल्ली Published by: अनिल पांडेय Updated Thu, 04 Jul 2019 04:26 PM IST
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सार
  • 7.5 करोड़ से ज्यादा लोग तरस रहे हैं साफ पेयजल के लिए। 
  • 2.6 प्रतिशत पानी ही साफ है पृथ्वी पर उपलब्ध पानी की कुल मात्रा का। 
  • 01 फीसदी लोग ही दुनिया की कुल जनसंख्या का इस्तेमाल कर पाते हैं साफ पानी। 
  • 20 साल में चार मीटर तक गिर गया है देश के दो तिहाई ग्रामीण जिलों में पानी का स्तर यूनिसेफ के अनुसार। 
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Polluted surface and groundwater could cause of disease cancer and deaths
देश में बेकाबू जलप्रदूषण - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

देश में मानसून का आगमन हो चुका है। कई राज्यों में बारिश शुरू हो गई है और कई राज्यों को अभी इसका इंतजार है। हालात कुछ इस तरह के बने हैं कि एक तरफ भारी बारिश और जलभराव से मुंबई परेशान है, तो दूसरे कई शहर बारिश को तरस रहे हैं। देश में वर्षा के असमान वितरण का असर पानी की कमी के रूप में सामने आ रहा है। पर्यावरण में आए बदलाव का असर ऐसा है कि एक ही शहर के किसी क्षेत्र में अतिवर्षा हो रही है तो कहीं गर्मी और सूखे जैसे हालात हैं। इसका असर जल प्रदूषण और जलसंकट के रूप में दिखाई दे रहा है।



केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार देश का 70 फीसदी पानी प्रदूषित है। रिपोर्ट बताती है कि देश जलसंकट के सबसे खराब दौर से गुजर रहा है। उत्तरी हिमालय क्षेत्र से लेकर तटीय इलाकों तक करीब 60 करोड़ (लगभग आधी आबादी) पानी की कमी से जूझ रही है। हर साल प्रदूषित पानी की वजह से 2 लाख लोगों की जान जा रही है।


देश के लगभग सभी शहरों में कई महिलाएं रोजाना पानी के लिए लाइन में खड़ी होती हैं या फिर टैंकर से पानी भरकर घर लाती हैं। तो कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां कई किलोमीटर चलकर पीने का पानी भरने जाना पड़ता है। जहां नलों में पानी की आपूर्ति होती है वहां भी गंदे पानी से लोग परेशान रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे पानी से संक्रमण, अपंगता और यहां तक की मौत भी हो सकती है। यही वजह है कि देश की मलिन बस्तियों के हालात पानी के लिहाज से बहुत बुरे हैं।

हर चार से में तीसरा व्यक्ति गंदा पानी पीने को मजबूर

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 70 फीसदी पानी प्रदूषित है, जिसका मतलब है कि हर चार में से तीसरा भारतीय गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। हमारे देश में गंदे पानी को साफ न कर पाना भी एक बड़ी समस्या है। गंदे पानी का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा साफ किया जाता है और बाकी नदी या तालाब में गिरा दिया जाता है। इससे भूजल भी प्रदूषित होता है। रिपोर्ट के मुताबिक नदियों का पानी प्रदूषित है, भूजल और नल का पानी भी गंदा हो चुका है। इसकी बड़ी वजह कचरे का कुप्रबंधन भी है। दरअसल ठोस कचरे को साफ करने के लिए हमारे देश में अब तक कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी वजह से भूजल प्रदूषित और जहरीला हो रहा है।

नदियों का बुरा हाल 

नीति आयोग की एक रिपोर्ट का दावा है कि अगर भारत में पानी की समस्या को सुलझा लिया गया तो इससे देश की जीडीपी को 6 फीसदी का फायदा होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक हमारी इंडस्ट्री खाद्य सुरक्षा सबकुछ पानी से जुड़ी हुई है। पानी कोई असीमित स्रोत नहीं है और एक दिन यह खत्म हो सकता है। वर्ष 2030 तक भारत में पानी की सप्लाई मांग के मुकाबले आधी रह जाएगी। फिलहाल इस बड़ी समस्या से निजात पाने के लिए केंद्र सरकार सभी राज्य सरकारों से कह चुकी है कि वे पानी को साफ करने की योजना को प्राथमिकता दी जाए, जिससे पानी की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाया जा सके।


भारत की सबसे बड़ी और पवित्र कही जाने वाली गंगा दुनिया की सबसे गंदी नदियों में से एक है। उत्तर भारत की यमुना, पश्चिम की साबरमती, दक्षिण की पंबा की भी हालत बहुत ही खराब है। कई नदियां जैविक लिहाज से मर चुकी हैं। इसका असर पर्यावरण के साथ लोगों पर भी पड़ रहा है। वर्ल्ड रिसोर्सेज रिपोर्ट के मुताबिक 70 फीसदी भारतीय गंदा पानी पीते हैं। पीलिया, हैजा, टायफाइड और मलेरिया जैसी कई बीमारियां गंदे पानी की वजह से होती हैं। रसायनिक खाद भी भूजल को दूषित कर रही है। कारखानों और उद्योग की वजह से हालत और बुरी हो गई है।

इन देशों से सीखने की जरूरत

नदी प्रदूषण
नदी प्रदूषण - फोटो : PTI

यदि हमें वाकई जल प्रदूषण रोकना है और पीने के पानी की उपलब्धता बढ़ानी है तो जिन देशों में जल प्रबंधन अच्छा है, उनसे सीख और मदद ली जा सकती है। यह भी तय किया गया था कि इजरायल की मदद से भारत गंगा नदी को साफ करेगा और 2020 तक नदी को साफ कर दिया जाएगा। जल प्रबंधन के मामले में इजरायल के पास बेहद उन्नत तकनीक है। लेकिन इजरायल विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा को साफ करने में अगले 20 साल लग जाएंगे।

विशेषज्ञ चाहते हैं कि नदियों के किनारे अलग से निकासी तंत्र बनाया जाए। इस निकासी तंत्र में गंदा पानी बहता रहेगा। इसे नदी में तभी डाला जाएगा जब इसे पूरी तरह साफ कर दिया जाए। यमुना की सफाई में जर्मनी की भी मदद ली जा रही है। लेकिन मुश्किल ये है कि ठोस नियमों और कड़ी निगरानी के अभाव में ऐसी मदद के सफल होने की उम्मीदें भी कम ही हैं।

150 नदियां प्रदूषित

भारत के 27 राज्यों में कुल 150 नदियां प्रदूषण की चपेट में हैं, जिनमें सबसे ज्यादा 28 नदियां महाराष्ट्र में हैं। गुजरात की नदियां का भी बुरा हाल है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा पिछले साल लोकसभा को दी गई जानकारी में बताया गया था कि राज्यवार प्रदूषित नदियों की सूची में पहले स्थान पर महाराष्ट्र है। वहां की 28 नदियां प्रदूषित हैं। दूसरे स्थान पर गुजरात है जहां ऐसी 19 नदियां हैं। सूची में 12 प्रदूषित नदियों के साथ उत्तर प्रदेश तीसरे स्थान पर हैं।

कर्नाटक की 11 नदियां प्रदूषित नदियों की सूची में हैं, जबकि मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु प्रत्येक में नौ नदियां ऐसी हैं। राजस्थान की पांच और झारखंड की तीन नदियां इस सूची में हैं। साथ ही उत्तराखंड और हिमाचल की तीन तीन नदियां शामिल हैं। दिल्ली से गुजरने वाली एक ही नदी यमुना है और वह भी इस सूची में शामिल है।

विदेशी नदियों से ले सकते हैं सबक

ऐसा नहीं है कि भारत में ही नदियां प्रदूषित हैं। विदेशों में भी कई नदियां थीं, जो प्रदूषित थीं। लेकिन समय रहते वहां की सरकारों ने उन नदियों की बेहतरीन सफाई की है।

  • जर्मनी की प्रमुख नदी एल्बो में भी काफी गंदगी थी, लेकिन समय पर वहां की सरकार ने इस नदी की सफाई की। आज एल्बो स्वच्छ नदी है।
  • किसी समय इंग्लैंड की टेम्स नदी भी बहुत ही गंदी हुआ करती थी, लेकिन वहां की सरकार ने इस पर ध्यान दिया और समय पर टेम्स नदी की सफाई हो गई।
  • अफ्रीकी देशों में नील नदी का बहुत ही बड़ा योगदान है और यह विश्व की सबसे बड़ी नदी है। लेकिन दुर्भाग्य से इस नदी में काफी गंदगी आ गई थी, जिसे सामूहिक प्रयास से साफ कर दिया गया।

लगातार गिरता जलस्तर

जलसंकट
जलसंकट - फोटो : PTI

हमारे देश में भूजल को बेतरतीब, मनमाने और बिना किसी रोकटोक के उपयोग किया जा रहा है। इस वजह से भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा है। अगर इसी तरह से जल दोहन होता रहा तो दिल्ली और बेंगलुरु जैसे 21 शहरों में साल 2020 तक भूजल खत्म होने की कगार पर आ जाएगा। इस खतरे की आहट भी दिखाई देने लगी है। कभी "झीलों का शहर" कहा जाने वाला बेंगलुरु अब सूख चुका है।

राजधानी दिल्ली में यमुना पहले नाले में तब्दील हुई और अब वह नाला भी सूख रहा है। नदी के कैचमेंट क्षेत्र में निर्माण कार्य हो रहे हैं। बरसात होने पर यमुना में जो पानी आता है, उससे गंदगी ऊपर आ जाती है और पानी की जगह सफेद झाग दिखाई देने लगता है। बेंगलुरू में भी पिछले साल बरसात के समय में झीलों से झाग निकलकर सड़कों में भर गया था। इस प्रदूषित भूजल से कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं। पानी में आर्सेनिक, फ्लोराइड और नाइट्रेट की मात्रा पाई गई है।

बढ़ती जा रही है पानी की खपत

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जल उपयोग का प्रति व्यक्ति आदर्श मानक 100-200 लीटर निर्धारित किया है। विभिन्न देशों में यह मानक बदलते रहते हैं, लेकिन भारत में स्थिति बदहाली के स्तर तक पहुंच चुकी है। यहां प्रति व्यक्ति जल उपयोग लगभग 89 से 90 लीटर प्रतिदिन है। 2050 तक इस दर का प्रति व्यक्ति 167 लीटर प्रतिदिन हो जाने का अनुमान है। अगर जल उपलब्धता की बात करें, तो सरकारी अनुमान कहता है कि 2025 तक प्रति व्यक्ति 1341 घन मीटर उपलब्ध होगा। यह 2050 में और कम होकर 1140 ही रह जाएगा।

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